जेन-जी और शिक्षा: क्या हमारी पढ़ाई समय से पीछे रह गई है?
Pawan Modiya | Jul 27, 2026, 08:45 IST
जेन-जी बनाम पुरानी शिक्षा
जेन-जी के नाम पर हो रही नारेबाजी से आगे बढ़कर असली मुद्दा शिक्षा व्यवस्था का है। रिटायर्ड आईएएस मनोज श्रीवास्तव के इस लेख में Excellent Sheep जैसी किताबों का भी जिक्र है। जो बताती हैं कि बड़े कॉलेज दिशाहीन छात्र तैयार कर रहे हैं।
मनोज श्रीवास्तव
आज की युवा पीढ़ी को अक्सर उसके व्यवहार, सोच और विरोध के तरीके से पहचाना जाता है। लेकिन कुछ लोगों के व्यवहार के आधार पर पूरी जेन-जी का आकलन करना सही नहीं होगा। कुछ लोगों की हरकतों को पूरी पीढ़ी की सोच नहीं माना जा सकता। असली जेन-जी का सबसे बड़ा सवाल शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है।
यह पीढ़ी इंटरनेट, डिजिटल दुनिया और तेजी से बदलती तकनीक के बीच बड़ी हुई है। इसके बावजूद स्कूल और कॉलेज आज भी कई मामलों में पुराने ढांचे पर चल रहे हैं। यही वजह है कि पढ़ाई और छात्रों की अपेक्षाओं के बीच दूरी बढ़ती जा रही है।
अमेरिकी शिक्षाविद् नील पोस्टमैन ने अपनी किताब The End of Education में शिक्षा के उद्देश्य पर बड़ा सवाल उठाया है। उनके मुताबिक शिक्षा केवल रोजगार दिलाने का माध्यम नहीं होनी चाहिए। अगर पढ़ाई का लक्ष्य सिर्फ नौकरी रह जाए, तो वह शिक्षा नहीं बल्कि प्रशिक्षण बनकर रह जाती है।
पोस्टमैन का मानना है कि स्कूल और कॉलेज ऐसे स्थान होने चाहिए, जहां छात्र जीवन का अर्थ समझें। वे सही और गलत में अंतर करना सीखें। उनमें सोचने और सवाल पूछने की क्षमता विकसित हो। अगर शिक्षा यह काम नहीं कर रही, तो उसका मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।
आज के समय में यह सवाल पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। लाखों छात्र अच्छी डिग्री लेकर निकल रहे हैं। उन्हें नौकरी भी मिल रही है। लेकिन कई छात्र अपने जीवन के उद्देश्य को लेकर असमंजस में रहते हैं। लेखक के अनुसार यही आधुनिक शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती है।
अमेरिकी लेखक विलियम डेरेसिविज़ की किताब Excellent Sheep में प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था की आलोचना की गई है। ये संस्थान ऐसे छात्र तैयार कर रहे हैं, जो पढ़ाई में बहुत सफल हैं, लेकिन अपने जीवन की दिशा तय नहीं कर पा रहे।
किताब के अनुसार ऐसे छात्र परीक्षा में अच्छे अंक लाते हैं। उनका रिज्यूमे मजबूत होता है। वे हर प्रतियोगिता में आगे रहते हैं। लेकिन वे यह नहीं समझ पाते कि वास्तव में उन्हें जीवन में क्या करना है।
शिक्षा छात्रों को यह नहीं सिखा रही कि सही तरीके से कैसे सोचना है। वह केवल यह सिखा रही है कि सफल कैसे दिखना है। यही वजह है कि कई छात्र अपनी पसंद के बजाय समाज की तय की हुई राह पर चल पड़ते हैं।
Excellent Sheep में लेखक ने "Excellent Sheep" यानी "उत्कृष्ट भेड़" शब्द का इस्तेमाल किया है। उनका तर्क है कि कई प्रतिष्ठित कॉलेज ऐसे छात्र तैयार कर रहे हैं जो आज्ञाकारी हैं, जोखिम लेने से बचते हैं और तय रास्ते पर चलते हैं।
ऐसे छात्र मेहनती जरूर होते हैं, लेकिन उनमें स्वतंत्र सोच कम होती है। वे सुरक्षित करियर चुनते हैं। नए प्रयोग करने से बचते हैं। उनका लक्ष्य केवल बेहतर अंक, बेहतर कॉलेज और बेहतर नौकरी तक सीमित रह जाता है।
इस सोच का असर केवल छात्र पर नहीं पड़ता। इससे पूरी शिक्षा व्यवस्था भी प्रभावित होती है। कॉलेजों का ध्यान व्यक्तित्व निर्माण से हटकर केवल उपलब्धियां गिनाने तक सीमित हो जाता है।
