कैसे बना रामगढ़ क्रेटर, वैज्ञानिकों को मिली अहम जानकारी, जानें पूरी मामला

राजस्थान में बारां जिले के रामगढ़ क्रेटर में वैज्ञानिकों को सूक्ष्म चुंबकीय कणों से महत्वपूर्ण संकेत मिले हैं। इससे अब यह पता चलेगा कि यहां 16.5 करोड़ साल पहले उल्कापिंड गिरा था।

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Ashish Bhardwaj
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Ramgarh creter

Photograph: (the sootr)

News In Short 

  • रामगढ़ क्रेटर में वैज्ञानिकों को मिले सूक्ष्म चुंबकीय कणों से महत्वपूर्ण संकेत
  • इन संकेतों से पता चलेगा कि रामगढ़ क्रेटर 16.5 करोड़ साल पुराना
  • भू वैज्ञानिकों का कहना है कि यह संरचना ऊपरी मध्य जुरासिक युग में बनी थी।
  • शोध में मिली माइक्रोटेक्टाइट्स जैसी संरचना ने उल्कापिंड टकराव का प्रमाण दिया।
  • रासायनिक विश्लेषण में आयरन, निकेल और सिलिकॉन की मौजूदगी पाई गई।

News In Detail 

राजस्थान के बारां जिले में ऐतिहासिक रामगढ़ क्रेटर के बारे में वैज्ञानिकों को अहम जानकारी मिली है। भू वैज्ञानिकों के शोध में क्रेटर की तलछटी में पाए गए सूक्ष्म चुंबकीय कणों से यह संकेत मिले हैं कि लगभग 16.5 करोड़ साल पहले यहां लौह समृद्ध उल्कापिंड धरती से टकराया था। इस शोध के अनुसार, यह संरचना उस समय बनी जब एक उल्कापिंड पृथ्वी से टकराया था और इस टक्कर से क्रेटर में लगभग 3.5 किलोमीटर व्यास का गड्ढा बन गया।

शोध का महत्व और आगामी प्रस्तुति

यह शोध अमेरिका के टैक्सास शहर में 16 से 20 मार्च, 2026 तक होने वाली लूनर एंड प्लेनेटरी साइंस कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत किया जाएगा। 2020 से लगातार इस क्रेटर पर शोध किए जा रहे थे। यह नया अध्ययन वैज्ञानिकों के लिए एक और महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

शोध के दौरान किए गए प्रयोग

करीब डेढ़ महीने पहले दिल्ली और हरियाणा से आई शोध टीम ने रामगढ़ क्रेटर पर ड्रोन से कई प्रकार की जांच की। टीम ने चट्टानों और पत्थरों के नमूने एकत्र किए, फिर इनका विश्लेषण किया। शोधकर्ताओं ने क्रेटर के भीतर खोदी गई दो उथली खाइयों से लगभग 30 तलछटी नमूने एकत्र किए। चुंबकों की मदद से मिट्टी से सूक्ष्म चुंबकीय कण अलग किए गए, और फिर उनका सूक्ष्मदर्शी और रासायनिक विश्लेषण किया गया।

माइक्रोटेक्टाइट्स से मिलती जुलती संरचना

शोध के दौरान पाए गए कणों की संरचना माइक्रोटेक्टाइट्स से मिलती जुलती है, जो अक्सर उल्कापिंड टकराव के दौरान बनते हैं। इन कणों का आकार एक मिलीमीटर से भी छोटा और गोलाकार था, जो यह संकेत देता है कि टकराव के समय चट्टानें अत्यधिक तापमान पर पिघलकर हवा में उछलीं और फिर ठंडी होकर ठोस बनीं।

रासायनिक विश्लेषण के परिणाम

शोध में यह पाया गया कि इन कणों में आयरन, निकेल और सिलिकॉन की मौजूदगी थी। खासकर निकेल का पाया जाना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उल्कापिंडों में सामान्य रूप से पाया जाता है, लेकिन रामगढ़ क्षेत्र की बलुआ पत्थर चट्टानों में यह दुर्लभ है। कुछ कणों में अत्यधिक आयरन और आयरन समृद्ध खनिज संरचनाएं भी पाई गईं।

भविष्य में और शोध की संभावना

वैज्ञानिकों का दावा है कि भविष्य में और अधिक अध्ययन से टकराव के समय की सही प्रकृति और उल्कापिंड की पहचान के बारे में ठोस प्रमाण मिल सकते हैं। यह अध्ययन इस क्षेत्र के भूविज्ञान और पृथ्वी पर उल्कापिंडों के प्रभाव को समझने में सहायक हो सकता है।

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