क्या बदल रही है हवा, ब्रिटेन पर बढ़ रहा बेशकीमती कोहिनूर हीरा को भारत लौटाने का दबाव
Jinesh Jain | May 01, 2026, 16:53 IST
Photograph: (the sootr)
किंग चार्ल्स की अमेरिका यात्रा में बेशकीमती कोहिनूर हीरा भारत को लौटाने का मुद्दा गूंजा। ममदानी ने कहा कि वे किंग चार्ल्स से इस हीरे को लौटाने का आग्रह करेंगे। यह बयान ऐसे समय आया है, जब दुनिया में विरासतों को मूल देशों को लौटाने की मांग जोर पकड़ रही है
New York: इतिहास खुद को दोहराता नहीं है, लेकिन वह कभी-कभी ऐसी करवट लेता है कि सदियों पुरानी चीखें वर्तमान के शोर में भी साफ सुनाई देने लगती हैं। हाल ही में न्यूयॉर्क की धरती पर कुछ ऐसा ही हुआ। अवसर था 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों की 25वीं बरसी पर हो रहे आयोजन का, लेकिन चर्चा का केंद्र बन गया दुनिया का सबसे बेशकीमती हीरा- कोहिनूर।
न्यूयॉर्क सिटी के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने ब्रिटेन के किंग चार्ल्स तृतीय की अमेरिका यात्रा के दौरान एक ऐसा बयान दिया, जिसने कूटनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। ममदानी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे किंग चार्ल्स से कोहिनूर हीरे को भारत वापस लौटाने का आग्रह करेंगे। यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि एक ऐसे घाव पर उंगली रखने जैसा था जिसे ब्रिटेन दशकों से ढंकने की कोशिश करता रहा है।
हाल ही में जब न्यूयॉर्क 9/11 के शहीदों को याद करने की तैयारी कर रहा था, तब प्रेस कॉन्फ्रेंस में मेयर ममदानी ने मीडिया के सामने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, अगर मुझे किंग चार्ल्स से अलग से बात करने का मौका मिलता है तो मैं उन्हें कोहिनूर हीरा भारत को वापस करने के लिए प्रेरित करूंगा।
यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि ज़ोहरान ममदानी खुद भारतीय मूल के हैं। वे प्रसिद्ध भारतीय फिल्म निर्माता मीरा नायर के बेटे हैं। उनकी पहचान एक प्रखर नेता के रूप में रही है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली शहरों में से एक के प्रमुख के तौर पर उनकी इस मांग ने भारत के सदियों पुराने संघर्ष को एक नया वैश्विक मंच प्रदान कर दिया है।
किंग चार्ल्स और क्वीन कैमिला वर्तमान में अमेरिका की चार दिवसीय यात्रा पर हैं। उनकी इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य 11 सितंबर के हमलों की 25वीं बरसी पर एकजुटता प्रदर्शित करना था। किंग चार्ल्स ने ग्राउंड ज़ीरो पर जाकर उन जुड़वां टावरों की याद में बने स्मारक पर पुष्प अर्पित किए, जहां कभी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर खड़ा था।
हालांकि, इस भावुक और औपचारिक दौरे के बीच कोहिनूर का मुद्दा उठना ब्रिटिश राजघराने के लिए असहज करने वाला रहा। समारोह के दौरान किंग चार्ल्स और मेयर ममदानी के बीच संक्षिप्त बातचीत भी हुई, लेकिन बकिंघम पैलेस ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है। सवाल वही बना हुआ है, क्या ममदानी ने सीधे किंग से वह सवाल पूछा जो करोड़ों भारतीयों के दिल में है?
