एचवी शेषाद्रि जन्मजयंती: RSS जहां कुर्सी से बड़ा है कर्तव्य
The Sootr | May 25, 2026, 19:14 IST
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एचवी शेषाद्रि यानी होंगसन्द्र वेंकटरमैया शेषाद्रि की जन्मजयंती पर विशेष: RSS की वह परंपरा जिसमें सरसंघचालक पद मिलने पर भी विनम्रता से मना कर दिया। पद नहीं, दायित्व ही जीवन।
26 मई- एचवी शेषाद्रि (H. V. Seshadri) की जन्मजयंती। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के उन नेताओं में से एक, जिन्होंने देश को एक अलग तरह की नेतृत्व शैली दिखाई। जहां पद नहीं, जिम्मेदारी सबसे बड़ी होती है।
कर्नाटक में जन्मे एचवी शेषाद्रि ने विद्यार्थी जीवन में ही संघ से जुड़ने का फैसला किया। संघ की शाखा उनके लिए सिर्फ विचारों की जगह नहीं थी। वह उनके पूरे व्यक्तित्व को गढ़ने की प्रयोगशाला बनी।
जब
1990 के दशक के अंत में चौथे सरसंघचालक प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जु भैय्या स्वास्थ्य कारणों से पद छोड़ना चाहते थे। कई कार्यकर्ता चाहते थे कि यह जिम्मेदारी शेषाद्रि जी को दी जाए।
लेकिन उन्होंने सीधे कह दिया: स्वास्थ्य ऐसा नहीं कि यह दायित्व निभा सकूं। युवा कार्यकर्ता को अवसर मिलना चाहिए। यह महज विनम्रता नहीं थी। यह उस सोच का हिस्सा था, जिसमें संगठन हमेशा व्यक्ति से बड़ा होता है। अंततः यह जिम्मेदारी सुदर्शन जी को सौंपी गई। शेषाद्रि जी ने सह-सरकार्यवाह के रूप में पूरी निष्ठा से काम जारी रखा।
इस लेख के लेखक कैलाश चन्द्र का एक संस्मरण है। उन्होंने खुद देखा कि शेषाद्रि ने सरसंघचालक रज्जु भैय्या का कुर्ता खुद तुरपाई करके पहनाया। यह छोटी-सी बात बड़ा संदेश देती है। दोनों में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं थी। सिर्फ आत्मीयता थी, सेवा थी, अहंकार नहीं था।
दोनों के बीच का यह रिश्ता भी असाधारण था। एक समय रज्जु भैय्या सरकार्यवाह थे और शेषाद्रि क्षेत्र प्रचारक। कुछ वर्षों बाद शेषाद्रि सरकार्यवाह बने तो रज्जु भैय्या सह-सरकार्यवाह रहे। फिर रज्जु भैय्या सरसंघचालक बने और शेषाद्रि ने उनके नेतृत्व में काम किया।
यह सोच संघ में शुरू से रही है। डॉ. हेडगेवार ने खुद कहा था कि जैसे ही उनसे ज्यादा योग्य कार्यकर्ता मिलेगा, जिम्मेदारी उसे दे दी जाएगी। श्री गुरुजी यानी M. S. Golwalkar को पत्र के जरिए पता चला कि उन्हें सरसंघचालक बनाया गया है। उन्होंने कहा यह दायित्व मेरा व्यक्तिगत नहीं, संगठन का है।
एचवी शेषाद्रि सिर्फ संगठनकर्ता नहीं थे। वे गहरे विचारक, लेखक और संघ प्रचारक भी थे। उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं-
राष्ट्र निर्माण की दिशा- जिसमें उन्होंने शिक्षा, सेवा, समरसता, संस्कार और समाज-संगठन को राष्ट्र-निर्माण के पाँच स्तंभ बताया।
भारत की राष्ट्रीय पहचान- भारत को सिर्फ भौगोलिक नहीं, सांस्कृतिक इकाई के रूप में समझाने वाली किताब।
संघ एक परिचय- उन लोगों के लिए जो RSS को बिना पूर्वाग्रह के समझना चाहते हैं।
Hindu Renaissance (अंग्रेजी)- हिंदू समाज के पुनर्जागरण की वैश्विक प्रक्रिया का अध्ययन।
RSS Chiefशेषाद्रि जी का जीवन एक सवाल छोड़ जाता है। अगर पद मिले और आप उसे ठुकरा सकते हों, तो क्या आप ठुकराएंगे?
