राजस्थान में 6175 हाई-रिस्क गर्भवतियों की पहचान, कोटा में 4 प्रसूताओं की मौत, समय पर इलाज और रेफरल पर सवाल
Raghvendra Singh Rathore | Oct 28, 2026, 14:19 IST
राजस्थान में 6175 हाई-रिस्क गर्भवती, कोटा में 4 प्रसूताओं की मौत
राजस्थान में स्वास्थ्य विभाग ने अक्टूबर के 19 दिनों में 6,175 हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की पहचान की। इसी महीने कोटा में चार प्रसूताओं की मौत के मामले सामने आए। बारां की शबनम बानो के परिजनों ने इलाज में देरी का आरोप लगाया, जबकि अस्पताल ने गंभीर हालत में मरीज पहुंचने की बात कही। अब रेफरल व्यवस्था और मातृ मृत्यु समीक्षा पर सवाल हैं।
राजस्थान में एक तरफ स्वास्थ्य विभाग हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की पहचान और बेहतर इलाज की व्यवस्था का दावा कर रहा है, दूसरी तरफ कोटा के सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं की मौत के मामले सामने आ रहे हैं। अक्टूबर में कोटा में चार प्रसूताओं की मौत की खबरें सामने आई हैं। ताजा मामला बारां जिले की एक महिला का है, जिसकी प्रसव के बाद हालत बिगड़ने से मौत हो गई। इससे पहले सीकर और जयपुर से तीन अन्य प्रसूताओं की मौत के मामले सामने आ चुके हैं।
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक 1 से 19 अक्टूबर के बीच प्रदेश में 6,175 हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की पहचान की गई। इस दौरान 11,928 प्रसवपूर्व देखभाल पंजीकरण हुए। विभाग का कहना है कि ऐसी महिलाओं की नियमित निगरानी, समय पर उपचार और जरूरत पड़ने पर बड़े अस्पताल में रेफर करने की व्यवस्था मजबूत की जा रही है।
लेकिन कोटा और बारां की घटनाओं के बाद सवाल उठ रहा है कि गंभीर गर्भवती महिलाओं की पहचान के बाद उन्हें कितनी जल्दी विशेषज्ञ डॉक्टर और आपातकालीन इलाज उपलब्ध हो रहा है। अस्पताल से अस्पताल रेफर करने की प्रक्रिया में कितना समय लग रहा है और पहले से चिन्हित हाई-रिस्क महिलाओं का फॉलोअप किस तरह किया जा रहा है?
बारां जिले के छबड़ा की रहने वाली 26 वर्षीय शबनम बानो को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों के अनुसार, डॉक्टरों ने ऑपरेशन की तैयारी के लिए उन्हें रात से खाना-पीना बंद करने को कहा था।
शबनम के भाई सरफराज का आरोप है कि इसके बाद करीब 12 घंटे तक ऑपरेशन नहीं हुआ। शबनम को दौरे पड़ने लगे और उनकी हालत बिगड़ गई। इसके बाद उन्हें कोटा के जेके लोन अस्पताल रेफर किया गया।
कोटा में शबनम का सिजेरियन ऑपरेशन हुआ। उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया, लेकिन प्रसव के दौरान और बाद में उनका ब्लड प्रेशर काफी गिर गया जिससे मौत हो गई। परिवार का आरोप है कि बारां में समय पर इलाज और ऑपरेशन होता तो स्थिति अलग हो सकती थी।
कोटा के जेके लोन अस्पताल की अधीक्षक डॉ. निर्मला शर्मा ने बताया कि शबनम को बेहद गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया था। उन्हें गर्भावस्था के दौरान गंभीर उच्च रक्तचाप की समस्या थी और दौरे भी पड़ चुके थे। अधीक्षक के अनुसार, शबनम कोटा पहुंचने तक कोमा की स्थिति में थीं।
चिकित्सकों ने ऑपरेशन से पहले परिजनों को उनकी गंभीर हालत के बारे में जानकारी दी थी। इसके बाद बच्ची को बचाने के उद्देश्य से सिजेरियन ऑपरेशन किया गया। अस्पताल प्रशासन ने इस मौत को न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 16 और 17 अक्टूबर को हुई दो अन्य प्रसूताओं की मौतों से अलग बताया है।
कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 27 अक्टूबर को बारां जिले के शाहाबाद क्षेत्र की रेशु की मौत का मामला भी सामने आया। रेशु का 13 अक्टूबर को जेके लोन अस्पताल में प्रसव हुआ था। इस दौरान गर्भ में बच्चे की मौत हो गई थी। बाद में महिला की हालत बिगड़ने पर उसे न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया।
