तबादले में प्रशासनिक जरूरतें अहम, कोर्ट ने कहा- कर्मचारी को मनचाही जगह पोस्टिंग का कानूनी अधिकार नहीं

Jageshwar prasad | Oct 23, 2026, 11:05 IST
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राजस्थान हाई कोर्ट: जीवनसाथी की एक जगह पोस्टिंग पूर्ण अधिकार नहीं
राजस्थान हाई कोर्ट: जीवनसाथी की एक जगह पोस्टिंग पूर्ण अधिकार नहीं

राजस्थान हाई कोर्ट ने जीवनसाथी के पास तबादले की मांग वाली याचिकाएं खारिज कर दी हैं। कोर्ट ने कहा कि एक ही स्थान पर पोस्टिंग का कानूनी अधिकार नहीं है। परिवार की जिम्मेदारी सिर्फ एक जीवनसाथी पर नहीं डाली जा सकती। याचिकाकर्ताओं को दोबारा अभ्यावेदन देने की छूट मिली है।

राजस्थान हाई कोर्ट (Rajasthan High Court) ने पति-पत्नी की एक स्थान पर पोस्टिंग वाली याचिकाएं खारिज कर दी हैं। जस्टिस कुलदीप माथुर की पीठ ने कहा कि पति-पत्नी को एक जगह पोस्टिंग मिलना कानूनी अधिकार नहीं है।

परिवार संभालने की जिम्मेदारी केवल एक जीवनसाथी पर नहीं डाली जा सकती। कोर्ट ने तबादले के मामलों में दखल देने से इनकार कर दिया। हालांकि कर्मचारियों को अधिकारियों के सामने दोबारा आवेदन देने की छूट मिली है।

क्या कहा राजस्थान हाई कोर्ट ने?

जस्टिस कुलदीप माथुर (Justice Kuldeep Mathur) की पीठ ने सरकारी कर्मचारियों की कई याचिकाओं पर सुनवाई की। कर्मचारियों ने जीवनसाथी की पोस्टिंग वाली जगह तैनाती मांगी थी। उन्होंने पति-पत्नी को एक जगह रखने की सामान्य नीति का हवाला दिया।

कोर्ट ने कहा कि सिर्फ ऐसी नीति का होना काफी नहीं है। इच्छित जगह पर पद खाली होना भी काफी नहीं है। इनसे तबादले का कानूनी अधिकार अपने आप नहीं बनता।

राजस्थान हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: नव प्रसूता कर्मचारियों के लिए बनेगी तबादला नीति, मां-बच्चे के बंधन को तोड़ना अनुचित | Rajasthan High Court's Big Decision: Transfer Policy to be made for New Mothers Employees, Breaking Mother-Child Bond Unjustified
हाल ही में मां बनी महिला कर्मचारियों के लिए बने तबादला नीति, राजस्थान हाई कोर्ट ने दिया आदेश
02 Oct 2026 ,
By Jageshwar prasad
राजस्थान हाई कोर्ट ने हाल ही में मां बनी महिला कर्मचारियों के तबादलों पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। यह निर्णय सुमन मीणा की याचिका के संदर्भ में लिया गया है। अदालत ने राज्य सरकार को एक उचित तबादला नीति बनाने के निर्देश जारी किए हैं। इस नीति के अभाव में मां और शिशु को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
राजस्थान हाई कोर्ट ने हाल ही में मां बनी महिला कर्मचारियों के तबादलों पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। यह निर्णय सुमन मीणा की याचिका के संदर्भ में लिया गया है। अदालत ने राज्य सरकार को एक उचित तबादला नीति बनाने के निर्देश जारी किए हैं। इस नीति के अभाव में मां और शिशु को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

तबादले में किन बातों पर गौर

कोर्ट के अनुसार तबादले के फैसले में कई पहलू देखने जरूरी हैं। इनमें पद की प्रकृति और संबंधित कैडर शामिल हैं। सेवा नियम भी देखे जाते हैं।

मौजूदा और प्रस्तावित जगह पर कर्मचारियों की जरूरत भी देखी जाती है। कार्यकाल और कर्मचारी की उपयुक्तता भी मायने रखती है। प्रशासन की दूसरी जरूरतें भी गिनी जाती हैं।

