तहसीलदार की 'बदसलूकी' पर विधानसभा सख्त, विशेषाधिकार हनन का नोटिस मंजूर

Mukesh Sharma | Feb 14, 2026, 18:32 IST
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MLA
Photograph: (the sootr)

राजस्थान में कांग्रेस ने दौसा ​के तहसीलदार गजानंद मीणा के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया है। यह नोटिस विधानसभा स्पीकर वासुदेव देवनानी को दिया, जिन्होंने इसे स्वीकार कर उचित कार्रवाई का विश्वास दिलाया।

News In Short

  • कांग्रेस विधायक डीसी बैरवा और तहसीलदार गजानंद मीणा का विवाद गरमाया।
  • कांग्रेस ने तहसीलदार के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया।
  • स्पीकर वासुदेव देवनानी ने नोटिस स्वीकार कर उचित कार्रवाई का दिया आश्वासन।
  • यह मामला अब विशेषाधिकार समिति के पास जांच के लिए जाएगा।
  • अतिक्रमण हटाने को लेकर विधायक और तहसीलदार में हुई थी तकरार।

News In Detail

Jaipur: राजस्थान की सियासत में ब्यूरोक्रेसी (नौकरशाही) के हावी होने का मुद्दा फिर गरमा गया है। दौसा से कांग्रेस विधायक डीसी बैरवा और तहसीलदार गजानंद मीणा के बीच उपजा विवाद अब महज एक प्रशासनिक तनातनी नहीं, बल्कि राजस्थान विधानसभा के 'विशेषाधिकार' का मामला बन चुका है। विधायक बैरवा ने अपनी ही पार्टी के अन्य विधायकों के साथ मिलकर विधानसभा स्पीकर वासुदेव देवनानी को तहसीलदार के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस सौंपा है, जिसे स्पीकर ने स्वीकार करते हुए उचित कार्रवाई का भरोसा दिया है।

​क्या है पूरा मामला

विवाद की जड़ दौसा में सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई है। आरोप है कि इस दौरान तहसीलदार गजानंद मीणा और विधायक डीसी बैरवा के बीच तीखी नोकझोंक हुई। विधायक का आरोप है कि तहसीलदार ने न केवल उनके साथ बदतमीजी की, बल्कि उन्हें धमकी भी दी और यहां तक कह डाला कि-इस जमीन का मालिक मैं हूं। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। विधायक बैरवा ने तहसीलदार पर भू-माफियाओं के साथ साठगांठ करने के गंभीर आरोप भी लगाए हैं।

स्पीकर के बुलाने पर भी नहीं आए कलेक्टर

​विधायक बैरवा ने इस मामले में ब्यूरोक्रेसी के रवैये पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए स्पीकर वासुदेव देवनानी ने दौसा कलेक्टर और तहसीलदार को तलब किया था। लेकिन ताज्जुब की बात यह रही कि स्पीकर के बुलावे के बावजूद कलेक्टर उपस्थित नहीं हुए। ​बैरवा ने कहा कि कलेक्टर का नहीं आना यह दर्शाता है कि प्रदेश में ब्यूरोक्रेसी किस कदर बेलगाम हो चुकी है। यह केवल मेरा अपमान नहीं है, बल्कि सदन के सभी 200 विधायकों और स्वयं स्पीकर महोदय का अपमान है।

​अब आगे क्या? विशेषाधिकार समिति करेगी फैसला

​स्पीकर द्वारा नोटिस मंजूर किए जाने के बाद अब यह मामला विधानसभा की विशेषाधिकार हनन कमेटी को सौंपा जाएगा।


​जांच प्रक्रिया: कमेटी तहसीलदार और अन्य संबंधित पक्षों को पूछताछ के लिए समन जारी करेगी।

​संभावित सजा: यदि जांच में तहसीलदार दोषी पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है। इसमें निलंबन, वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) रोकने से लेकर जेल तक का प्रावधान है।

​समिति का ढांचा: 11 सदस्यीय इस समिति में भाजपा का बहुमत है। समिति के अध्यक्ष भाजपा विधायक केसाराम चौधरी हैं। इसमें भाजपा के 6, कांग्रेस के 3, बीएपी का 1 और 1 निर्दलीय विधायक शामिल हैं।

जब एक इंस्पेक्टर को हुई थी 30 दिन की जेल

​यह पहली बार नहीं है, जब राजस्थान विधानसभा किसी अधिकारी के खिलाफ इतनी सख्त हुई हो। साल 2013 का पुलिस इंस्पेक्टर रत्ना गुप्ता का मामला आज भी नजीर के तौर पर याद किया जाता है। तत्कालीन विधायक सूर्यकांता व्यास की अध्यक्षता वाली समिति जब गांधी नगर महिला थाना के निरीक्षण पर गई थी, तब इंस्पेक्टर रत्ना गुप्ता ने दस्तावेज देने से इनकार कर दिया था और अभद्र व्यवहार किया था।

​विधानसभा ने अगस्त 2013 में अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए रत्ना गुप्ता को 30 दिन की जेल की सजा सुनाई थी। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट और सत्ता परिवर्तन के बाद उन्हें कुछ राहत मिली, लेकिन इस केस ने अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया था कि सदन की गरिमा सर्वोपरि है।

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

​विधायक बैरवा ने आरोप लगाया है कि तहसीलदार को मुख्यमंत्री और भाजपा सरकार का संरक्षण प्राप्त है, जिसके कारण उन पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। विपक्ष का तर्क है कि अगर सरकार की मंशा साफ होती, तो विधायक के साथ सार्वजनिक बदसलूकी करने वाले अधिकारी पर अब तक गाज गिर चुकी होती।

सदन में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने भी इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया है। शून्यकाल से लेकर राज्यपाल के अभिभाषण तक, कांग्रेस इस मुद्दे पर तीन बार सदन में हंगामा कर चुकी है।

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