परिजनों के अनुसार, रेशु को पेट दर्द और पेशाब बंद होने की परेशानी हुई थी। जांच में किडनी की समस्या सामने आने की बात बताई गई। इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने पोस्टमार्टम कराकर शव परिजनों को सौंपा।
इससे पहले 16 अक्टूबर को रेशमा और 17 अक्टूबर को रोशन बैरवा की सिजेरियन ऑपरेशन के बाद मौत हुई थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, रेशमा की मौत किडनी फेल होने और रोशन बैरवा की मौत अत्यधिक रक्तस्राव के बाद हुई थी।
कोटा के सरकारी अस्पतालों में मातृ मृत्यु से जुड़ा यह पहला विवाद नहीं है। मई 2026 में सिजेरियन ऑपरेशन के बाद पांच महिलाओं की मौत और अन्य महिलाओं की गंभीर तबीयत बिगड़ने के मामले सामने आए थे। उन मामलों की जांच में हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की निगरानी, इलाज के रिकॉर्ड और संक्रमण नियंत्रण से जुड़ी खामियां सामने आई थीं।
विशेषज्ञ समिति ने पाया था कि कई मरीजों के ब्लड प्रेशर, नाड़ी, पेशाब की मात्रा और दवाओं से संबंधित निगरानी रिकॉर्ड पर्याप्त नहीं थे।
राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग ने 1 से 19 अक्टूबर के बीच मातृ मृत्यु रोकने के लिए विशेष निगरानी अभियान चलाया। इसमें 6,175 हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की पहचान की गई और 11,928 प्रसवपूर्व देखभाल पंजीकरण दर्ज हुए।
विभाग के अधिकारियों के अनुसार, गर्भावस्था में खून की कमी, हाई ब्लड प्रेशर, पहले सिजेरियन ऑपरेशन और अन्य गंभीर बीमारियों वाली महिलाओं को विशेष निगरानी की जरूरत होती है। विभाग का दावा है कि चिन्हित हाई-रिस्क महिलाओं को प्रसवपूर्व देखभाल के दायरे में लाया गया है।
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की प्रमुख सचिव गायत्री राठौड़ ने मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की समीक्षा के दौरान मेडिकल कॉलेजों के विशेषज्ञ चिकित्सकों को आसपास के प्रसव केंद्रों के डॉक्टरों और कर्मचारियों का मार्गदर्शन जारी रखने के निर्देश दिए। उन्होंने प्रसव और जांच से जुड़े रिकॉर्ड का सही संधारण करने तथा स्वास्थ्यकर्मियों के कौशल में सुधार पर भी जोर दिया।
विभाग ने सभी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों को महीने में दो बार समीक्षा बैठक करने और हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की पहचान, उपचार और फॉलोअप की नियमित निगरानी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
गर्भावस्था में गंभीर उच्च रक्तचाप, दौरे, अत्यधिक रक्तस्राव और संक्रमण जैसी स्थितियां मां और बच्चे के लिए जानलेवा हो सकती हैं। इन स्थितियों में नियमित जांच के साथ जरूरत पड़ने पर तत्काल विशेषज्ञ उपचार और सुरक्षित रेफरल महत्वपूर्ण है।
स्वास्थ्य विभाग का निगरानी अभियान इसी व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है। लेकिन इसकी प्रभावशीलता केवल हाई-रिस्क महिलाओं की पहचान की संख्या से नहीं, बल्कि समय पर मिले इलाज और स्वास्थ्य परिणामों से भी आंकी जानी चाहिए।
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक 1 से 19 अक्टूबर के बीच प्रदेश में 6,175 हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की पहचान की गई। इस दौरान 11,928 प्रसवपूर्व देखभाल पंजीकरण हुए। विभाग का कहना है कि ऐसी महिलाओं की नियमित निगरानी, समय पर उपचार और जरूरत पड़ने पर बड़े अस्पताल में रेफर करने की व्यवस्था मजबूत की जा रही है।
लेकिन कोटा और बारां की घटनाओं के बाद सवाल उठ रहा है कि गंभीर गर्भवती महिलाओं की पहचान के बाद उन्हें कितनी जल्दी विशेषज्ञ डॉक्टर और आपातकालीन इलाज उपलब्ध हो रहा है। अस्पताल से अस्पताल रेफर करने की प्रक्रिया में कितना समय लग रहा है और पहले से चिन्हित हाई-रिस्क महिलाओं का फॉलोअप किस तरह किया जा रहा है?
