खनिजों के खजाने पर बैठे तीन राज्य, फिर भी पूरी कमाई से दूर, एमपी-सीजी और राजस्थान के सामने वैल्यू एडिशन की चुनौती

Arun Tiwari | Oct 28, 2026, 14:07 IST
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मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में खनिज उत्पादन
मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में खनिज उत्पादन

देश में खनिजों की कोई कमी नहीं है। मध्यप्रदेश तांबे के उत्पादन में आगे है, छत्तीसगढ़ लौह अयस्क और टिन के लिए जाना जाता है, तो राजस्थान सीसा-जस्ता जैसे खनिजों के मामले में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके बावजूद भारत को हर साल बड़ी मात्रा में धातुओं और अयस्कों का विदेशों से आयात करना पड़ता है।

सवाल यह है कि जब हमारे अपने राज्यों में इतने खनिज मौजूद हैं, तो देश को दूसरे देशों पर निर्भर क्यों रहना पड़ता है?

नीति आयोग की Trade Watch Quarterly की अप्रैल-जून 2026 की रिपोर्ट इस सवाल को समझने में मदद करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का धातु और अयस्क आयात 2015 में 32.2 अरब डॉलर था, जो 2025 में बढ़कर 60.5 अरब डॉलर हो गया। यानी दस साल में आयात लगभग दोगुना हो गया।

इसका मतलब यह नहीं है कि देश में खनिज नहीं हैं। असली चुनौती यह है कि खनिजों को निकालने के साथ-साथ उन्हें उपयोगी धातुओं और तैयार सामान में बदलने की क्षमता भी बढ़ानी होगी। इसे आसान भाषा में Value Addition यानी किसी कच्चे माल को ज्यादा उपयोगी और कीमती उत्पाद में बदलना कहते हैं।

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के लिए यही बड़ा अवसर है। अगर इन राज्यों में खनिजों से जुड़े उद्योगों, आधुनिक तकनीक और तैयार सामान के उत्पादन को बढ़ावा मिलता है, तो इससे उद्योगों को फायदा हो सकता है। साथ ही रोजगार और कारोबार के नए अवसर भी बन सकते हैं।

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मध्यप्रदेश: तांबे के उत्पादन में देश में सबसे आगे

मध्यप्रदेश की पहचान देश के प्रमुख खनिज उत्पादक राज्यों में होती है। नीति आयोग की रिपोर्ट में दिए गए 2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक, देश के कुल तांबा अयस्क उत्पादन में मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी 76.6 प्रतिशत है।

इसके अलावा, मैंगनीज अयस्क के उत्पादन में राज्य की हिस्सेदारी 26.1 प्रतिशत और फॉस्फोराइट में 20.2 प्रतिशत है। इन खनिजों का इस्तेमाल अलग-अलग उद्योगों में किया जाता है। तांबा बिजली के उपकरणों और इलेक्ट्रॉनिक्स में काम आता है। मैंगनीज का उपयोग इस्पात बनाने में होता है, जबकि फॉस्फोराइट उर्वरक उद्योग के लिए महत्वपूर्ण है।

इतने बड़े उत्पादन के बावजूद मध्यप्रदेश के सामने एक बड़ा अवसर है। राज्य में सिर्फ खनिज निकालने तक सीमित रहने के बजाय उनसे तैयार सामान बनाने वाले उद्योगों को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।

इसके लिए आधुनिक मशीनों, तकनीकी जानकारी, निवेश और प्रसंस्करण संयंत्रों की जरूरत होगी। जब कच्चे खनिज से तैयार उत्पाद बनाया जाता है, तो उसकी कीमत बढ़ सकती है और उद्योगों को आगे बढ़ने का मौका मिलता है।

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भीलवाड़ा में जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट फंड का दुरुपयोग, MLA निजी कॉलोनाइजर के लिए बन रहे सड़के
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भीलवाड़ा में जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (DMFT) के 10 करोड़ रुपए की राशि से विधायक (MLA) की निजी कॉलोनाइजर के लिए सड़कें बनाने का मामला सामने आया है। गैर-वन क्षेत्र के लिए जारी इस फंड का इस्तेमाल निजी कॉलोनियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा था। जब इसकी भनक कलेक्टर को लगी, तो उन्होंने तुरंत काम रोक दिया।
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छत्तीसगढ़: लौह अयस्क और टिन से बढ़ सकती है औद्योगिक ताकत