कोहिनूर का फारसी में अर्थ है रोशनी का पर्वत। बेशकीमती हीरा कोहिनूर महज एक पत्थर नहीं है। यह सत्ता, संघर्ष और साम्राज्य के उत्थान-पतन का गवाह है। यह हीरा भारत की प्रसिद्ध कोल्लूर खदान (आंध्र प्रदेश) से निकला था।
सदियों तक भारत में यह मुगल सम्राटों की शान रहा। नादिर शाह इसे लूटकर ईरान ले गया, फिर यह अफगान शासकों के पास पहुंचा और अंततः पंजाब के शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के पास वापस आया।
1849 में जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने पंजाब का विलय किया, तब 10 वर्षीय महाराजा दलीप सिंह को अपनी गद्दी छोड़नी पड़ी। लाहौर की संधि के तहत इस 105 कैरेट के हीरे को महारानी विक्टोरिया को भेंट करने के लिए मजबूर किया गया। भारतीय इतिहासकारों के लिए यह भेंट नहीं, बल्कि एक बच्चे से जबरन कराई गई लूट थी।
भारत सरकार ने समय-समय पर कोहिनूर की वापसी की मांग की है। 2016 में भारत ने इसे राष्ट्र के इतिहास में गहरी जड़ों वाला कला का एक बहुमूल्य हिस्सा बताया था।
हालांकि, भारत का रुख हमेशा कूटनीतिक रहा है। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कभी कहा था कि कला की वस्तुओं को उपहार के रूप में देखना या विदेशी संग्रहालयों में उनका होना बुरा नहीं है, लेकिन कोहिनूर के मामले में जनभावनाएं अलग हैं।
यह हीरा औपनिवेशिक शोषण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, जिसे वापस लाना भारतीयों के लिए राष्ट्रीय गौरव की बात मानी जाती है।
वर्तमान में कोहिनूर लंदन के टावर ऑफ लंदन के ज्वेल हाउस में सुरक्षित रखा गया है। ऐतिहासिक शाही महलों की चैरिटी के अनुसार, यह हीरा दुनिया के सबसे बड़े तराशे गए हीरों में से एक है।
ब्रिटेन का तर्क हमेशा से यह रहा है कि यह हीरा संधि के तहत वैध रूप से प्राप्त हुआ था। लेकिन ममदानी जैसे आधुनिक नेताओं का तर्क है कि औपनिवेशिक काल के दौरान किए गए समझौते नैतिक रूप से गलत थे।
किंग चार्ल्स के राज्याभिषेक के समय भी यह चर्चा उठी थी कि क्या क्वीन कैमिला इसे पहनेंगी, लेकिन विवादों से बचने के लिए इसे टाल दिया गया।
मेयर ममदानी का यह बयान एक बड़े वैश्विक आंदोलन का हिस्सा है, जिसे उपनिवेशवाद का अंत कहा जा रहा है। हाल के वर्षों में जर्मनी ने नाइजीरिया को उसके 'बेनिन ब्रोंज' लौटाए हैं। फ्रांस ने अपनी पूर्व अफ्रीकी कॉलोनियों को उनकी कलाकृतियां वापस करना शुरू किया है।
ऐसे में ब्रिटेन पर दबाव बढ़ रहा है कि वह अपने संग्रहालयों में रखे उन अवशेषों को लौटाए जो कभी दूसरे देशों की पहचान हुआ करते थे।
मेयर ज़ोहरान ममदानी ने जो चिंगारी न्यूयॉर्क में सुलगाई है, उसकी तपिश लंदन तक महसूस की जा रही है। भले ही बकिंघम पैलेस मौन हो, लेकिन यह स्पष्ट है कि कोहिनूर का मुद्दा अब केवल इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति, पहचान और ऐतिहासिक न्याय का विषय बन चुका है।
क्या किंग चार्ल्स अपने शासनकाल में इस ऐतिहासिक गलती को सुधारने का साहस दिखाएंगे? या फिर कोहिनूर हमेशा के लिए लंदन की ठंडी दीवारों के पीछे कैद रहेगा, भारत की मिट्टी की महक को याद करते हुए?