उनका जवाब था- हां, अगर संगठन की जरूरत कुछ और हो तो। यही संघ की असली ताकत है। यहां आदमी नहीं, व्यवस्था चलती है। शेषाद्रि जी इसी व्यवस्था के सबसे चमकते हुए उदाहरण थे।
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कर्नाटक में जन्मे एचवी शेषाद्रि ने विद्यार्थी जीवन में ही संघ से जुड़ने का फैसला किया। संघ की शाखा उनके लिए सिर्फ विचारों की जगह नहीं थी। वह उनके पूरे व्यक्तित्व को गढ़ने की प्रयोगशाला बनी।
जब सरसंघचालक पद ठुकरा दिया
लेकिन उन्होंने सीधे कह दिया: स्वास्थ्य ऐसा नहीं कि यह दायित्व निभा सकूं। युवा कार्यकर्ता को अवसर मिलना चाहिए। यह महज विनम्रता नहीं थी। यह उस सोच का हिस्सा था, जिसमें संगठन हमेशा व्यक्ति से बड़ा होता है। अंततः यह जिम्मेदारी सुदर्शन जी को सौंपी गई। शेषाद्रि जी ने सह-सरकार्यवाह के रूप में पूरी निष्ठा से काम जारी रखा।
रज्जु भैय्या का कुर्ता और एक अनूठी मित्रता
दोनों के बीच का यह रिश्ता भी असाधारण था। एक समय रज्जु भैय्या सरकार्यवाह थे और शेषाद्रि क्षेत्र प्रचारक। कुछ वर्षों बाद शेषाद्रि सरकार्यवाह बने तो रज्जु भैय्या सह-सरकार्यवाह रहे। फिर रज्जु भैय्या सरसंघचालक बने और शेषाद्रि ने उनके नेतृत्व में काम किया।
RSS की दायित्व परंपरा
- बाला साहब देवरस ने कहा: संगठन की शक्ति सेवा से बढ़ती है, पद से नहीं। स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्होंने स्वयं दायित्व छोड़ने का आग्रह किया।
- रज्जु भैय्या ने भी यही कहा: दायित्व मेरा नहीं, संघ का है। और खुद ही पद छोड़ने की बात की।
- सुदर्शन ने कहा: दायित्व कभी हल्का नहीं होता, लेकिन स्वयंसेवक उसे आनंद से निभाता है।
किताबें जो विचार बन गईं
राष्ट्र निर्माण की दिशा- जिसमें उन्होंने शिक्षा, सेवा, समरसता, संस्कार और समाज-संगठन को राष्ट्र-निर्माण के पाँच स्तंभ बताया।
भारत की राष्ट्रीय पहचान- भारत को सिर्फ भौगोलिक नहीं, सांस्कृतिक इकाई के रूप में समझाने वाली किताब।
संघ एक परिचय- उन लोगों के लिए जो RSS को बिना पूर्वाग्रह के समझना चाहते हैं।
Hindu Renaissance (अंग्रेजी)- हिंदू समाज के पुनर्जागरण की वैश्विक प्रक्रिया का अध्ययन।
कर्तव्य ही सच्चा गौरव है
उनका जवाब था- हां, अगर संगठन की जरूरत कुछ और हो तो। यही संघ की असली ताकत है। यहां आदमी नहीं, व्यवस्था चलती है। शेषाद्रि जी इसी व्यवस्था के सबसे चमकते हुए उदाहरण थे।
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क्या सर्वभक्षी काॅकरोच किसी बदलाव का प्रतीक हो सकता है?
रायपुर के 2 लाख से अधिक यूथ कॉकरोच जनता पार्टी के डिजिटल आंदोलन में हुए शामिल
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