45 साल के बाद हर तीसरा व्यक्ति दर्द से परेशान, रोजमर्रा की जिंदगी पर भी असर, नेशनल रिसर्च में खुलासा
Arun Tiwari | Oct 28, 2026, 16:39 IST
भारत में दर्द की समस्या पर नेशनल रिसर्च
उम्र बढ़ने के साथ शरीर में दर्द होना आम बात मानी जाती है। किसी को घुटनों में दर्द होता है, तो किसी को कमर में। कई लोग इसे बढ़ती उम्र का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन एक नए अध्ययन ने इस समस्या की गंभीरता दिखाई है। भारत में 45 साल या उससे ज्यादा उम्र के 37 प्रतिशत लोग किसी न किसी तरह के दर्द से परेशान हैं।
यानी हर तीन में से एक व्यक्ति को दर्द की समस्या है। इनमें करीब 15 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जिन्हें हफ्ते में कम से कम पांच दिन दर्द रहता है।
इसका असर उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ता है। कई लोगों को चलने-फिरने और घर के काम करने में परेशानी होती है। कुछ लोगों की काम करने की क्षमता भी प्रभावित होती है। आइए जानते हैं कि किन राज्यों में यह समस्या ज्यादा है और कितने लोग इसका इलाज करवा रहे हैं।
शोध पत्रिका Pain में यह अध्ययन प्रकाशित हुआ है। इसके मुताबिक, 45 साल या उससे अधिक उम्र के 37 प्रतिशत भारतीय दर्द से परेशान हैं।
आसान भाषा में समझें तो हर 100 लोगों में से करीब 37 लोगों को दर्द की समस्या है। इनमें से लगभग 15 प्रतिशत लोगों को हफ्ते में पांच दिन या उससे ज्यादा समय तक दर्द रहता है।
लगातार दर्द रहने से सामान्य काम करना मुश्किल हो सकता है। इसका असर व्यक्ति की सेहत और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ता है।
अध्ययन में अलग-अलग राज्यों के आंकड़ों में अंतर देखने को मिला है।
कितने लोग
दर्द होने पर हर व्यक्ति इलाज नहीं करवा पाता। इसकी कई वजहें हो सकती हैं। इलाज का खर्च और अस्पतालों तक पहुंच भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं।
अध्ययन के मुताबिक, दर्द से परेशान करीब 73 प्रतिशत लोगों का इलाज चल रहा था।
गोवा, लक्षद्वीप, महाराष्ट्र, पुडुचेरी, तेलंगाना और तमिलनाडु में इलाज कराने वालों का अनुपात 85 प्रतिशत या उससे ज्यादा था। केरल में यह आंकड़ा 76 प्रतिशत रहा।
इसके उलट, मिजोरम में सिर्फ 10.5 प्रतिशत लोग ही इलाज करवा रहे थे।
इससे पता चलता है कि दर्द की समस्या होने के बावजूद सभी लोगों को इलाज नहीं मिल पा रहा है।
अध्ययन में इलाज के अलग-अलग तरीकों की जानकारी भी दी गई है।
इसलिए लंबे समय तक दर्द रहने पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। बिना सलाह के दवाइयां या इंजेक्शन लेना नुकसान पहुंचा सकता है।
मुंबई स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन स्टडीज के प्रोफेसर संजय मोहंती और उनके सहयोगियों ने इस अध्ययन में योगदान दिया।
शोधकर्ताओं का कहना है कि दर्द का असर सिर्फ व्यक्ति की सेहत तक सीमित नहीं रहता। इससे परिवार पर भी आर्थिक बोझ बढ़ सकता है।
दर्द के कारण व्यक्ति नियमित काम नहीं कर पाता। इससे उसकी कमाई प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, दवाइयों और इलाज पर खर्च भी बढ़ता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में दर्द की समस्या पर पर्याप्त ध्यान देने की जरूरत है। इसके लिए ज्यादा शोध और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं जरूरी हैं।
इंडियन सोसाइटी फॉर द स्टडी ऑफ पेन के अध्यक्ष डॉ. मुरलीधर जोशी ने दर्द के बेहतर इलाज के लिए तीन जरूरी बातें बताई हैं।
अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि भारत में दर्द एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या है। 45 साल से ज्यादा उम्र के हर तीन में से एक व्यक्ति इससे प्रभावित है।
अगर दर्द के कारण चलने-फिरने या रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो रही है, तो डॉक्टर से सलाह लें। लगातार दर्द को सिर्फ उम्र का असर मानकर टालना ठीक नहीं है।
समय पर जांच और सही इलाज से परेशानी को संभालने में मदद मिल सकती है। इसके लिए इलाज की बेहतर सुविधाएं और सही जानकारी दोनों जरूरी हैं।
इसका असर उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ता है। कई लोगों को चलने-फिरने और घर के काम करने में परेशानी होती है। कुछ लोगों की काम करने की क्षमता भी प्रभावित होती है। आइए जानते हैं कि किन राज्यों में यह समस्या ज्यादा है और कितने लोग इसका इलाज करवा रहे हैं।
भारत में कितने लोग दर्द से परेशान हैं?