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न्यूयॉर्क सिटी के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने ब्रिटेन के किंग चार्ल्स तृतीय की अमेरिका यात्रा के दौरान एक ऐसा बयान दिया, जिसने कूटनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। ममदानी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे किंग चार्ल्स से कोहिनूर हीरे को भारत वापस लौटाने का आग्रह करेंगे। यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि एक ऐसे घाव पर उंगली रखने जैसा था जिसे ब्रिटेन दशकों से ढंकने की कोशिश करता रहा है।
वापस लौटाओ हमारी अमानत
यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि ज़ोहरान ममदानी खुद भारतीय मूल के हैं। वे प्रसिद्ध भारतीय फिल्म निर्माता मीरा नायर के बेटे हैं। उनकी पहचान एक प्रखर नेता के रूप में रही है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली शहरों में से एक के प्रमुख के तौर पर उनकी इस मांग ने भारत के सदियों पुराने संघर्ष को एक नया वैश्विक मंच प्रदान कर दिया है।
किंग चार्ल्स की यात्रा
हालांकि, इस भावुक और औपचारिक दौरे के बीच कोहिनूर का मुद्दा उठना ब्रिटिश राजघराने के लिए असहज करने वाला रहा। समारोह के दौरान किंग चार्ल्स और मेयर ममदानी के बीच संक्षिप्त बातचीत भी हुई, लेकिन बकिंघम पैलेस ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है। सवाल वही बना हुआ है, क्या ममदानी ने सीधे किंग से वह सवाल पूछा जो करोड़ों भारतीयों के दिल में है?
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कोहिनूर: गोलकुंडा से लंदन तक
सदियों तक भारत में यह मुगल सम्राटों की शान रहा। नादिर शाह इसे लूटकर ईरान ले गया, फिर यह अफगान शासकों के पास पहुंचा और अंततः पंजाब के शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के पास वापस आया।
1849 में जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने पंजाब का विलय किया, तब 10 वर्षीय महाराजा दलीप सिंह को अपनी गद्दी छोड़नी पड़ी। लाहौर की संधि के तहत इस 105 कैरेट के हीरे को महारानी विक्टोरिया को भेंट करने के लिए मजबूर किया गया। भारतीय इतिहासकारों के लिए यह भेंट नहीं, बल्कि एक बच्चे से जबरन कराई गई लूट थी।
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भारत का रुख: यह हमारी आत्मा
हालांकि, भारत का रुख हमेशा कूटनीतिक रहा है। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कभी कहा था कि कला की वस्तुओं को उपहार के रूप में देखना या विदेशी संग्रहालयों में उनका होना बुरा नहीं है, लेकिन कोहिनूर के मामले में जनभावनाएं अलग हैं।
यह हीरा औपनिवेशिक शोषण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, जिसे वापस लाना भारतीयों के लिए राष्ट्रीय गौरव की बात मानी जाती है।
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ब्रिटेन की चुप्पी और क्राउन जूवेल्स का रहस्य
ब्रिटेन का तर्क हमेशा से यह रहा है कि यह हीरा संधि के तहत वैध रूप से प्राप्त हुआ था। लेकिन ममदानी जैसे आधुनिक नेताओं का तर्क है कि औपनिवेशिक काल के दौरान किए गए समझौते नैतिक रूप से गलत थे।
किंग चार्ल्स के राज्याभिषेक के समय भी यह चर्चा उठी थी कि क्या क्वीन कैमिला इसे पहनेंगी, लेकिन विवादों से बचने के लिए इसे टाल दिया गया।
क्या बदल रही है हवा?
ऐसे में ब्रिटेन पर दबाव बढ़ रहा है कि वह अपने संग्रहालयों में रखे उन अवशेषों को लौटाए जो कभी दूसरे देशों की पहचान हुआ करते थे।
न्याय की प्रतीक्षा में कोहिनूर
क्या किंग चार्ल्स अपने शासनकाल में इस ऐतिहासिक गलती को सुधारने का साहस दिखाएंगे? या फिर कोहिनूर हमेशा के लिए लंदन की ठंडी दीवारों के पीछे कैद रहेगा, भारत की मिट्टी की महक को याद करते हुए?
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