तीन बच्चे होने पर नहीं जाएगी सरकारी कर्मचारियों की नौकरी, प्रस्ताव को सीएम की मंजूरी

Aman Vaishnav | Mar 27, 2026, 09:37 IST
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mp government job three child policy update
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मध्य प्रदेश सरकार अब दो बच्चों वाली पाबंदी पूरी तरह हटाने की तैयरी में है। सामान्य प्रशासन विभाग ने इसका प्रस्ताव तैयार कर लिया है। इससे अब तीसरी संतान होने पर किसी भी कर्मचारी की नौकरी नहीं जाएगी।

मध्य प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। लंबे समय से चली आ रही दो बच्चों की अनिवार्य शर्त अब खत्म होने जा रही है। अब परिवार बढ़ने पर नौकरी खोने का डर हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। सरकार के इस कदम से हजारों परिवारों में छाई चिंता दूर होगी।

मुख्यमंत्री ने प्रस्ताव को दी मंजूरी

सरकारी नौकरी में अब दो बच्चों की पाबंदी हटने वाली है। सामान्य प्रशासन विभाग ने इसके लिए प्रस्ताव तैयार कर लिया है। इस पर सहमति भी बन गई है। अब यह जल्द ही कैबिनेट में पेश किया जाएगा। इसके बाद तीसरी संतान होने पर किसी भी कर्मचारी को नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकेगा।

सीएमओ के प्रमुख सचिव नीरज मंडलोई ने बताया कि प्रस्ताव को मुख्यमंत्री (सीएम मोहन यादव) की सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है। जो कर्मचारी अपनी नौकरी खो चुके हैं या जिनके मामले कोर्ट में अटके हैं, उनका फैसला अब कैबिनेट में किया जाएगा।
यह नियम 2001 में दिग्विजय सिंह सरकार द्वारा सिविल सेवा नियम 1961 में बदलाव करके लागू किया गया था। अब इस बदलाव से लगभग 30 हजार टीचर्स को राहत मिलेगी जिनके दो से ज्यादा बच्चे हैं।

क्या है बदलाव का कारण?

कुछ सालों से इस नियम की प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगे थे। इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ माना जाने लगा था। हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने तीन बच्चों पर जोर दिया था। इसके बाद इस नियम में बदलाव की प्रक्रिया तेज हो गई।

18 फरवरी को लखनऊ में मोहन भागवत ने घटती जनसंख्या पर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि समाज के अस्तित्व के लिए तीन बच्चों का औसत जरूरी है।

उनका कहना था कि जिस समाज में परिवार में तीन बच्चे नहीं होते वह भविष्य में खत्म हो जाता है। उन्होंने भारत की 2.1 प्रजनन दर का उदाहरण देते हुए इसे वैज्ञानिक तरीके से समझाया था।

फैसले का क्या असर होगा?

जिन मामलों पर कोर्ट और विभागीय स्तर पर फैसले लंबित हैं, उनका निर्णय अब मोहन कैबिनेट करेगी। तीसरी संतान से जुड़ी समस्याओं में कर्मचारियों को अब कानूनी लड़ाई और तनाव से राहत मिलेगी।

कर्मचारियों को बर्खास्तगी का डर खत्म हो जाएगा। इससे प्रभावित कर्मचारियों की नौकरी अब सुरक्षित रहेगी। अगर ऐसा होता है तो नई भर्तियों में अब तीन बच्चों वाले उम्मीदवार भी शामिल हो सकेंगे। इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। 2001 के बाद जिन कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया था उनके मामलों पर भी कैबिनेट फैसला लेगी।

पुराना नियम क्या है?

यह नियम दिग्विजय सिंह सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए लागू किया था। बता दें कि 26 जनवरी 2001 के बाद यदि किसी कर्मचारी के तीन बच्चे हो गए तो उसे सेवा के लिए अयोग्य माना जाता था। इस नियम का असर नई भर्ती और मौजूदा कर्मचारियों दोनों पर था।

अन्य राज्य भी कर चुके ऐसा

मध्य प्रदेश ऐसा करने वाला पहला राज्य नहीं है। राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने 11 मई 2016 और छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने 14 जुलाई 2017 को यह पाबंदी हटा दी थी। इन राज्यों में तीन बच्चों वाले कर्मचारी बिना किसी समस्या के नौकरी कर रहे हैं। वहीं आंध्र प्रदेश ने तीसरे बच्चे पर 25 हजार रुपए का प्रोत्साहन देने का ऐलान किया है।

न्यायाधीश को गंवानी पड़ी थी नौकरी

स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विभागों में इस फैसले को अपनाया जा रहा है। यहां करीब 8-10 हजार मामले लंबित थे। इस नियम की कठोरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक न्यायाधीश को भी अपनी नौकरी गंवानी पड़ी थी।

नौकरी के डर से नवजात को जंगल में छोड़ा

उदाहरण से समझिए, छिंदवाड़ा का एक जो मामला पिछले साल 30 सितंबर का है। छिंदवाड़ा के नांदनवाड़ी प्राइमरी स्कूल के टीचर बबलू डांडोलिया के पहले से तीन बच्चे थे। नौकरी जाने के डर से बबलू ने अपनी पत्नी राजकुमारी के गर्भवती होने की बात छिपा ली थी। 23 सितंबर को रात करीब 3 बजे उनके घर में बच्चे का जन्म हुआ। इसके बाद दोनों नवजात को नांदनवाड़ी गांव के पास के जंगल में ले गए।

यहां उन्होंने बच्चे को लावारिस छोड़ दिया और ऊपर पत्थर रख दिए। अगले दिन जब ग्रामीण जंगल की तरफ गए तो उन्हें बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। पत्थर हटाकर देखा तो बच्चा जिंदा था।

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