जेल और पुलिस जैसे विभागों में पर्याप्त कार्यबल रखना खास तौर पर अहम है। इसलिए नीति को बिना सोचे यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता।


बदलते समाज पर टिप्पणी

कोर्ट ने माना कि समय के साथ सामाजिक हालात बदले हैं। काम में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। इसलिए पोस्टिंग की जरूरत को पुरानी धारणा से नहीं परखा जा सकता।

कोर्ट के अनुसार यह धारणा सही नहीं है। यह मानना ठीक नहीं कि परिवार की जिम्मेदारी एक ही जीवनसाथी निभाता है।

पीठ ने कहा कि आज दोनों जीवनसाथियों की अपनी सेवा संबंधी बाध्यताएं होती हैं। उनकी पेशेवर जिम्मेदारियां और करियर की प्राथमिकताएं भी होती हैं। यह नहीं माना जा सकता कि दूसरे को हमेशा अपनी करियर प्राथमिकता छोड़नी होगी।

निष्पक्ष और समकालीन नजरिया यही है कि दोनों कर्मचारियों की हालत देखी जाए। किसी एक का तबादला दूसरे की सुविधा के लिए अपने आप नहीं बदलना चाहिए। साथ ही प्रशासन को पर्याप्त स्टाफ रखने और सार्वजनिक सेवाएं चलाने की जिम्मेदारी भी निभानी होती है।


कोर्ट ने सर्कुलर और नीति के अस्तित्व को माना

प्रशासनिक सुधार विभाग के 18 मई 2020 के सर्कुलर में भी यह पहलू आया। कोर्ट ने नीति और सर्कुलर के अस्तित्व को माना। लेकिन उसे पसंद की जगह तबादले का पूर्ण अधिकार नहीं माना।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला दिया। यह बैंक ऑफ इंडिया बनाम जगजीत सिंह मेहता का मामला है। उसमें कहा गया कि अधिकारी प्रशासनिक जरूरतें और दूसरे कर्मचारियों के दावे भी देखें। साथ ही उपयुक्त पोस्टिंग की संभावना पर भी विचार करें।





संतुलित नजरियाऔर अदालत की सीमा

कोर्ट ने संतुलित नजरिया अपनाने की बात कही। संवैधानिक मूल्यों और परिवार की असली जरूरतों को प्रशासनिक फैसलों में अहमियत मिलनी चाहिए। लेकिन यह लागू सेवा शर्तों और वैध प्रशासनिक जरूरतों के दायरे में होना चाहिए।

पुरानी नीति अपने आप अवैध नहीं हो जाती, कोर्ट ने कहा। पर उसका क्रियान्वयन मौजूदा जरूरतों और सेवा नियमों के अनुरूप होना चाहिए। नीति में बदलाव की जरूरत हो तो यह कार्यपालिका का विषय है। अदालत नीति को खुद दोबारा नहीं लिख सकती।

हाई कोर्ट ने कहा, हर मामले में दखल उचित नहीं

हाई कोर्ट ने साफ किया कि दखल हर मामले में नहीं होगा। फैसला मनमाना, भेदभावपूर्ण या दुर्भावनापूर्ण साबित हो, तो दखल बनता है। बाध्यकारी कानूनी प्रावधान के खिलाफ होने पर भी दखल उचित है। किसी और कानूनी आधार पर फैसला टिक न पाए, तब भी यही बात लागू होती है।

ऐसी स्थिति न हो तो अदालत अपनी पसंद का पोस्टिंग फैसला नहीं थोप सकती। फैसला लेने का हक सक्षम प्रशासनिक अधिकारी का है।

सभी याचिकाओं का हुआ निपटारा

कोर्ट को ऐसी कोई परिस्थिति नहीं मिली। इसलिए अधिकारियों को सामान्य निर्देश देकर तैनाती के लिए बाध्य करने का आधार नहीं बना। हाईकोर्ट ने सभी याचिकाओं का निपटारा कर दिया।

याचिकाकर्ताओं को छूट दी गई कि वे अधिकारियों के सामने नया अभ्यावेदन दें। अभ्यावेदन का मतलब है अपनी मांग लिखित में रखना। अब अधिकारी इन पर नियमों और जरूरतों के हिसाब से विचार करेंगे।
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