क्या
आदर्श स्थिति में मेरिट का मतलब प्रतिभा और मेहनत होना चाहिए। लेकिन कई बार संसाधन, आर्थिक स्थिति, अच्छे स्कूल और मजबूत संपर्क भी सफलता तय करते हैं।
कई प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश केवल प्रतिभा का परिणाम नहीं होता। परिवार की पृष्ठभूमि, बेहतर सुविधाएं और पहले से मौजूद अवसर भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। ऐसे में केवल अंक देखकर किसी छात्र की क्षमता का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता।
कॉलेज का काम सिर्फ डिग्री देना नहीं है। उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी छात्रों को अपने जीवन के मूल्य समझने में मदद करना भी है। उन्हें नैतिक साहस देना, सही निर्णय लेना सिखाना और जीवन का उद्देश्य खोजने में सहयोग करना भी शिक्षा का हिस्सा होना चाहिए।
आज यह उद्देश्य कमजोर होता जा रहा है। छात्रों पर लगातार बेहतर प्रदर्शन का दबाव रहता है। हर समय दूसरों से आगे निकलने की होड़ रहती है। इसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई देता है। कई छात्र खुद को थका हुआ और दिशाहीन महसूस करते हैं।
इसी कारण बड़ी संख्या में छात्र वही करियर चुनते हैं जिसे सबसे सुरक्षित माना जाता है। बैंकिंग, कंसल्टिंग और दूसरी प्रतिष्ठित नौकरियां उनकी पहली पसंद बन जाती हैं। लेखक के अनुसार ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन्हें अपनी वास्तविक रुचि और उद्देश्य का स्पष्ट पता नहीं होता।
आज शिक्षा का उद्देश्य धीरे-धीरे बदल गया है। पहले पढ़ाई का मकसद ज्ञान हासिल करना और बेहतर इंसान बनना माना जाता था। अब कई जगह डिग्री, रिज्यूमे और प्रमाणपत्र सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गए हैं।
इसे "क्रेडेंशियलिज्म" कह सकते हैं। इसका मतलब है कि छात्र हर गतिविधि इसलिए करते हैं ताकि उनका रिज्यूमे मजबूत दिखे। पढ़ाई का आनंद या किसी विषय को समझने की इच्छा पीछे छूट जाती है। इससे छात्रों में रचनात्मक सोच कम होती है। वे जोखिम लेने से बचते हैं और वही रास्ता चुनते हैं, जिसे सबसे सुरक्षित माना जाता है।
इस स्थिति से निकलने के सार्वजनिक उच्च शिक्षा को और मजबूत बनाया जाना चाहिए। साथ ही छात्रों को खुद को समझने और नए प्रयोग करने की आजादी मिलनी चाहिए। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो केवल नौकरी नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का विकास भी करे। छात्रों को अलग-अलग विषय पढ़ने, नए विचारों को समझने और स्वतंत्र रूप से सोचने का अवसर मिलना चाहिए।
दाखिले की प्रक्रिया में भी बदलाव हों। अवसर अधिक निष्पक्ष हों और छात्रों का मूल्यांकन उनकी वास्तविक क्षमता के आधार पर किया जाए।Mismatch, The Diversity Delusion, A Dubious Expediency, The Affirmative Action Myth और The Fall of Affirmative Action जैसी किताबों में अमेरिकी उच्च शिक्षा, प्रवेश नीतियों और योग्यता आधारित व्यवस्था पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखे गए हैं। कई लेखक मानते हैं कि कुछ नीतियों के कारण छात्रों और संस्थानों पर लंबे समय के प्रभाव पड़े हैं।