छत्तीसगढ़ भी खनिज संपदा के मामले में देश के महत्वपूर्ण राज्यों में शामिल है। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, देश के कुल लौह अयस्क उत्पादन में छत्तीसगढ़ की हिस्सेदारी 15.1 प्रतिशत है। वहीं, रिपोर्ट में दर्ज टिन अयस्क उत्पादन में राज्य की हिस्सेदारी 100 प्रतिशत बताई गई है।

लौह अयस्क इस्पात बनाने के लिए जरूरी है। इसका इस्तेमाल निर्माण कार्यों, मशीनों और कई तरह के औद्योगिक सामान के उत्पादन में होता है। छत्तीसगढ़ में मौजूद खनिज संसाधन इस्पात और धातु आधारित उद्योगों के विकास के लिए मजबूत आधार देते हैं।

लेकिन खनिजों का उत्पादन करना और उनसे तैयार सामान बनाना दो अलग-अलग बातें हैं। अगर राज्य में कच्चे लौह अयस्क के साथ-साथ तैयार इस्पात उत्पादों और इंजीनियरिंग से जुड़े सामान का उत्पादन बढ़ता है, तो खनिजों से मिलने वाला आर्थिक लाभ बढ़ाने की संभावना बन सकती है।

इसके लिए नए उद्योगों में निवेश, आधुनिक तकनीक और बेहतर परिवहन व्यवस्था की जरूरत होगी। खदानों से औद्योगिक क्षेत्रों तक सामान पहुंचाने की लागत भी महत्वपूर्ण है।

इसके अलावा, वन और पर्यावरण से जुड़ी मंजूरियों की प्रक्रिया तथा नई परियोजनाओं में निवेश जैसी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट में देश के औद्योगिक विकास के संदर्भ में मंजूरियों में देरी, प्रक्रियागत रुकावटों और परिवहन लागत को प्रमुख चुनौतियों में शामिल किया गया है।

खनिज का राष्ट्रीय उत्पादन में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की हिस्सेदारी
खनिज का राष्ट्रीय उत्पादन में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की हिस्सेदारी

राजस्थान: सीसा-जस्ता और दूसरे खनिजों में मजबूत स्थिति

राजस्थान भी देश के खनिज क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, चयनित खनिज अयस्कों के राष्ट्रीय उत्पादन में राज्य की हिस्सेदारी 23.2 प्रतिशत है।

रिपोर्ट में दर्ज सीसा-जस्ता अयस्क उत्पादन में राजस्थान की हिस्सेदारी 100 प्रतिशत बताई गई है। इसके अलावा, सेलेनाइट, गार्नेट और सिलिसियस अर्थ के दर्ज उत्पादन में भी राज्य की हिस्सेदारी 100 प्रतिशत है।

इन आंकड़ों से पता चलता है कि राजस्थान के पास कई ऐसे खनिज हैं, जो अलग-अलग उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण हैं। अब राज्य के सामने इन संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने और उनसे अधिक मूल्य वाले उत्पाद तैयार करने की संभावना है।

इसके लिए खनिजों के प्रसंस्करण, आधुनिक तकनीक और उद्योगों में निवेश पर ध्यान देना होगा। तैयार उत्पादों की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण होगी, ताकि उन्हें देश के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने के अवसर बढ़ सकें।

हालांकि, इन उत्पादन आंकड़ों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि राजस्थान के कुल खनन राजस्व या निर्यात में कितनी कमी है। इसके लिए अलग आंकड़ों की जरूरत होगी।

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तीनों राज्यों के सामने कौन-सी बड़ी चुनौतियां हैं?

