न्यायिक अधिकारी की सजा में दखल से इनकार, हाई कोर्ट ने कहा-जज की ईमानदारी से समझौता नहीं

राजस्थान हाई कोर्ट ने एक न्यायिक अधिकारी से जुड़ेे मामले में सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि ईमानदारी, स्वतंत्रता व आचरण में नैतिकता संदेह से परे होनी ही चाहिए।

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Mukesh Sharma
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Photograph: (the sootr)

News In Short

  • हाई कोर्ट ने न्यायिक अधिकारी से जुड़े मामले में की सख्त टिप्प्णी
  • कोर्ट ने कहा, जज की ईमानदारी व आचरण की शुद्धता से समझौता नहीं
  • न्यायिक अधिकारी को दूसरे जज को प्रभावित करने की कोशिश पर मिली सजा
  • फुल कोर्ट ने न्यायिक अधिकारी की 3 वेतन वृद्धि रोकने की दी थी सजा
  • सजा के आदेश को रद्ध करने से हाईकोर्ट का इनकार, याचिका खारिज

News In Detail

राजस्थान हाई कोर्ट ने उस आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया, जिसमें न्यायिक अधिकारी गोविंद अग्रवाल की तीन सालाना वेतन वृद्धि रोक दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा, ईमानदारी और नैतिकता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। न्यायिक सेवा अन्य सेवाओं के समान नहीं है। इसलिए इसमें अन्य सेवाओं के समान कैरियर संबंधी सिद्वांत लागू नहीं होते।

इसलिए हाई कोर्ट को करनी पड़ी सख्त टिप्पणी  

याचिकाकर्ता गोविंद अग्रवाल न्यायिक अधिकारी हैं। उनके पिता जयपुर में प्रेक्टिशनर एडवोकेट हैं। जयपुर की एक कोर्ट में दो सिविल मामले पेंडिंग थे। इनमें से एक में याचिकाकर्ता के पिता पक्षकार थे। संयोग से दोनों मामलों में वह बचाव पक्ष के वकील भी थे। मामलों की सुनवाई करने वाले जज महेंद्र कुमार शर्मा ने शिकायत की थी कि याचिकाकर्ता न्यायिक अधिकारी गोविंद अग्रवाल ने इन दोनों मामलों को प्रभावित करने के लिए उसने संपर्क किया था।

याचिका कर दी खारिज

इस मामले में हाई कोर्ट जज ने जांच की और अपनी रिपोर्ट में आरोप सही माने थे। इस जांच रिपोर्ट के आधार पर फुल कोर्ट ने सजा के तौर पर याचिकाकर्ता की तीन वेतन वृद्धि रोकने के आदेश दिए थे। याचिकाकर्ता ने सजा के आदेश केा रद्ध करने के लिए याचिका दायर की थी। जस्टिस इंद्रजीत सिंह व जस्टिस रवि चिरानिया की कोर्ट ने जांच प्रक्रिया में किसी प्रकार की कमी नहीं होने तथा आरोपों की सत्यता साबित होने को सही मानते हुए दखल देने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी है।

पवित्र दायित्व है न्याय करना

हाई कोर्ट ने कहा है कि न्यायिक अधिकारी राज्य की सार्वभौमिक न्यायिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए वे दूसरों से अलग है। न्याय करना एक पवित्र दायित्व है। इसलिए एक जज का स्तर अन्य सेवाओं के समान नहीं होता। कोर्ट ने कहा है कि जज आमजन के न्यायपालिका में विश्वास के आधार पर काम करते हैं। इसलिए उनकी ईमानदारी,स्वतंत्रता व आचरण में नैतिकता संदेह से परे होनी ही चाहिए। इन मापदंडों में कोई समझौता नहीं हो सकता।

जनता का असीम विश्वास

कोर्ट ने कहा है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में आमजन का न्यायपालिका में गहरा विश्वास है। अधीनस्थ या जिला अदालतें न्यायिक प्रणाली की रीढ़ है। इसलिए यदि इसके प्रति विश्वास में कमी आती है तो इसे ना तो अनदेखा किया जा सकता है और ना ही ढ़िलाई बरती जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार हाई कोर्ट न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अनुशानात्मक कार्रवाई के मामलों में सीमित दखल दे सकता है।

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