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में एक फैसला दिया था। अदालत ने हार्वर्ड और यूएनसी (UNC) की प्रवेश प्रक्रिया पर फैसला सुनाते हुए नस्ल आधारित प्रवेश नीति को असंवैधानिक माना।अदालत ने कहा कि हर छात्र का मूल्यांकन व्यक्तिगत उपलब्धियों और अनुभवों के आधार पर होना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि प्रवेश प्रक्रिया में किसी छात्र की नस्ल को सीधे आधार नहीं बनाया जा सकता। यह फैसला अमेरिका में शिक्षा और प्रवेश नीति की बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया।
पुराने
भारत में भी शिक्षा पर गंभीर चर्चा की जरूरत है। वे मानते हैं कि केवल पुराने विचारों और तर्कों से नई पीढ़ी को समझाना आसान नहीं होगा। आज की जेन-जी अलग माहौल में बड़ी हुई है। उसने इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक के साथ जीवन बिताया है। इसलिए उसकी सोच भी पहले की पीढ़ियों से अलग है।
यदि शिक्षा व्यवस्था समय के साथ नहीं बदलेगी, तो छात्रों और संस्थानों के बीच दूरी बढ़ती जाएगी। नई पीढ़ी केवल डिग्री नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा चाहती है जो उसे सोचने, समझने और अपने जीवन का रास्ता चुनने की आजादी दे।
शिक्षा का उद्देश्य केवल अच्छे अंक, बड़ी डिग्री या सुरक्षित नौकरी तक सीमित नहीं होना चाहिए। शिक्षा का असली काम बेहतर इंसान बनाना, स्वतंत्र सोच विकसित करना और छात्रों को जीवन का उद्देश्य समझने में मदद करना है।
जेन-जी की चुनौतियों को समझने के लिए शिक्षा व्यवस्था को समय के साथ बदलना होगा। नई पीढ़ी पुराने जवाबों से संतुष्ट नहीं है। वह ऐसे सवाल पूछ रही है, जिनका जवाब आधुनिक शिक्षा को देना होगा।
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यह पीढ़ी इंटरनेट, डिजिटल दुनिया और तेजी से बदलती तकनीक के बीच बड़ी हुई है। इसके बावजूद स्कूल और कॉलेज आज भी कई मामलों में पुराने ढांचे पर चल रहे हैं। यही वजह है कि पढ़ाई और छात्रों की अपेक्षाओं के बीच दूरी बढ़ती जा रही है।
शिक्षा का मकसद सिर्फ नौकरी नहीं
पोस्टमैन का मानना है कि स्कूल और कॉलेज ऐसे स्थान होने चाहिए, जहां छात्र जीवन का अर्थ समझें। वे सही और गलत में अंतर करना सीखें। उनमें सोचने और सवाल पूछने की क्षमता विकसित हो। अगर शिक्षा यह काम नहीं कर रही, तो उसका मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।
आज के समय में यह सवाल पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। लाखों छात्र अच्छी डिग्री लेकर निकल रहे हैं। उन्हें नौकरी भी मिल रही है। लेकिन कई छात्र अपने जीवन के उद्देश्य को लेकर असमंजस में रहते हैं। लेखक के अनुसार यही आधुनिक शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती है।
'Excellent Sheep' क्या कहती है?
किताब के अनुसार ऐसे छात्र परीक्षा में अच्छे अंक लाते हैं। उनका रिज्यूमे मजबूत होता है। वे हर प्रतियोगिता में आगे रहते हैं। लेकिन वे यह नहीं समझ पाते कि वास्तव में उन्हें जीवन में क्या करना है।
शिक्षा छात्रों को यह नहीं सिखा रही कि सही तरीके से कैसे सोचना है। वह केवल यह सिखा रही है कि सफल कैसे दिखना है। यही वजह है कि कई छात्र अपनी पसंद के बजाय समाज की तय की हुई राह पर चल पड़ते हैं।
'उत्कृष्ट भेड़' की अवधारणा
ऐसे छात्र मेहनती जरूर होते हैं, लेकिन उनमें स्वतंत्र सोच कम होती है। वे सुरक्षित करियर चुनते हैं। नए प्रयोग करने से बचते हैं। उनका लक्ष्य केवल बेहतर अंक, बेहतर कॉलेज और बेहतर नौकरी तक सीमित रह जाता है।
इस सोच का असर केवल छात्र पर नहीं पड़ता। इससे पूरी शिक्षा व्यवस्था भी प्रभावित होती है। कॉलेजों का ध्यान व्यक्तित्व निर्माण से हटकर केवल उपलब्धियां गिनाने तक सीमित हो जाता है।
क्या मेरिट हमेशा निष्पक्ष होती है?
