असफलता की पांच सीढ़ियां चढ़कर IPS बने इंदौलिया, हिन्दी के युवाओं के लिए प्रेरणा के प्रतीक
Jageshwar prasad | May 29, 2026, 17:25 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान कैडर के आईपीएस शैलेंद्र सिंह इंदौलिया की कहानी हिंदी माध्यम के युवाओं के लिए प्रेरणा है। लगातार तीन बार असफल होने के बावजूद, उन्होंने पांचवें प्रयास में देश भर में 38वीं रैंक हासिल कर अपना सपना पूरा किया।
जीवन में सफलता उन्हें मिलती है, जो हार से नहीं डरते, बल्कि हर विफलता को एक नई शुरुआत का अवसर बनाते हैं। जालोर जिले के पुलिस अधीक्षक शैलेन्द्र सिंह इंदौलिया ऐसे ही संघर्षशील व्यक्तित्व का नाम है। आज वे न सिर्फ एक सख्त और कर्तव्यनिष्ठ IPS अधिकारी हैं, बल्कि लाखों हिन्दी भाषी युवाओं के लिए उस सच्चाई का प्रमाण भी हैं, जो यह मानते हैं कि UPSC जैसी टॉप परीक्षा में हिन्दी माध्यम का छात्र कभी सफल नहीं हो सकता।
यह लेख इंदौलिया के उस प्रेरक सफर को बयान करता है, जहां उन्होंने पांच बार प्रयास किया, दो सरकारी नौकरियां छोड़ीं, हिन्दी में परीक्षा दी और आखिरकार देश में 38वीं रैंक हासिल कर अपना सपना पूरा किया।
राजस्थान कैडर के आईपीएस शैलेन्द्र सिंह इंदौलिया का जन्म राजस्थान के भरतपुर जिले के डीग कस्बे में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। बचपन से ही उनके मन में एक अलग ही चिंगारी थी। जब अधिकांश बच्चे खेल-कूद या मनोरंजन में व्यस्त रहते, तब शैलेन्द्र का ध्यान स्कूल में आने वाले पुलिस अधिकारी की वर्दी और गरिमा पर जाता। उन्होंने स्कूल शिक्षा के दिनों में ही मन में संकल्प कर लिया था – मुझे पुलिस अफसर बनना है।
पर यह रास्ता आसान नहीं था। उनकी 12वीं तक की पूरी शिक्षा डीग के हिन्दी माध्यम के स्कूल से हुई थी। उस समय समाज में एक आम धारणा थी कि IAS या IPS जैसी परीक्षाएं अंग्रेजी माध्यम वालों का खेल है। हिन्दी माध्यम के छात्र न तो उस स्तर की अंग्रेजी जानते हैं, न ही उनके पास वह संसाधन होते हैं। इस मानसिकता ने अनगिनत हिन्दीभाषी प्रतिभाओं को सपने देखने से ही रोक दिया। लेकिन शैलेन्द्र ने इस मानसिकता को तोड़ने का बीड़ा उठाया।
उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से B.Tech की डिग्री हासिल की। यहां से उनका तकनीकी ज्ञान तो मजबूत हुआ, लेकिन सपना वही था – UPSC की परीक्षा पास करना।
बीटेक करने के बाद शैलेन्द्र को राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड में नौकरी मिल गई। एक मध्यम वर्गीय परिवार के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी- अच्छा वेतन, स्थिर जीवन और सुरक्षित भविष्य। परिवार वाले भी खुश थे कि बेटे ने अच्छी नौकरी पा ली है।
लेकिन इंदौलिया का मन था कि मानता ही नहीं था। अंदर की आवाज हमेशा कहती- तुझे तो पुलिस वाला बनना है, बस स्टील प्लांट में मैनेजर नहीं।
यहीं से उनके जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष शुरू हुआ। एक तरफ नौकरी की जिम्मेदारी, दूसरी तरफ UPSC की तैयारी। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और दोनों को समानांतर चलाने का फैसला किया। दिन में वे नौकरी करते, रात में अध्ययन।
