शेखावत युग के कानून का भाजपा सरकार में हुआ अंत, मोदी के दौरे से महसूस हुई सियासी तपिश

Jinesh Jain | Feb 28, 2026, 17:42 IST
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Photograph: (the sootr)

यह सप्ताह राजस्थान के लिए मिश्रित रहा। एक तरफ 30 साल पुराने कानूनों की बेड़ियां टूटीं तो दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के पुराने दागों की सफाई का अभियान तेज हुआ। पीएम के दौरे ने विकास की उम्मीदें जगाई हैं।

राजस्थान की मरूधरा इस सप्ताह केवल अपनी गुलाबी ठंड की विदाई के लिए नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में आए बड़े नीतिगत बदलावों और सियासी बयानों की तपिश के लिए चर्चा में रही। एक तरफ भजनलाल सरकार ने भाजपा के दिग्गज माने जाने वाले भैरोंसिंह शेखावत के तीन दशक पुराने कानून को बदल दिया, वहीं प्रधानमंत्री के दौरे ने प्रदेश की विकास गाथा को नई धार दी। आइए, नजर डालते हैं राजस्थान के इस सप्ताह के उन घटनाक्रमों पर, जिन्होंने प्रदेश की दिशा और दशा को प्रभावित किया।

भाजपा सरकार में शेखावत युग के फैसले का अंत

राजस्थान की राजनीति में इस हफ्ते सबसे बड़ा फैसला सचिवालय की कैबिनेट बैठक से निकला। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने 1995 के उस ऐतिहासिक फैसले को पलट दिया है, जिसने 30 साल से राजस्थान की स्थानीय राजनीति की पटकथा लिखी थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत ने जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से प्रावधान किया था कि दो से अधिक संतान वाले व्यक्ति पंचायती राज और नगरीय निकाय चुनाव नहीं लड़ सकेंगे।

भजनलाल कैबिनेट ने राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 2026 और राजस्थान नगर पालिका अधिनियम 2026 को मंजूरी देकर इस पाबंदी को समाप्त कर दिया है। यह फैसला दिलचस्प इसलिए है, क्योंकि भाजपा की ही सरकार ने अपने दिग्गज नेता 'बाबोसा' के फैसले को एक्सपायरी मानकर बदल दिया। जानकारों का मानना है कि ज़मीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का भारी दबाव और बदलती सामाजिक परिस्थितियों ने सरकार को यह कदम उठाने पर मजबूर किया।



supreme court
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दिल्ली की दहलीज पर नगरीय निकाय चुनाव

प्रदेश की 309 नगरीय निकायों में कुछ समय बाद चुनावी बिगुल बजने ही वाला था, लेकिन यह कानूनी पेच में फंस गया। राजस्थान हाईकोर्ट से 113 निकायों के परिसीमन को रद्द किए जाने के बाद मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सरकार का तर्क है कि वार्डों की आंतरिक सीमाएं बदलने से प्रशासनिक और चुनावी तैयारियां गड़बड़ा गई हैं। ऐसे में बिना नई सीमाओं के चुनाव कराना संवैधानिक संकट खड़ा कर सकता है। यह कानूनी दांवपेच बताता है कि राजस्थान में स्थानीय सत्ता का मोह और उसके पीछे का प्रशासनिक गणित कितना जटिल है।

मोदी का अजमेर दौरा और विकास की सौगात

​सप्ताह के आखिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अजमेर की धरती से मिशन 2026 और उससे आगे का रोडमैप साझा किया। प्रधानमंत्री का यह दौरा तीन मुख्य स्तंभों पर टिका रहा। उन्होंने न केवल प्रदेश की 16,686 करोड़ रुपए की विकास परियोजनाओं का लोकार्पण या शिलान्यास किया, बल्कि प्रदेश में सरकारी नौकरियों में आए 21,863 नवनियुक्त युवाओं को नियुक्ति पत्र सौंपा। मोदी ने अजमेर में 9 से 14 वर्ष की बालिकाओं के लिए एचपीवी टीकाकरण अभियान की शुरुआत की। सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ यह देशव्यापी जंग अब अजमेर से शुरू होकर हर घर तक पहुंचेगी।
मोदी के भाषण में तीखापन तब आया जब उन्होंने कांग्रेस पर जमकर हमला बोला। उन्होंने 'INC' (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) का नया अर्थ 'MMC' (मुस्लिम लीग माओवादी कांग्रेस) बताया। प्रधानमंत्री का यह बयान साफ करता है कि आने वाले समय में वैचारिक ध्रुवीकरण और तीखी बयानबाजी राजस्थान की राजनीति का मुख्य केंद्र बनी रहेगी।



rasmika
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लेक सिटी में 'सितारा' विवाह: रश्मिका-विजय की शाही शादी

राजस्थान एक बार फिर दुनिया के लिए 'वेडिंग डेस्टिनेशन' का सिरमौर साबित हुआ। इस सप्ताह दक्षिण भारतीय सिनेमा के दो बड़े सितारे रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा ने उदयपुर के होटल मेमेटोस एकाया में सात फेरे लिए। कोडवा और तेलुगु परंपराओं का यह संगम दर्शाता है कि राजस्थान की मिट्टी में विविधता को समेटने की अद्भुत क्षमता है। केवल 200 खास मेहमानों की मौजूदगी में हुई इस शादी ने उदयपुर के पर्यटन और 'रॉयल वेडिंग' ब्रांड को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई मजबूती दी है।



subhod
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भ्रष्टाचार का बहाव और रडार पर पूर्व आईएएस

​राजस्थान में एक तरफ विकास की बातें हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर जल जीवन मिशन घोटाले ने प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इस घोटाले के मुख्य किरदार रिटायर्ड आईएएस सुबोध अग्रवाल फिलहाल फरार हैं। एसीबी और ईडी की जांच में यह सामने आया है कि जिस मिशन का काम प्यास बुझाना था, उसे कुछ भ्रष्ट अफसरों ने तिजोरी भरने का जरिया बना लिया।

​ईडी की रिपोर्ट के अनुसार सुबोध अग्रवाल को घोटाले की जानकारी थी, फिर भी उन्होंने दागी कंपनियों के भुगतान के रास्ते साफ किए। हालांकि इस घोटाले में एसीबी की गिरफ्त में आए 10 में से 3 आरोपियों को जमानत मिल गई है, लेकिन जांच की आंच अब सचिवालय के ऊंचे कमरों तक पहुंच रही है।

विधायक बनाम तहसीलदार विवाद का अंत

विधानसभा की गरिमा और जनप्रतिनिधि के विशेषाधिकार को लेकर चल रहा दौसा का विवाद आखिरकार सुलझ गया है। तहसीलदार गजानंद मीणा ने विधायक डीसी बैरवा से किए गए अभद्र व्यवहार के लिए विधानसभा स्पीकर वासुदेव देवनानी को माफीनामा भेजा। ​यह प्रकरण सत्ता और प्रशासन के बीच के संतुलन का एक बड़ा उदाहरण बना। स्पीकर देवनानी की कड़ाई ने यह संदेश दिया कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि की गरिमा सर्वोपरि है और अधिकारी अपनी मर्यादा नहीं लांघ सकते।

फिर मिलेंगे अगले सप्ताह की चिट्ठी के साथ।

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