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Photograph: (the sootr)
News In Short
- हाई कोर्ट ने बेलदार की आय की गणना महीने में 26 दिन के आधार पर करने को अनुचित माना।
- मोटर एक्सीडेंट ट्रिब्यूनल ने बेलदार के महीने में काम के माने थे मात्र 26 दिन।
- बेलदारी करने वाले मजदूर को रोटी के लिए करना पड़ता है पूरे महीने काम
- श्रम विभाग की अधिसूचनओं में महीने के 30 दिन नहीं गिनने की है कमी
- सरकार को इस कमी को दूर करने के दिए निर्देश
News In Detail
राजस्थान हाई कोर्ट ने बेलदारी करने वाले मजदूरों की आय की गणना महीने में 26 दिन के आधार पर करने को अनुचित माना है। कोर्ट ने कहा है कि यह सच्चाई है कि बेलदारी करने वाले मजदूर को सवै​तनिक साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलता। इसलिए उसकी आय की गणना के लिए महीने में 26 कार्यदिवस गिनना उचित नहीं है। जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने यह आदेश लक्ष्मण कुमावत की अपील को आंशिक रुप से मंजूर करते हुए दिए।
ट्रिब्यूनल ने गिने थे मात्र 26 दिन
दरअसल, अपीलकर्ता लक्ष्मण कुमावत दैनिक वेतनभोगी बेलदार है। अगस्त 2020 में उसका मोटर साईकिल चलाते हुए दूसरे वाहन से एक्सीडेंट हो गया था। ब्यावर के मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने महीने में उसके मात्र 26 कार्यदिवस ही माने और इस आधार पर ही उसका मुआवजा ​तय किया था। कुमावत ने इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी और मुआवजा बढ़ाने की गुहार की थी।
बेलदार तो अप्रशिक्षित मजदूर
हाई कोर्ट में अधिवक्ता राहुल सिंह मेड़तवाल ने ट्रिब्यूनल के कुमावत को अ​प्रशिक्षित मजदूर मानकर 26 दिन की आय के आधार पर मुआवजा देने को गलत बताया। उन्होंने कहा कि बेलदार को 30 दिन बिना किसी अवकाश के काम करना पड़ता है। इसलिए उसे प्रशिक्षित मजदूर मानकर मुआवजा दिया जाए, जबकि इंश्योरेंस कंपनी के अधिवक्ता का कहना था बेलदार तो अप्रशिक्षित मजदूर ही होता है। इसलिए ट्रिब्यूनल ने सही आदेश दिया है।
कोर्ट ने माना कि अप्रशिक्षित मजदूर है लेकिन
कोर्ट ने कहा है कि श्रम विभाग की अधिसूचना के अनुसार बेलदार अप्रशिक्षित मजदूर ही होता है। ट्रिब्यूनल ने इस संबंध में कोई गलती नहीं है। लेकिन,ट्रिब्यूनल ने महीने में सिर्फ 26 कार्यदिवस की मजदूरी के आधार पर मुआवजा तय किया है। जबकि वास्तविकता में बेलदार को महीने में 30 दिन बिना किसी अवकाश के काम करना पड़ता है।
कई इंडस्ट्री में है यह
कोर्ट ने कहा कि महीने में 26 दिन कार्यदिवस व चार दिन सवै​तनिक अवकाश कई इंडस्ट्री में मिलता है। लेकिन वास्तविकता में किसी भी दैनिक वेतनभोगी को ना तो साप्ताहिक अवकाश मिलता है और ना अवकाश का वेतन या मजदूरी। मजदूर को तो कमाने के लिए हर दिन काम करना ही पड़ता है।
गरीब लोग हैं यह
कोर्ट ने कहा है कि बेलदारी या दैनिक वेतनभोगी के रुप में काम करने वाले अधिकांशत:गरीब हैं। ये लोग जिस दिन काम नहीं करते उस दिन इनको कोई पैसा नहीं मिलता। जबकि श्रम कानूनों के अनुसार सप्ताह में एक दिन सवै​तनिक अवकाश देना जरुरी है। यह सच्चाई है कि किसी भी प्रकार का अवकाश होने पर मजदूरों की कमाई मारी जाती है।
कानून तो कहते हैं कि
कोर्ट ने कहा है कि भारत में श्रम कानून के अनुसार मजदूर हो या दैनिक वेतनभोगी उन्हें एक दिन का सवैतनिक अवकाश मिलना चाहिए। फैक्ट्री एक्ट-1948 और दुकान व संस्थान अधिनियम के तहत मजदूर या कार्मिक से 9 घंटे से ज्यादा काम नहीं ले सकते। ना ही लगातार सात दिनों तक काम करने को मजबूर किया जा सकता है।
रोटी कमाने को हर दिन करता है काम
कोर्ट ने कहा है कि मजदूरों को सवैतनिक अवकाश लेकर आराम करने की सुविधा नहीं है। उसके पास तो परिवार को भोजन उपलब्ध करवाने के लिए महीने में 30 दिन लगातार काम करने के अलावा कोई चारा नहीं है। इस बात की तो सपने में भी कल्पना नहीं कर सकते कि कोई बेलदार सवैतनिक साप्ताहिक अवकाश पर रहता होगा।
30 दिन की मजदूरी से हो गणना
कोर्ट ने अपील को आंशिक रुप से मंजूर करते हुए अपीलकर्ता को 30 दिन की मजदूरी के अनुसार गणना करके कुल मुआवजे में 33,040 रुपए बढ़ाकर देने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने केंद्र व राज्य के श्रम विभाग की अधिसूचनाओं को अनुचित बताते हुए इन्हें सही करने की जरुरत बताई है। ताकि मजदूरों की मजदूरी की गणना महीने में 26 दिन के स्थान पर 30 दिन गिनी जा सके।
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