शैलेन्द्र सिंह ने UPSC परीक्षा में अपना माध्यम हिन्दी रखा। यह एक साहसिक निर्णय था, क्योंकि 90% से अधिक उम्मीदवार अंग्रेजी माध्यम लेते हैं। इस निर्णय पर उनका मजाक बनाया गया। लोग कहते थे हिन्दी में UPSC कौन देता है?, यह परीक्षा इंग्लिश मीडियम वालों के लिए है।
लेकिन इंदौलिया ने इन तानों को हवा में उड़ा दिया। उन्हें पता था कि UPSC में हिन्दी में उत्तर लिखने पर कोई अंक कटौती नहीं होती। कठिनाई थी- पाठ्य सामग्री की। अंग्रेजी में सैकड़ों नोट्स, स्टैंडर्ड किताबें और गाइडेंस उपलब्ध थी, जबकि हिन्दी में उतनी अच्छी सामग्री नहीं थी।
तो शैलेन्द्र ने जो किया, वह वाकई प्रशंसनीय है। उन्होंने खुद हिन्दी में अपने नोट्स बनाने शुरू कर दिए। वे अंग्रेजी की किताबें पढ़ते, महत्वपूर्ण बातों का हिन्दी अनुवाद और सारांश खुद तैयार करते। यह एक कठिन और समय लेने वाली प्रक्रिया थी, लेकिन उनके दृढ़ संकल्प के आगे हर अड़चन छोटी लगी।
![Strategy for GS Papers by Shailendra Singh Indoliya, Rank 38, CSE-2016 (Geography Optional) – SELF STUDY HISTORY]()
इंदौलिया ने पहली बार UPSC परीक्षा दी। असफल रहे। दूसरी बार दी, फिर असफल। तीसरी बार में भी असफल। लगातार तीन विफलताएं। यह वह दौर था, जब कोई भी सामान्य व्यक्ति टूट सकता था, अवसाद में आ सकता था और अपना सपना छोड़ सकता था।
लेकिन शैलेन्द्र सिंह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं थे। हर बार की असफलता से वे और अधिक अनुभवी और मजबूत होकर लौटते थे। वे कहते हैं कि हर बार मैं अपनी गलतियों को नोट करता था – ये विषय कमजोर रहे, ये टॉपिक छूट गया, समय प्रबंधन में कहां कमी रही और फिर नई रणनीति बनाता था।
चौथे प्रयास में (2015 में) उन्हें सफलता मिली। 337वीं रैंक के साथ उनका चयन भारतीय राजस्व सेवा (IRS) में हुआ। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है – IRS अधिकारी बनना कोई सामान्य बात नहीं है। लेकिन इंदौलिया यहां नहीं रुके। क्योंकि उनका सपना था IPS था, IRS नहीं।
IRS में चयन ने शैलेन्द्र सिंह इंदौलिया में आत्मविश्वास को मजबूत किया और वे पांचवी बार UPSC की तैयारी में जुट गए। अब उनके पास अनुभव था, हिन्दी में नोट्स का अपना कोष तैयार था, और सबसे बड़ी बात- उनके अंदर आत्मविश्वास का ज्वार था कि मैं कर सकता हूँ।
2016 में परिणाम आया। शैलेन्द्र सिंह इंदौलिया ने देशभर में 38वीं रैंक हासिल की। चूंकि उन्होंने अपने आवेदन पत्र में पहली पसंद IPS ही भरी थी, इसलिए वे सीधे IPS अधिकारी बन गए। इतना ही नहीं, अगर वे पहली पसंद IAS भरते तो आसानी से IAS बन सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने बचपन के सपने - पुलिस अफसर बनने- को तरजीह दी।
भाषा बाधा नहीं, मानसिकता बाधा है: इंदौलिया साबित करते हैं कि हिन्दी में पढ़कर भी UPSC में टॉप रैंक लाई जा सकती है। उन्होंने कभी अपनी भाषा को कमजोरी नहीं समझा।
असफलता को पाठ्यक्रम मानिए: हर असफलता से उन्होंने कुछ न कुछ सीखा। तीन बार फेल होने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। युवा अक्सर एक-दो बार में निराश होकर डिप्रेशन में चले जाते हैं – इंदौलिया का जीवन उनके लिए सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत है।
