अवैध हिरासत में मारपीट पुलिस ड्यूटी नहीं, मुकदमे के लिए मंजूरी जरुरी नहीं
Mukesh Sharma | Sept 03, 2026, 20:01 IST
अवैध प्रताड़ना पर हाई कोर्ट सख्त
राजस्थान हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अवैध हिरासत और मारपीट के दोषी पुलिसकर्मियों पर मुकदमा चलाने के लिए पूर्व अभियोजन स्वीकृति की कोई आवश्यकता नहीं है।
समझें क्या है पूरा मामला
- कमरे में बंद कर डंडे से पीटना आधिकारिक कर्तव्य के दायरे में नहीं आता।
- अवैध प्रताड़ना के दोषी पुलिसकर्मी पर मुकदमा चलाने के लिए अभियोजन स्वीकृति की जरूरत नहीं।
- राजस्थान हाई कोर्ट ने आरोपी कांस्टेबल की याचिका खारिज कर प्रसंज्ञान आदेश को सही माना।
- कोर्ट ने माना कि कमरे में बंद करके मारपीट करना आधिकारिक ड्यूटी से बाहर जाकर व्यक्तिगत कार्य।
जस्टिस रवि चिरानिया ने विनोद कुमार की याचिका खारिज करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति को कमरे में बंद करके डंडे से बुरी तरह से पीटने को किसी भी स्थिति पुलिसकर्मियों के अधिकारिक कर्तव्य नहीं माना जा सकता।
यह है मामला
प्रदर्शन के दौरान याचिकाकर्ता पुलिस कांस्टेबल ने पीड़ित सामाजिक कार्यकर्ता सखी मोहम्मद को एसडीएम की अदालत के अंदर बंद कर दिया और डंडे से बुरी तरह पीटा था। इस मामले में याचिकाकर्ता कांस्टेबल के खिलाफ गलत तरीके से बंधक बनाने और हिरासत में हिंसा के आरोप में एफआईआर दर्ज हुई थी।
पुलिस ने दी थी एफआर
याचिकाकर्ता का कहना था कि सीआरपीसी की धारा- 197 के तहत लोक सेवक के खिलाफ प्रसंज्ञान लेने से पहले राज्य सरकार से पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य है। उसका कहना था कि वह अन्य पुलिसकर्मियों के साथ स्थल पर आधिकारिक ड्यूटी पर तैनात था और उसे इस पूरी घटना में व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाकर बलि का बकरा बनाया गया है।
अधिकारिक ड्यूटी का हिस्सा नहीं
शिकायत में मौके पर मौजूद पूरे पुलिस दल के बजाय केवल याचिकाकर्ता को ही निशाना बनाया गया। इससे स्पष्ट होता है कि उसने अपनी आधिकारिक क्षमता से बाहर जाकर व्यक्तिगत रूप से काम किया था। यह मानते हुए कि बिना पूर्व स्वीकृति के प्रसंज्ञान लेने वाले ट्रायल कोर्ट आदेशों में कोई कानूनी गलती नहीं है।
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