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के पास खनिजों का बड़ा आधार है। लेकिन इसका पूरा फायदा उठाने के लिए कुछ जरूरी चुनौतियों पर काम करना होगा।

1. कच्चे खनिज से तैयार सामान बनाना: केवल खनिज निकालने से पूरी आर्थिक क्षमता का इस्तेमाल नहीं हो पाता। इसके लिए प्रसंस्करण संयंत्र और तैयार उत्पाद बनाने वाले उद्योगों की जरूरत है।

2. परियोजनाओं को समय पर मंजूरी: नई खदानों और उद्योगों से जुड़ी परियोजनाओं में मंजूरी की प्रक्रिया लंबी होने पर काम में देरी हो सकती है। इससे लागत भी बढ़ सकती है।

3. परिवहन और ऊर्जा की लागत: खनिजों को खदानों से फैक्ट्रियों और बाजारों तक पहुंचाने में खर्च आता है। ऊर्जा और परिवहन महंगा होने पर तैयार सामान की लागत बढ़ सकती है।

4. विदेशों में सामान बेचने की चुनौती: अंतरराष्ट्रीय बाजार में सामान बेचने के लिए गुणवत्ता, कीमत और पर्यावरण से जुड़े नियमों का ध्यान रखना जरूरी है। यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM इस्पात और एल्युमीनियम जैसे उत्पादों के निर्यात में कार्बन उत्सर्जन से जुड़े नियमों को महत्वपूर्ण बनाता है।

5. जरूरी खनिजों की उपलब्धता: तांबा, निकल और कोबाल्ट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक आपूर्ति कुछ देशों में केंद्रित है। ऐसे में भारत के लिए घरेलू खोज, प्रसंस्करण और पुराने उत्पादों से खनिज दोबारा हासिल करने यानी Recycling की क्षमता बढ़ाना जरूरी है।

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By Arun Tiwari
रायपुर : छत्तीसगढ़ में खनन की लगातार अनुमति ने आदिवासियों की आंदोलित कर दिया है। हालात एक बार फिर 8 पहले जैसे बनने लगे हैं। आदिवासियों में विरोध की आग भड़क रही है। रामगढ़ पहाड़ी के बाद अब बैलाडीला के नंदराज पर्वत पर अस्तित्व का संकट मंडरा गया है। इन दोनों के पीछे मुख्य सूत्रधार अडानी कंपनी है।
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खनिज संपदा से रोजगार और उद्योगों को कैसे मिलेगा फायदा?

खनिजों से आर्थिक फायदा बढ़ाने का रास्ता सिर्फ खनन तक सीमित नहीं है। अगर खदानों के आसपास प्रसंस्करण इकाइयां, फैक्ट्रियां और खनिज आधारित उद्योग विकसित होते हैं, तो स्थानीय स्तर पर कारोबार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

इससे परिवहन, मशीनों की मरम्मत, निर्माण और अन्य सेवाओं से जुड़े काम भी बढ़ सकते हैं। हालांकि, रोजगार और आय में वास्तविक बढ़ोतरी कितनी होगी, यह निवेश, परियोजनाओं और उद्योगों की क्षमता पर निर्भर करेगा।

तीनों राज्यों के लिए जरूरी है कि वे खनिज उत्पादन के साथ तैयार उत्पाद बनाने की क्षमता भी मजबूत करें। इससे देश की जरूरतों को पूरा करने और विदेशी बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिल सकती है।

खनिजों का खजाना है, अब बेहतर इस्तेमाल जरूरी

नीति आयोग की रिपोर्ट से यह बात सामने आती है कि भारत के सामने खनिजों की उपलब्धता के साथ-साथ उन्हें उपयोगी और तैयार उत्पादों में बदलने की क्षमता बढ़ाने की चुनौती भी है।

मध्यप्रदेश तांबे के उत्पादन में, छत्तीसगढ़ लौह अयस्क और टिन में तथा राजस्थान सीसा-जस्ता समेत कई खनिजों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इन राज्यों के पास उद्योगों को आगे बढ़ाने का मजबूत आधार मौजूद है।

अब जरूरत है कि खनन के साथ प्रसंस्करण, आधुनिक तकनीक, निवेश और निर्यात पर भी ध्यान दिया जाए। इससे खनिज संपदा को अधिक आर्थिक मूल्य में बदलने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
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