स्थिरता छोड़कर सपने के पीछे जाना भी जरूरी: उन्होंने अच्छी नौकरी (राष्ट्रीय इस्पात निगम) छोड़ी, फिर IRS - क्योंकि वे केवल ठीक से संतुष्ट नहीं थे। वे सर्वश्रेष्ठ तक जाना चाहते थे।
मजाक उड़ाने वालों की परवाह मत करो: जब उन्होंने हिन्दी माध्यम लिया, तो लोग हंसे। जब वे तीन बार फेल हुए, तो और हंसे। लेकिन आज वही लोग गर्व से उनकी कहानी सुनाते हैं।
आज एसपी इंदौलिया जालोर जिले में तैनात हैं। उनका कहना है कि अब उनका ध्येय केवल एक पद पर बैठे रहने का नहीं है, बल्कि कुछ बेहतर कर दिखाने का है। वे चाहते हैं कि अपराधियों के मन में कानून का खौफ हो और पीड़ितों को न्याय मिले। उनकी वर्दी केवल एक सरकारी पोशाक नहीं है, बल्कि लाखों हिन्दीभाषी युवाओं के सपनों की ढाल है।
शैलेन्द्र सिंह इंदौलिया की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस तंत्र को तोड़ने की कहानी है, जो बचपन से ही हिन्दीभाषी बच्चों के दिमाग में यह बैठा देता है कि तुम्हारे बस की बात नहीं है। यह कहानी सिखाती है कि कोई भी लक्ष्य कोई भी भाषा के साथ पाया जा सकता है- चाहे वह हिन्दी हो, तमिल, मराठी या कोई अन्य मातृभाषा।
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यह लेख इंदौलिया के उस प्रेरक सफर को बयान करता है, जहां उन्होंने पांच बार प्रयास किया, दो सरकारी नौकरियां छोड़ीं, हिन्दी में परीक्षा दी और आखिरकार देश में 38वीं रैंक हासिल कर अपना सपना पूरा किया।
एक सपना, पुलिस अफसर है बनना
पर यह रास्ता आसान नहीं था। उनकी 12वीं तक की पूरी शिक्षा डीग के हिन्दी माध्यम के स्कूल से हुई थी। उस समय समाज में एक आम धारणा थी कि IAS या IPS जैसी परीक्षाएं अंग्रेजी माध्यम वालों का खेल है। हिन्दी माध्यम के छात्र न तो उस स्तर की अंग्रेजी जानते हैं, न ही उनके पास वह संसाधन होते हैं। इस मानसिकता ने अनगिनत हिन्दीभाषी प्रतिभाओं को सपने देखने से ही रोक दिया। लेकिन शैलेन्द्र ने इस मानसिकता को तोड़ने का बीड़ा उठाया।
उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से B.Tech की डिग्री हासिल की। यहां से उनका तकनीकी ज्ञान तो मजबूत हुआ, लेकिन सपना वही था – UPSC की परीक्षा पास करना।
जब नौकरी मिली, लेकिन मन नहीं भरा
लेकिन इंदौलिया का मन था कि मानता ही नहीं था। अंदर की आवाज हमेशा कहती- तुझे तो पुलिस वाला बनना है, बस स्टील प्लांट में मैनेजर नहीं।
यहीं से उनके जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष शुरू हुआ। एक तरफ नौकरी की जिम्मेदारी, दूसरी तरफ UPSC की तैयारी। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और दोनों को समानांतर चलाने का फैसला किया। दिन में वे नौकरी करते, रात में अध्ययन।
हिन्दी माध्यम चुना तो बनाया गया मजाक
लेकिन इंदौलिया ने इन तानों को हवा में उड़ा दिया। उन्हें पता था कि UPSC में हिन्दी में उत्तर लिखने पर कोई अंक कटौती नहीं होती। कठिनाई थी- पाठ्य सामग्री की। अंग्रेजी में सैकड़ों नोट्स, स्टैंडर्ड किताबें और गाइडेंस उपलब्ध थी, जबकि हिन्दी में उतनी अच्छी सामग्री नहीं थी।