बारां से कोटा पहुंची शबनम, ऑपरेशन के बाद मौत
शबनम के भाई सरफराज का आरोप है कि इसके बाद करीब 12 घंटे तक ऑपरेशन नहीं हुआ। शबनम को दौरे पड़ने लगे और उनकी हालत बिगड़ गई। इसके बाद उन्हें कोटा के जेके लोन अस्पताल रेफर किया गया।
कोटा में शबनम का सिजेरियन ऑपरेशन हुआ। उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया, लेकिन प्रसव के दौरान और बाद में उनका ब्लड प्रेशर काफी गिर गया जिससे मौत हो गई। परिवार का आरोप है कि बारां में समय पर इलाज और ऑपरेशन होता तो स्थिति अलग हो सकती थी।
अस्पताल अधीक्षक डॉ. निर्मला शर्मा ने क्या कहा?
चिकित्सकों ने ऑपरेशन से पहले परिजनों को उनकी गंभीर हालत के बारे में जानकारी दी थी। इसके बाद बच्ची को बचाने के उद्देश्य से सिजेरियन ऑपरेशन किया गया। अस्पताल प्रशासन ने इस मौत को न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 16 और 17 अक्टूबर को हुई दो अन्य प्रसूताओं की मौतों से अलग बताया है।
27 अक्टूबर को एक और मौत, अक्टूबर में संख्या चार
परिजनों के अनुसार, रेशु को पेट दर्द और पेशाब बंद होने की परेशानी हुई थी। जांच में किडनी की समस्या सामने आने की बात बताई गई। इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने पोस्टमार्टम कराकर शव परिजनों को सौंपा।
इससे पहले 16 अक्टूबर को रेशमा और 17 अक्टूबर को रोशन बैरवा की सिजेरियन ऑपरेशन के बाद मौत हुई थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, रेशमा की मौत किडनी फेल होने और रोशन बैरवा की मौत अत्यधिक रक्तस्राव के बाद हुई थी।
मई में भी पांच प्रसूताओं की मौत, जांच में मिली थीं खामियां
विशेषज्ञ समिति ने पाया था कि कई मरीजों के ब्लड प्रेशर, नाड़ी, पेशाब की मात्रा और दवाओं से संबंधित निगरानी रिकॉर्ड पर्याप्त नहीं थे।
19 दिन में 6,175 हाई-रिस्क गर्भवती महिलाएं चिन्हित
विभाग के अधिकारियों के अनुसार, गर्भावस्था में खून की कमी, हाई ब्लड प्रेशर, पहले सिजेरियन ऑपरेशन और अन्य गंभीर बीमारियों वाली महिलाओं को विशेष निगरानी की जरूरत होती है। विभाग का दावा है कि चिन्हित हाई-रिस्क महिलाओं को प्रसवपूर्व देखभाल के दायरे में लाया गया है।
प्रमुख सचिव गायत्री राठौड़ ने क्या निर्देश दिए?
विभाग ने सभी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों को महीने में दो बार समीक्षा बैठक करने और हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की पहचान, उपचार और फॉलोअप की नियमित निगरानी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं के लिए क्यों जरूरी है समय पर इलाज?
स्वास्थ्य विभाग का निगरानी अभियान इसी व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है। लेकिन इसकी प्रभावशीलता केवल हाई-रिस्क महिलाओं की पहचान की संख्या से नहीं, बल्कि समय पर मिले इलाज और स्वास्थ्य परिणामों से भी आंकी जानी चाहिए।
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