तीन प्रयास, तीनों में सफलता, IAS श्वेता चौहान की UPSC यात्रा और अनमोल सबक
Jageshwar prasad | May 23, 2026, 18:15 IST
Photograph: (the sootr)
तीन प्रयासों में तीन सफलताएं, लेकिन हर बार बेहतर रैंक की चाह- यह है राजस्थान कैडर की श्वेता चौहान की UPSC यात्रा। जिन्होंने 2016 में 8वीं रैंक पाई। उनकी सबसे बड़ी सीख – कोई एवरेज नहीं होता, बस सही दिशा में निरंतरता चाहिए।
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा को देश की सबसे कठिन और अनिश्चित परीक्षाओं में से एक माना जाता है। यहां हर साल लाखों युवा अपनी आंखों में अफसर बनने का सपना लिए उतरते हैं, लेकिन सफलता चंद सौ लोगों के हिस्से ही आती है। कई लोग बरसों की मेहनत के बाद भी प्रीलिम्स या मेन्स की दहलीज़ पार नहीं कर पाते। लेकिन जरा सोचिए, एक ऐसी शख्सियत के बारे में जिसने इस परीक्षा को एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि लगातार तीन बार क्रैक किया। और वह भी इसलिए नहीं कि उन्हें केवल नौकरी चाहिए थी, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्हें अपने मन-माफिक रैंक और सर्विस हासिल करनी थी।
यह कहानी है वर्ष 2017 बैच की राजस्थान कैडर की लोकप्रिय आईएएस (IAS) अधिकारी श्वेता चौहान की। वे उन विरले प्रशासनिक अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने यूपीएससी के चक्रव्यूह को न केवल तीन बार भेदा, बल्कि अपनी पुरानी कमियों से सीख लेते हुए अंततः देश में 8वीं रैंक (AIR 8) हासिल कर टॉपर्स की सूची में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों से दर्ज कराया।
वर्तमान में जयपुर में उद्यानिकी विभाग की कमिश्नर के रूप में कार्यरत श्वेता चौहान की जीवन यात्रा आज देश के करोड़ों सिविल सेवा एस्पिरेंट्स के लिए एक संपूर्ण गाइडबुक है।
IAS श्वेता चौहान मूल रूप से उत्तर प्रदेश (UP) की रहने वाली हैं। उनका जन्म ऐसे परिवार में हुआ जहां देश सेवा और अनुशासन रग-रग में बसा था। श्वेता के पिता भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। सेना के अनुशासित और देशभक्ति से ओत-प्रोत माहौल में पली-बढ़े होने के कारण श्वेता के भीतर बचपन से ही देश के लिए कुछ बड़ा करने की ललक थी।
वे अपने पिता को ही अपना सबसे बड़ा मार्गदर्शक, प्रेरणास्रोत और जीवन में अनुशासन का मूल आधार मानती हैं। पिता की सेना में नौकरी के कारण श्वेता की शुरुआती स्कूली शिक्षा देश के विभिन्न शहरों के केंद्रीय विद्यालयों से पूरी हुई।
स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद श्वेता ने देश की राजधानी का रुख किया और दिल्ली यूनिवर्सिटी के सबसे प्रतिष्ठित हिंदू कॉलेज में दाखिला लिया। यहां से उन्होंने फिजिक्स ऑनर्स में ग्रेजुएशन की डिग्री पूरी की। हिंदू कॉलेज के बौद्धिक माहौल और देश के कोने-कोने से आए होनहार छात्रों के बीच रहते हुए श्वेता का विजन और स्पष्ट हो गया।
कॉलेज के दिनों में ही उन्होंने तय कर लिया था कि वे किसी कॉर्पोरेट कंपनी या रिसर्च लैब में जाने के बजाय देश के प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा बनेंगी, जहां सीधे तौर पर आम जनता, गरीबों और वंचितों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया जा सके। ग्रेजुएशन के अंतिम वर्षों से ही उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी थी।