तो शैलेन्द्र ने जो किया, वह वाकई प्रशंसनीय है। उन्होंने खुद हिन्दी में अपने नोट्स बनाने शुरू कर दिए। वे अंग्रेजी की किताबें पढ़ते, महत्वपूर्ण बातों का हिन्दी अनुवाद और सारांश खुद तैयार करते। यह एक कठिन और समय लेने वाली प्रक्रिया थी, लेकिन उनके दृढ़ संकल्प के आगे हर अड़चन छोटी लगी।
Strategy for GS Papers by Shailendra Singh Indoliya, Rank 38, CSE-2016 (Geography Optional) – SELF STUDY HISTORY
लगातार तीन असफलताएं और चौथी में IRS
लेकिन शैलेन्द्र सिंह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं थे। हर बार की असफलता से वे और अधिक अनुभवी और मजबूत होकर लौटते थे। वे कहते हैं कि हर बार मैं अपनी गलतियों को नोट करता था – ये विषय कमजोर रहे, ये टॉपिक छूट गया, समय प्रबंधन में कहां कमी रही और फिर नई रणनीति बनाता था।
चौथे प्रयास में (2015 में) उन्हें सफलता मिली। 337वीं रैंक के साथ उनका चयन भारतीय राजस्व सेवा (IRS) में हुआ। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है – IRS अधिकारी बनना कोई सामान्य बात नहीं है। लेकिन इंदौलिया यहां नहीं रुके। क्योंकि उनका सपना था IPS था, IRS नहीं।
पांचवी बार तैयारी
2016 में परिणाम आया। शैलेन्द्र सिंह इंदौलिया ने देशभर में 38वीं रैंक हासिल की। चूंकि उन्होंने अपने आवेदन पत्र में पहली पसंद IPS ही भरी थी, इसलिए वे सीधे IPS अधिकारी बन गए। इतना ही नहीं, अगर वे पहली पसंद IAS भरते तो आसानी से IAS बन सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने बचपन के सपने - पुलिस अफसर बनने- को तरजीह दी।
इंदौलिया से युवा क्या सीखें?
असफलता को पाठ्यक्रम मानिए: हर असफलता से उन्होंने कुछ न कुछ सीखा। तीन बार फेल होने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। युवा अक्सर एक-दो बार में निराश होकर डिप्रेशन में चले जाते हैं – इंदौलिया का जीवन उनके लिए सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत है।
स्थिरता छोड़कर सपने के पीछे जाना भी जरूरी: उन्होंने अच्छी नौकरी (राष्ट्रीय इस्पात निगम) छोड़ी, फिर IRS - क्योंकि वे केवल ठीक से संतुष्ट नहीं थे। वे सर्वश्रेष्ठ तक जाना चाहते थे।
मजाक उड़ाने वालों की परवाह मत करो: जब उन्होंने हिन्दी माध्यम लिया, तो लोग हंसे। जब वे तीन बार फेल हुए, तो और हंसे। लेकिन आज वही लोग गर्व से उनकी कहानी सुनाते हैं।
आज एसपी इंदौलिया जालोर जिले में तैनात हैं। उनका कहना है कि अब उनका ध्येय केवल एक पद पर बैठे रहने का नहीं है, बल्कि कुछ बेहतर कर दिखाने का है। वे चाहते हैं कि अपराधियों के मन में कानून का खौफ हो और पीड़ितों को न्याय मिले। उनकी वर्दी केवल एक सरकारी पोशाक नहीं है, बल्कि लाखों हिन्दीभाषी युवाओं के सपनों की ढाल है।
शैलेन्द्र सिंह इंदौलिया की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस तंत्र को तोड़ने की कहानी है, जो बचपन से ही हिन्दीभाषी बच्चों के दिमाग में यह बैठा देता है कि तुम्हारे बस की बात नहीं है। यह कहानी सिखाती है कि कोई भी लक्ष्य कोई भी भाषा के साथ पाया जा सकता है- चाहे वह हिन्दी हो, तमिल, मराठी या कोई अन्य मातृभाषा।
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