अदालत का आदेश, फिर भी भ्रष्टाचार पर एक्शन नहीं, अब एसीबी डीआईजी होंगे हाई कोर्ट में हाजिर

राजस्थान आईटी डिपार्टमेंट में भ्रष्टाचार की शिकायतों के बावजूद डेढ़ साल में कोई एक्शन नहीं हुआ। इस पर हाई कोर्ट ने सख्त रवैया दिखाते हुए एसीबी डीआईजी को तलब किया है।

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Mukesh Sharma
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Photograph: (the sootr)

News In Short

  • राजस्थान एसीबी के डीआईजी आनंद शर्मा हाईकोर्ट में तलब 
  • आईटी डिपार्टमेंट में भ्रष्टाचार की जांच का मामला 
  • हाईकोर्ट ने 6 सितंबर, 2024 को जांच के दिए थे आदेश 
  • पिछले 5 साल में हुए टेंडर की जांच की है गुहार 
  • डेढ़ साल में जांच में प्रगति नहीं होने का आरोप 

News In Detail

राजस्थान हाई कोर्ट ने आईटी डिपार्टमेंट के टेंडरों में हुई गड़बड़ियों की जांच में प्रगति नहीं होने पर एसीबी के डीआईजी आनंद शर्मा को तलब किया है। जस्टिस अशोक कुमार जैन ने यह अंतरिम निर्देश डॉ.टीएन.शर्मा की याचिका पर दिए। डीआईजी शर्मा को गुरुवार 5 फरवरी को दोपहर 2 बजे अदालत में पेश होना है। 

सौ दिन चले अढ़ाई कोस

डॉ.टीएन शर्मा ने याचिका दायर कर खुलासा किया कि ​आईटी डिपार्टमेंट में विभिन्न कार्यों के टेंडरों में भारी घोटाला हुआ है। उन्होंने कोर्ट से पिछले 5 साल में किए गए टेंडरों की एसीबी से जांच करवाने की गुहार की थी। हाई कोर्ट ने 6 सितंबर,2024 को एसीबी को आईटी डिपार्टमेंट के 5 साल में हुए टेंडरों की जांच के आदेश दिए थे। 

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को भी एसीबी को शिकायत देने को कहा था। याचिकाकर्ता ने 27 मामलों की जानकारी दस्तावेजों के साथ एसीबी को दी थी। लेकिन, हाई कोर्ट के आदेश के डेढ़ साल बाद भी एसीबी ने कोई विशेष प्रगति नहीं की है। केवल एक प्रधुम्न दीक्षित के मामले में कार्रवाई हुई है, लेकिन इसमें भी कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। 

मामला ठंडे बस्ते में

कोर्ट के पूछने पर एसीबी अधिकारियों ने बताया कि मामले की जांच के लिए एसआईटी बना दी है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता पूनम चंद भंडारी ने कोर्ट को बताया कि आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। अदालती आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।  

फर्जकारी के भी हैं मामले

एडवोकेट भंडारी ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता की ओर से बताए गए मामले सिर्फ भ्रष्टाचार से संबंधित हीं नहीं हैं। ​बल्कि, कुछ मामलों में अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर टेंडर दिए और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर करोडों रुपयों का भुगतान उठा लिया गया।  

वर्क आर्डर में की कांट-छांट

कोर्ट को यह भी बताया गया कि एक मामले में तो अधिकारी ने वर्क आर्डर में कांट-छांट करके वर्क आर्डर को दो साल तक बढ़ाया। जानकारी देने के बावजूद भी ऐसे मामलों में भी कोई कार्रवाई हुई है। इसके अतिरिक्त हज़ारो करोड़ रुपए के दूसरे घोटालों पर भी कोई कार्यवाही नहीं है।  उदाहरण के तौर पर राजनेट प्रोजेक्ट में 17,500 डिवाइसेज की जगह तीन वर्षों में मात्र 1750 डिवाइस ही लगाई गई हैं ।

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