श्वेता चौहान की यूपीएससी यात्रा किसी फिल्म की तरह रोमांचक और हैरान करने वाली है। उनकी रणनीतिक समझ और एकाग्रता इतनी सटीक थी कि उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में सफलता का स्वाद चख लिया था:
प्रथम प्रयास (वर्ष 2013): कॉलेज से निकलते ही श्वेता ने पहली बार परीक्षा दी और अपने पहले ही प्रयास में 573वीं रैंक हासिल की। इस रैंक पर उन्हें एलाइड सर्विसेज मिलीं, लेकिन उनकी आंखों का सपना तो आईएएस बनना था।
रणनीतिक गैप (वर्ष 2014): अपनी कमियों को समझने और बेहतर तैयारी के लिए वे साल 2014 की परीक्षा में नहीं बैठीं।
द्वितीय प्रयास (वर्ष 2015): पूरी ताकत के साथ वे दोबारा परीक्षा में उतरीं। इस बार उनकी रैंक में सुधार हुआ और उन्हें 474वीं रैंक मिली। चयन इस बार भी हुआ, लेकिन मन-माफिक रैंक (IAS कैडर) अब भी दूर थी।
तृतीय प्रयास (वर्ष 2016): श्वेता के स्थान पर कोई और होता तो शायद दो बार देश की सबसे कठिन परीक्षा पास करने के बाद जो नौकरी मिल रही थी, उसी में समझौता कर लेता। लेकिन श्वेता के इरादे मजबूत थे। उन्होंने अपनी पुरानी कॉपियों को खंगाला, मेन्स और इंटरव्यू की छोटी से छोटी कमियों पर काम किया और जब वर्ष 2016 का परिणाम आया, तो उन्होंने इतिहास रच दिया। श्वेता चौहान ने पूरे देश में ऑल इंडिया रैंक 08 हासिल की और सीधे देश की टॉपर बन गईं।
ग्रेजुएशन में फिजिक्स ऑनर्स करने के बाद भी श्वेता ने यूपीएससी के लिए अपना वैकल्पिक विषय जियोग्राफी (भूगोल) चुना।
जब उनसे इस यू-टर्न के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने एक बहुत ही व्यावहारिक और स्मार्ट जवाब दिया कि UPSC में फिजिक्स का जो सिलेबस था, उसमें पोस्ट ग्रेजुएशन (M.Sc.) स्तर के बेहद कठिन और जटिल टॉपिक्स भी शामिल थे, जिसकी तैयारी के लिए बहुत अधिक समय और गहरे तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता थी। दूसरी तरफ, जियोग्राफी एक ऐसा विषय है जो न केवल बेहद दिलचस्प और समझने में आसान है, बल्कि इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा हमारे जनरल स्टडीज (GS) के पेपर-1 और पेपर-3 से सीधा मेल खाता है। यह एक टेक्निकल और स्कोरिंग सब्जेक्ट भी है, जिसने मेरी तैयारी को बहुत आसान बना दिया।
उनका यह फैसला साबित करता है कि यूपीएससी में केवल भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से नफा-नुकसान देखकर कदम उठाना चाहिए।
अपने इंटरव्यू में श्वेता ने अपनी उस रणनीति पर बात की जिसके दम पर उन्होंने बार-बार सफलता पाई। उनके अनुसार, यूपीएससी कोई रॉकेट साइंस नहीं है, बल्कि यह निरंतरता और स्मार्ट वर्क का खेल है:
श्वेता की सबसे पहली और महत्वपूर्ण सलाह यह है कि छात्र कभी भी प्रीलिम्स (प्रारंभिक परीक्षा) और मेन्स (मुख्य परीक्षा) को दो अलग-अलग हिस्से मानकर तैयारी न करें। दोनों परीक्षाओं का सिलेबस एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। इसलिए शुरुआत से ही दोनों को साथ लेकर चलें।
जब प्रारंभिक परीक्षा में केवल एक महीना शेष रह जाए, तब अपना पूरा फोकस पूरी तरह से ऑब्जेक्टिव प्रश्नों, फैक्ट्स और प्रीलिम्स ओरिएंटेड मॉक टेस्ट पर शिफ्ट कर देना चाहिए।
