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Photograph: (the sootr)
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द सूत्र एक्सप्लेनर:- राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने ऑनर ​​किलिंग पर अंकुश लगाने वाले विधेयक को लौटा दिया है। इसे पर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार ने पारित किया था। आइए विधेयक के प्रावधानों और इसे वापस लौटाए जाने के कारणों पर नज़र डालते हैं:-
राजस्थान ऑनर किलिंग बिल की क्या जरूरत थी?
राजस्थान में सामाजिक सम्मान और परंपरा के नाम पर वैवाहिक संबंधों में हस्तक्षेप निषेध विधेयक का उद्देश्य ऑनर किलिंग पर अंकुश लगाना था। विधेयक के बयान में खुद अशोक गहलोत ने कहा था, सगोत्र विवाह और दो वयस्क व्यक्तियों के बीच इंटर कास्ट और अंतर-धार्मिक विवाहों पर दबाव बनाने के लिए कुछ स्वयंभू संगठनों से धमकियां मिल रही हैं।
ऐसी धमकियों में परिवार, जाति या समुदाय के सम्मान की रक्षा का नाम लिया जाता है। ऐसे मामलों में हिंसा भड़काने का सहारा लिया जाता है। नवविवाहित जोड़ों या शादी करने के इच्छुक व्यक्तियों को इसका शिकार बनाया गया है। कुछ मामलों में उनकी हत्या भी कर दी गई है। हालांकि, यह भारतीय दंड संहिता में अपराध हैं। लेकिन, ऐसे कृत्यों में दोषियों को कड़ी सजा देना आवश्यक है।
इसमें क्या-क्या प्रावधान थे?
इस विधेयक में ऑनर ​​किलिंग पर अंकुश के लिए गैर-कानूनी सभा, स्वतंत्रता को खतरे में डालना और धमकी को परिभाषित किया गया। विधयेक में सभी अपराध संज्ञेय, गैर-जमानती और गैर-समझौता योग्य माने गए।
स्वतंत्रता को खतरे में डालने को ऐसे परिभाषित किया कि जब व्यक्ति किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को विवाह को रोकने या अस्वीकार करने के लिए खुले तौर पर या अन्यथा सलाह देते हैं, उकसाते हैं या दबाव डालते हैं।
“इकट्ठा होना”, “एकत्रित होना” या “इकट्ठा होना” में किसी भी तकनीकी साधन या माध्यम के जरिए मिलकर कार्य करना शामिल था। क्योंकि, आम तौर ऐसी प्रस्तावित कार्रवाइयों का प्रचार सोशल मीडिया पर किया जाता है। विधेयक का उद्देश्य ऐसे दंपत्ति या उनके परिवार को बहिष्कृत करने वालों को जवाबदेह ठहराना भी था, जो उन्हें गांव छोड़ने के लिए दबाव डालना, उनकी जमीन या संपत्ति छीनना या उन पर जुर्माना लगाना शामिल था।
प्रस्तावित विधेयक में संबंधित डीएम या एसडीएम को इस तरह की गैरकानूनी सभाओं पर रोक लगाने सहित निवारक उपाय करने का निर्देश भी दिया गया था।
इस विधेयक में क्या-क्या दंड प्रावधान थे?
विधेयक में परिभाषित गैर-कानूनी सभा के सदस्यों को छह महीने से पांच साल तक की कैद और 1 लाख रुपए तक के जुर्माने की सजा का प्रावधान किया गया। ऐसे दंपत्ति या उनके समर्थकों की स्वतंत्रता को "शत्रुता का माहौल बनाकर" खतरे में डालने पर दो से पांच साल तक की कैद और 1 लाख रुपए तक के जुर्माने की सजा का प्रावधान था। विधेयक में आपराधिक धमकी के लिए सात साल तक की सजा का भी प्रस्ताव था।
ऐसे मामलों में मामूली चोट पहुंचाने पर तीन से पांच साल तक की कैद और 2 लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता था। गंभीर चोट पहुंचाने पर कम से कम दस साल की कैद, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता था। साथ ही 3 लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता था।
ऐसे दंपत्ति या उनमें से किसी एक की मृत्यु होने पर दोषी को मृत्युदंड और आजीवन कारावास का प्रावधान रखा गया। साथ ही ऐसे मामलों में 5 लाख रुपए तक के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
राज्यपाल ने विधेयक वापस क्यों लौटाया?
भजनलाल शर्मा सरकार ने अपने तर्कों में कहा कि 2019 का विधेयक भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की कुछ निरस्त धाराओं से संबंधित है। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 103 ऑनर किलिंग से निपटने के लिए पर्याप्त है। उदाहरण के लिए बीएनएस की धारा 103 के अनुसार, हत्या के लिए मृत्युदंड या आजीवन कारावास के साथ-साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
क्या देश में कहीं और ऐसा कानून हैं?
फिलहाल, किसी भी राज्य में ऐसा कोई कानून नहीं है। हाल ही में कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार ने भी एक कानून का प्रस्ताव रखा है, जो विवाह संबंधी स्वतंत्रता की रक्षा के साथ-साथ "ऑनर किलिंग" को एक विशिष्ट अपराध श्रेणी के रूप में संबोधित करेगा। विधेयक अभी मसौदा तैयार करने के चरण में है।
पिछले साल दिसंबर में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने राज्य में ऑनर किलिंग को रोकने कानूनी और नीतिगत उपायों की सिफारिश करने के लिए एक आयोग के गठन की घोषणा की थी।
2011 में, गैरकानूनी सभा निषेध (वैवाहिक संबंधों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप) विधेयक का मसौदा भारत के विधि आयोग द्वारा प्रस्तावित किया गया था। लेकिन, इसे कभी अधिनियमित नहीं किया गया।
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