आसान भाषा में समझें तो हर 100 लोगों में से करीब 37 लोगों को दर्द की समस्या है। इनमें से लगभग 15 प्रतिशत लोगों को हफ्ते में पांच दिन या उससे ज्यादा समय तक दर्द रहता है।
लगातार दर्द रहने से सामान्य काम करना मुश्किल हो सकता है। इसका असर व्यक्ति की सेहत और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ता है।
किन राज्यों में दर्द की समस्या ज्यादा है?
- पश्चिम बंगाल: करीब 40 प्रतिशत लोग प्रभावित हैं।
- केरल: करीब 22 प्रतिशत लोगों को दर्द की समस्या है।
- मिजोरम: यहां यह आंकड़ा 2.6 प्रतिशत है।
- नागालैंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखंड और पुडुचेरी में दर्द से परेशान लोगों का अनुपात सबसे ज्यादा पाया गया।
- वहीं, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और मिजोरम में यह समस्या अपेक्षाकृत कम दर्ज की गई।
कितने लोग दर्द का इलाज करवा रहे हैं?
अध्ययन के मुताबिक, दर्द से परेशान करीब 73 प्रतिशत लोगों का इलाज चल रहा था।
गोवा, लक्षद्वीप, महाराष्ट्र, पुडुचेरी, तेलंगाना और तमिलनाडु में इलाज कराने वालों का अनुपात 85 प्रतिशत या उससे ज्यादा था। केरल में यह आंकड़ा 76 प्रतिशत रहा।
इसके उलट, मिजोरम में सिर्फ 10.5 प्रतिशत लोग ही इलाज करवा रहे थे।
इससे पता चलता है कि दर्द की समस्या होने के बावजूद सभी लोगों को इलाज नहीं मिल पा रहा है।
दर्द से राहत के लिए क्या करते हैं लोग?
- दवाइयां और इंजेक्शन: करीब 40 प्रतिशत लोग इनका इस्तेमाल करते हैं।
- ऑइंटमेंट और स्प्रे: लगभग 40 प्रतिशत लोग दर्द वाली जगह पर लगाने वाली दवाएं इस्तेमाल करते हैं।
- फिजियोथेरेपी: कुछ लोग इसकी मदद लेते हैं।
- मनोचिकित्सा: कुछ मामलों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी मदद भी ली जाती है।
इसलिए लंबे समय तक दर्द रहने पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। बिना सलाह के दवाइयां या इंजेक्शन लेना नुकसान पहुंचा सकता है।
दर्द से परिवार पर भी बढ़ता है आर्थिक बोझ
शोधकर्ताओं का कहना है कि दर्द का असर सिर्फ व्यक्ति की सेहत तक सीमित नहीं रहता। इससे परिवार पर भी आर्थिक बोझ बढ़ सकता है।
दर्द के कारण व्यक्ति नियमित काम नहीं कर पाता। इससे उसकी कमाई प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, दवाइयों और इलाज पर खर्च भी बढ़ता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में दर्द की समस्या पर पर्याप्त ध्यान देने की जरूरत है। इसके लिए ज्यादा शोध और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं जरूरी हैं।
दर्द का इलाज बेहतर बनाने के लिए क्या जरूरी है?
- पहली, लोगों के पास इलाज का खर्च उठाने की क्षमता होनी चाहिए।
- दूसरी, अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं तक आसानी से पहुंच होनी चाहिए।
- तीसरी, लोगों को इलाज के विकल्पों की सही जानकारी मिलनी चाहिए।
लगातार दर्द हो तो नजरअंदाज न करें
अगर दर्द के कारण चलने-फिरने या रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो रही है, तो डॉक्टर से सलाह लें। लगातार दर्द को सिर्फ उम्र का असर मानकर टालना ठीक नहीं है।
समय पर जांच और सही इलाज से परेशानी को संभालने में मदद मिल सकती है। इसके लिए इलाज की बेहतर सुविधाएं और सही जानकारी दोनों जरूरी हैं।
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