श्वेता कहती हैं कि बाजार में किताबों की कोई कमी नहीं है और अक्सर एस्पिरेंट्स यह गलती करते हैं कि वे एक ही विषय की चार-पांच किताबें खरीद लेते हैं। इससे न तो कभी कोर्स समय पर खत्म होता है और न ही रिवीज़न हो पाता है।
उनका मूलमंत्र था कि एक किताब को दस बार पढ़ना, दस अलग-अलग किताबों को एक बार पढ़ने से कहीं बेहतर है। अपने नोट्स और स्टैंडर्ड बुक्स को सीमित रखें और जो टॉपिक्स किताबों में न मिलें, उनके लिए इंटरनेट या गूगल की सहायता लें।
किसी भी इमारत की मजबूती उसकी नींव पर निर्भर करती है। श्वेता चौहान के अनुसार, यूपीएससी की तैयारी के लिए एनसीईआरटी की किताबें सबसे बेहतरीन प्रारंभिक आधार प्रदान करती हैं। वे सलाह देती हैं कि यदि आपके पास पर्याप्त समय है, तो कक्षा 6 से 12 तक की एनसीईआरटी की किताबों को गहराई से पढ़ें। लेकिन यदि समय की कमी है, तो कम से कम कक्षा 9 से 12 तक की एनसीईआरटी किताबों को तो किसी भी कीमत पर न छोड़ें।
अक्सर छात्रों को डराया जाता है कि यूपीएससी में दुनिया की कोई भी चीज़ पूछी जा सकती है। श्वेता इस बात को पूरी तरह खारिज करती हैं। वे कहती हैं कि यूपीएससी का सिलेबस बेहद खूबसूरती और बारीकी से डिफाइन (पारभाषित) किया गया है। यदि आप पिछले सालों के प्रश्नपत्रों (PYQs) और सिलेबस की एक-एक लाइन को ठीक से समझ लेते हैं, तो आपको सटीक पता चल जाएगा कि क्या पढ़ना है और सबसे महत्वपूर्ण- क्या छोड़ना है।
श्वेता कभी भी उन छात्रों में भी नहीं रहीं जो 16-18 घंटे बंद कमरों में पढ़ते हैं। उनका फंडा बिल्कुल साफ था- सिलेक्टिव और एन्जॉयमेंट के साथ पढ़ाई। वे कहती हैं कि आप जितने भी घंटे पढ़ें, पूरे ध्यान और एकाग्रता के साथ पढ़ें। पढ़ाई को कभी खुद पर बोझ न बनने दें।
श्वेता चौहान पढ़ाई के साथ-साथ आउटडोर गेम्स की बेहद शौकीन रही हैं। उन्हें कॉलेज के दिनों से ही वॉलीबॉल और बास्केटबॉल खेलना बेहद पसंद है। वे मानती हैं कि खेल केवल शरीर को फिट नहीं रखते, बल्कि वे आपके भीतर की निगेटिविटी को दूर कर आपको नई ऊर्जा (Energy) से भर देते हैं।
तैयारी के तनावपूर्ण दिनों में भी वे खेलकूद या शारीरिक गतिविधियों के लिए समय निकालती थीं, जिससे उनका दिमाग हमेशा फ्रेश रहता था और वे पूरी क्षमता के साथ दोबारा पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर पाती थीं।
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वर्ष 2017 में आईएएस बनने के बाद श्वेता चौहान को राजस्थान कैडर मिला। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत बतौर उपखंड अधिकारी (SDM) शाहपुरा (भीलवाड़ा) और ब्यावर (अजमेर) से की, जहां उन्होंने भू-राजस्व और स्थानीय कानून-व्यवस्था में बेहतरीन सुधार किए।
इसके बाद उन्होंने जिला परिषद पाली में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO), जोधपुर विकास प्राधिकरण (JDA) में उपायुक्त (Deputy Commissioner), और सरदार पटेल पुलिस विश्वविद्यालय, जोधपुर में रजिस्ट्रार के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।
खैरथल-तिजारा में भिवाड़ी इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट अथॉरिटी (BIDA) की सीईओ और जिला कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट, फलोदी जैसे शीर्ष पदों पर रहते हुए उन्होंने सरकारी योजनाओं को अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक पहुंचाने का कार्य किया। वर्तमान में वे जयपुर में निदेशक/कमिश्नर, उद्यानिकी के पद पर तैनात हैं।