कई प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश केवल प्रतिभा का परिणाम नहीं होता। परिवार की पृष्ठभूमि, बेहतर सुविधाएं और पहले से मौजूद अवसर भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। ऐसे में केवल अंक देखकर किसी छात्र की क्षमता का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता।
कॉलेज की असली जिम्मेदारी क्या है?
आज यह उद्देश्य कमजोर होता जा रहा है। छात्रों पर लगातार बेहतर प्रदर्शन का दबाव रहता है। हर समय दूसरों से आगे निकलने की होड़ रहती है। इसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई देता है। कई छात्र खुद को थका हुआ और दिशाहीन महसूस करते हैं।
इसी कारण बड़ी संख्या में छात्र वही करियर चुनते हैं जिसे सबसे सुरक्षित माना जाता है। बैंकिंग, कंसल्टिंग और दूसरी प्रतिष्ठित नौकरियां उनकी पहली पसंद बन जाती हैं। लेखक के अनुसार ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन्हें अपनी वास्तविक रुचि और उद्देश्य का स्पष्ट पता नहीं होता।
क्या शिक्षा केवल डिग्री तक सीमित हो गई है?
इसे "क्रेडेंशियलिज्म" कह सकते हैं। इसका मतलब है कि छात्र हर गतिविधि इसलिए करते हैं ताकि उनका रिज्यूमे मजबूत दिखे। पढ़ाई का आनंद या किसी विषय को समझने की इच्छा पीछे छूट जाती है। इससे छात्रों में रचनात्मक सोच कम होती है। वे जोखिम लेने से बचते हैं और वही रास्ता चुनते हैं, जिसे सबसे सुरक्षित माना जाता है।
नए प्रयोगों की आजादी हो
दाखिले की प्रक्रिया में भी बदलाव हों। अवसर अधिक निष्पक्ष हों और छात्रों का मूल्यांकन उनकी वास्तविक क्षमता के आधार पर किया जाए।Mismatch, The Diversity Delusion, A Dubious Expediency, The Affirmative Action Myth और The Fall of Affirmative Action जैसी किताबों में अमेरिकी उच्च शिक्षा, प्रवेश नीतियों और योग्यता आधारित व्यवस्था पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखे गए हैं। कई लेखक मानते हैं कि कुछ नीतियों के कारण छात्रों और संस्थानों पर लंबे समय के प्रभाव पड़े हैं।
अमेरिका की अदालत का फैसला
अदालत ने यह भी कहा कि प्रवेश प्रक्रिया में किसी छात्र की नस्ल को सीधे आधार नहीं बनाया जा सकता। यह फैसला अमेरिका में शिक्षा और प्रवेश नीति की बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया।
पुराने विचार नई पीढ़ी पर नहीं थोप सकते
यदि शिक्षा व्यवस्था समय के साथ नहीं बदलेगी, तो छात्रों और संस्थानों के बीच दूरी बढ़ती जाएगी। नई पीढ़ी केवल डिग्री नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा चाहती है जो उसे सोचने, समझने और अपने जीवन का रास्ता चुनने की आजादी दे।
शिक्षा व्यवस्था में समय के साथ बदलाव जरूरी
जेन-जी की चुनौतियों को समझने के लिए शिक्षा व्यवस्था को समय के साथ बदलना होगा। नई पीढ़ी पुराने जवाबों से संतुष्ट नहीं है। वह ऐसे सवाल पूछ रही है, जिनका जवाब आधुनिक शिक्षा को देना होगा।
Disclaimer: "यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचार और वैचारिक विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य भाषा और साहित्य में नैतिकता पर सामान्य चर्चा करना है, न कि किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या राजनीतिक विचारधारा को लक्षित करना।
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