रेतीले धोरों में दफन हैं मोहब्बत की वो दास्तां, जिनके आगे हीर-रांझा भी पड़ जाएं फीके

The Sootr | Feb 13, 2026, 12:24 IST
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Ashish Bhardwaj (8)
Photograph: (the sootr)

​इस वेलेंटाइन डे पर आइए, जानते हैं राजस्थान की उन पांच ऐतिहासिक प्रेम कहानियों के बारे में, जहां प्रेम कहीं बलिदान बना, तो कहीं भक्ति की पराकाष्ठा। ये प्रेम कहानियां आज भी रेतीले धोरों में याद की जाती हैं।

योगेंद्र योगी@​जयपुर

जब बात प्रेम की आती है, तो अक्सर दुनिया रोमियो-जूलियट या हीर-रांझा की मिसाल देती है। लेकिन, राजस्थान की मरुधरा केवल किलों की प्राचीर और युद्धों के शंखनाद की गवाह नहीं रही है, यहां की हवाओं में प्रेम की वो खुशबू भी घुली है, जो सदियों बाद आज भी धोरों में महसूस की जा सकती है। ये प्रेम कहानियां बताती हैं कि राजस्थान में प्रेम केवल पाने का नाम नहीं है। यहां प्रेम कभी शिल्प (नक्की झील) बना, कभी कला (बणी-ठणी) बना, तो कभी मर्यादा (जवाहर सिंह)। इस वेलेंटाइन डे पर, जानें राजस्थान की पांच ऐतिहासिक प्रेम कहानियों के बारे में।

​नक्की झील: एक अधूरा सपना और 'नाखूनों' से लिखी मोहब्बत

​माउंट आबू की खूबसूरत नक्की झील को आज लोग एक पर्यटन स्थल मानते हैं, लेकिन इसके पीछे एक शिल्पकार रसिया बालम का अटूट प्रेम छिपा है।

राजा ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए शर्त रखी, जो एक रात में नाखूनों से झील खोद देगा, वही राजकुमारी का हाथ थामेगा। रसिया बालम ने रातभर में झील खोद दी, लेकिन राजकुमारी की मां ने छल से भोर होने से पहले ही 'मुर्गे की बांग' दे दी।
हार के गम में रसिया ने प्राण त्याग दिए। यहां के कुंवारी कन्या मंदिर में आज भी महिलाएं उस छल करने वाली मां की मूर्ति पर पत्थर फेंकती हैं, जो सच्चे प्रेम के बीच दीवार बनी थी।

​अनिरुद्ध और ऊषा: जब प्रेम के लिए युद्ध में उतरे श्रीकृष्ण

भरतपुर के बयाना स्थित ऊषा मंदिर उस काल का साक्षी है, जब प्रेम ने धर्म और युद्ध की सीमाओं को लांघ दिया था। बाणासुर की पुत्री ऊषा को श्रीकृष्ण के प्रपौत्र अनिरुद्ध से सपने में प्रेम हुआ। सखी चित्रलेखा ने योगबल से अनिरुद्ध का अपहरण कर लिया।

जब बाणासुर ने अनिरुद्ध को बंदी बनाया, तो खुद भगवान श्रीकृष्ण को युद्ध लड़ना पड़ा। अंततः प्रेम की जीत हुई और बाणासुर ने दोनों का विवाह स्वीकार किया।

​बणी-ठणी: राजस्थान की 'मोनालिसा' जिसका प्रेम भक्ति बन गया

​किशनगढ़ की कला और संस्कृति की पहचान 'बणी-ठणी' केवल एक पेंटिंग नहीं, बल्कि राजा सावंत सिंह और एक दासी के प्रेम की अमर कृति है।

​दोनों की रुचि साहित्य और संगीत में थी, जिसने उन्हें करीब लाया। जब समाज ने सवाल उठाए, तो राजा ने राजपाठ छोड़ दिया और वृंदावन जाकर 'नागरीदास' बन गए। बणी-ठणी ने भी अपना जीवन कृष्ण भक्ति और अपने प्रेमी के नाम कर दिया।

​मूमल-महेन्द्र: एक गलतफहमी और प्राणों का उत्सर्ग

​जैसलमेर की राजकुमारी मूमल और अमरकोट (पाक) के राणा महेन्द्र की कहानी रेगिस्तान की सबसे दर्दनाक दास्तानों में से एक है महेन्द्र हर रात ऊंट पर सवार होकर 100 कोस (लगभग 300 किमी) का सफर तय कर मूमल से मिलने आते थे।
​एक रात मूमल की बहन ने मजाक में पुरुष के कपड़े पहने थे, जिसे देख महेन्द्र ने मूमल को चरित्रहीन समझ लिया और लौट गए। बाद में जब महेन्द्र ने मूमल की परीक्षा लेने के लिए अपनी झूठी मृत्यु की खबर भेजी, तो वियोग में मूमल ने दम तोड़ दिया। महेन्द्र भी इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सके और वहीं प्राण त्याग दिए।

जवाहर सिंह और गन्ना बेगम: मर्यादा और प्रेम का संघर्ष

​भरतपुर के युवराज जवाहर सिंह और गन्ना बेगम की कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम में मर्यादा कितनी महत्वपूर्ण है। जवाहर सिंह ने गन्ना बेगम को पाने के लिए दो बार अपहरण की योजना बनाई, लेकिन दोनों बार अपने पिता महाराजा सूरजमल के आदर्शों और लोकलाज के कारण पीछे हट गए। उन्होंने अपनी चाहत से ऊपर पिता के सम्मान को रखा।

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