जब श्वेता से पूछा गया कि क्या केवल स्कूल-कॉलेज के टॉपर्स ही इस परीक्षा को पास कर सकते हैं, तो उन्होंने बहुत ही संबल देने वाली बात कही जब आप तैयारी शुरू करेंगे, तो समाज में न जाने कितने लोग आपके पास आकर नकारात्मक बातें करेंगे। वे कहेंगे कि यह फील्ड केवल गॉड-गिफ्टेड या एक्स्ट्रा-ऑर्डिनरी छात्रों के लिए है, एवरेज स्टूडेंट्स यहां सर्वाइव नहीं कर सकते। लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि आप चाहे पास्ट में एक एवरेज स्टूडेंट रहे हों, आपका बैकग्राउंड हिंदी रहा हो या इंग्लिश, आप किस कॉलेज से पढ़े हैं- इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। यूपीएससी केवल आपकी आज की मेहनत, सही दिशा में किया गया स्मार्ट वर्क और आपके धैर्य की परीक्षा लेता है। अगर आपको खुद पर अटूट यकीन है, तो किसी की न सुनें और केवल अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें।
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यह कहानी है वर्ष 2017 बैच की राजस्थान कैडर की लोकप्रिय आईएएस (IAS) अधिकारी श्वेता चौहान की। वे उन विरले प्रशासनिक अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने यूपीएससी के चक्रव्यूह को न केवल तीन बार भेदा, बल्कि अपनी पुरानी कमियों से सीख लेते हुए अंततः देश में 8वीं रैंक (AIR 8) हासिल कर टॉपर्स की सूची में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों से दर्ज कराया।
वर्तमान में जयपुर में उद्यानिकी विभाग की कमिश्नर के रूप में कार्यरत श्वेता चौहान की जीवन यात्रा आज देश के करोड़ों सिविल सेवा एस्पिरेंट्स के लिए एक संपूर्ण गाइडबुक है।
सैन्य पृष्ठभूमि और शुरुआती सफर
वे अपने पिता को ही अपना सबसे बड़ा मार्गदर्शक, प्रेरणास्रोत और जीवन में अनुशासन का मूल आधार मानती हैं। पिता की सेना में नौकरी के कारण श्वेता की शुरुआती स्कूली शिक्षा देश के विभिन्न शहरों के केंद्रीय विद्यालयों से पूरी हुई।
हिंदू कॉलेज और सिविल सर्विसेज का विजन
कॉलेज के दिनों में ही उन्होंने तय कर लिया था कि वे किसी कॉर्पोरेट कंपनी या रिसर्च लैब में जाने के बजाय देश के प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा बनेंगी, जहां सीधे तौर पर आम जनता, गरीबों और वंचितों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया जा सके। ग्रेजुएशन के अंतिम वर्षों से ही उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी थी।
तीन प्रयास, तीन सफलताएं
प्रथम प्रयास (वर्ष 2013): कॉलेज से निकलते ही श्वेता ने पहली बार परीक्षा दी और अपने पहले ही प्रयास में 573वीं रैंक हासिल की। इस रैंक पर उन्हें एलाइड सर्विसेज मिलीं, लेकिन उनकी आंखों का सपना तो आईएएस बनना था।
रणनीतिक गैप (वर्ष 2014): अपनी कमियों को समझने और बेहतर तैयारी के लिए वे साल 2014 की परीक्षा में नहीं बैठीं।
द्वितीय प्रयास (वर्ष 2015): पूरी ताकत के साथ वे दोबारा परीक्षा में उतरीं। इस बार उनकी रैंक में सुधार हुआ और उन्हें 474वीं रैंक मिली। चयन इस बार भी हुआ, लेकिन मन-माफिक रैंक (IAS कैडर) अब भी दूर थी।
