सरकारी अस्पतालों में दवाएं बिना जांच अब नहीं मिलेंगी
दवाओं की क्वालिटी पर सरकार सख्त, जांच पास होने पर ही होगी सप्लाई
Jageshwar prasad | Jun 28, 2026, 08:06 IST
सरकारी अस्पतालों में दवाओं की फास्ट ट्रैक जांच अनिवार्य
राजस्थान में कोटा-बीकानेर मौत कांड के बाद सरकार ने सरकारी अस्पतालों में लोकल दवाओं की फास्ट ट्रैक जांच अनिवार्य की। फेल होने पर वेंडर ब्लैकलिस्ट होगा।
समझें क्या है पूरा मामला
- कोटा-बीकानेर में प्रसूताओं की मौत के बाद सरकार ने लिया सख्त फैसला।
- सरकारी अस्पतालों में स्थानीय खरीदी दवाएं अब जांच के बाद ही मरीजों को मिलेंगी।
- हर खेप को पहले क्वारंटाइन किया जाएगा, लैब क्लीयरेंस के बाद ही होगा इस्तेमाल।
- घटिया दवाओं की आपूर्ति करने वाले वेंडर को ब्लैकलिस्ट किया जाएगा।
- ड्रग कंट्रोलर हर महीने अस्पतालों का औचक निरीक्षण करेंगे।
तय मानकों पर खरी उतरने पर ही दवाएं आगे जाएंगी। घटिया दवा देने वाले वेंडर को ब्लैकलिस्ट किया जा सकेगा। ड्रग कंट्रोलर हर महीने औचक निरीक्षण करेंगे।
कोटा-बीकानेर मौतों के बाद फैसला
अब सरकार ने साफ कर दिया है कि किसी भी सरकारी चिकित्सा संस्थान में स्थानीय स्तर पर खरीदी गई दवा तब तक इस्तेमाल नहीं की जाएगी, जब तक उसे लैब से क्लीयरेंस न मिल जाए।
क्वारंटाइन और फास्ट ट्रैक टेस्टिंग
टेस्टिंग की पूरी प्रक्रिया और उसके खर्च के लिए वेंडर को किए जाने वाले भुगतान का 1 से 15 फीसदी हिस्सा आवंटित किया जाएगा।
WHO-GMP प्रमाणित दवाएं ही मान्य
खरीदी जाने वाली दवाओं की शेल्फ लाइफ कुल अवधि की कम से कम 75 फीसदी शेष होनी चाहिए। इससे कम शेल्फ लाइफ वाली दवा स्वीकार नहीं की जाएगी।
फेल दवा पर वेंडर होगा ब्लैकलिस्ट
यह प्रावधान उन कंपनियों को भविष्य में सरकारी खरीद से बाहर कर देगा जो मानकों पर खरी नहीं उतरतीं।
हर महीने औचक निरीक्षण, डिजिटल रिकॉर्ड अनिवार्य
इसके साथ ही अस्पतालों को दवाओं का डिजिटल रिकॉर्ड रखना होगा। अस्पताल के सूचना पट्ट पर अधिकृत वेंडर्स की सूची और अनुमोदित दरें भी प्रदर्शित करनी होंगी। इससे मरीज और उनके परिजन जान सकेंगे कि कौन-सी कंपनी की दवाएं अस्पताल में आ रही हैं।
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