तृतीय प्रयास (वर्ष 2016): श्वेता के स्थान पर कोई और होता तो शायद दो बार देश की सबसे कठिन परीक्षा पास करने के बाद जो नौकरी मिल रही थी, उसी में समझौता कर लेता। लेकिन श्वेता के इरादे मजबूत थे। उन्होंने अपनी पुरानी कॉपियों को खंगाला, मेन्स और इंटरव्यू की छोटी से छोटी कमियों पर काम किया और जब वर्ष 2016 का परिणाम आया, तो उन्होंने इतिहास रच दिया। श्वेता चौहान ने पूरे देश में ऑल इंडिया रैंक 08 हासिल की और सीधे देश की टॉपर बन गईं।
फिजिक्स से जियोग्राफी का यू-टर्न
जब उनसे इस यू-टर्न के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने एक बहुत ही व्यावहारिक और स्मार्ट जवाब दिया कि UPSC में फिजिक्स का जो सिलेबस था, उसमें पोस्ट ग्रेजुएशन (M.Sc.) स्तर के बेहद कठिन और जटिल टॉपिक्स भी शामिल थे, जिसकी तैयारी के लिए बहुत अधिक समय और गहरे तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता थी। दूसरी तरफ, जियोग्राफी एक ऐसा विषय है जो न केवल बेहद दिलचस्प और समझने में आसान है, बल्कि इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा हमारे जनरल स्टडीज (GS) के पेपर-1 और पेपर-3 से सीधा मेल खाता है। यह एक टेक्निकल और स्कोरिंग सब्जेक्ट भी है, जिसने मेरी तैयारी को बहुत आसान बना दिया।
उनका यह फैसला साबित करता है कि यूपीएससी में केवल भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से नफा-नुकसान देखकर कदम उठाना चाहिए।
श्वेता चौहान की सक्सेस स्ट्रेटजी
प्रीलिम्स और मेन्स की इंटीग्रेटेड तैयारी
जब प्रारंभिक परीक्षा में केवल एक महीना शेष रह जाए, तब अपना पूरा फोकस पूरी तरह से ऑब्जेक्टिव प्रश्नों, फैक्ट्स और प्रीलिम्स ओरिएंटेड मॉक टेस्ट पर शिफ्ट कर देना चाहिए।
सीमित सोर्स, असीमित रिवीजन
उनका मूलमंत्र था कि एक किताब को दस बार पढ़ना, दस अलग-अलग किताबों को एक बार पढ़ने से कहीं बेहतर है। अपने नोट्स और स्टैंडर्ड बुक्स को सीमित रखें और जो टॉपिक्स किताबों में न मिलें, उनके लिए इंटरनेट या गूगल की सहायता लें।
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तैयारी के तनावपूर्ण दिनों में भी वे खेलकूद या शारीरिक गतिविधियों के लिए समय निकालती थीं, जिससे उनका दिमाग हमेशा फ्रेश रहता था और वे पूरी क्षमता के साथ दोबारा पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर पाती थीं।
72f63605-63b
प्रशासनिक करियर
इसके बाद उन्होंने जिला परिषद पाली में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO), जोधपुर विकास प्राधिकरण (JDA) में उपायुक्त (Deputy Commissioner), और सरदार पटेल पुलिस विश्वविद्यालय, जोधपुर में रजिस्ट्रार के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।
खैरथल-तिजारा में भिवाड़ी इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट अथॉरिटी (BIDA) की सीईओ और जिला कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट, फलोदी जैसे शीर्ष पदों पर रहते हुए उन्होंने सरकारी योजनाओं को अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक पहुंचाने का कार्य किया। वर्तमान में वे जयपुर में निदेशक/कमिश्नर, उद्यानिकी के पद पर तैनात हैं।
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