भाजपा चुनाव जीत रही है, लेकिन अर्थव्यवस्था हार रही है
The Sootr | May 22, 2026, 18:22 IST
economy
भारत इस वक्त एक अजीब दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ राजनीतिक ताकत अपने चरम पर है- चुनाव दर चुनाव जीत, और देश में लगभग एकदलीय शासन का माहौल। दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था के कई अहम पैमाने चुपचाप कमजोर पड़ रहे हैं। सवाल यह नहीं कि भारत तरक्की कर रहा है या नहीं, सवाल यह है कि क्या यह उतनी रफ्तार से बढ़ रहा है जितना बढ़ सकता था?
हम अक्सर सुनते हैं कि भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है। यह दावा आधा सच है। जीडीपी की वृद्धि दर करीब 6% सालाना है, जो बुरी नहीं। लेकिन तुलना किससे हो रही है, यह ज्यादा जरूरी सवाल है। अगर पिछले 35 साल के अपने ही औसत से तुलना करें या दूसरे उभरते देशों से देखें तो तस्वीर काफी अलग निकलती है।
साल 2014 के बाद से जीडीपी वृद्धि के आधार पर दुनिया में भारत की रैंक नौवीं है। प्रति व्यक्ति आय वृद्धि में आठवीं। और अगर डॉलर में प्रति व्यक्ति आय की बात करें, तो भारत 16वें स्थान पर है। जबकि बांग्लादेश पहले और इथियोपिया दूसरे स्थान पर। यह आंकड़ा असहज करने वाला है, लेकिन नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भारतीय करेंसी नोट (रुपए) की हालत भी कम चिंताजनक नहीं। पिछले एक साल में रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 12% कमजोर हुआ है, और यह लगातार सातवां साल है, जब रुपया गिरा है। साल 2025 में इसे एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में गिना गया।
विडंबना यह है कि इस दौरान मुद्रास्फीति (inflation - यानी महंगाई) काबू में थी, चालू खाता घाटा प्रबंधनीय था, और राजनीतिक स्थिरता असाधारण रूप से मजबूत थी। सामान्य परिस्थितियों में ये सब संकेत मुद्रा को मजबूत बनाते हैं, लेकिन यहां उल्टा हो रहा है।
पहला और सबसे बड़ा- सरकार खुद। समस्या दिखती है, लेकिन हल निकालने की बजाय दोष दूसरों पर मढ़ा जाता है। दूसरा- बड़ी कंपनियां, जो सरकारी नीतियों से लाभ उठाती हैं पर सुधार का दबाव नहीं बनातीं। तीसरा- एक कमजोर विपक्ष, जो असरदार चुनौती देने में नाकाम है और जिसकी वजह से सत्तारूढ़ दल के लिए जवाबदेही का दबाव ही नहीं रहता। चौथा- एक ऐसा अदृश्य तंत्र जो यथास्थिति बनाए रखने में सहूलियत महसूस करता है।
किसी भी अर्थव्यवस्था की असली रफ्तार काफी हद तक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI - Foreign Direct Investment) पर निर्भर करती है। FDI सिर्फ पैसा नहीं लाता- वह तकनीक, रोजगार और वैश्विक बाजार से जुड़ाव भी लाता है। लेकिन पिछले एक दशक में भारत में FDI का माहौल उलझता चला गया।
2015 में द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT- Bilateral Investment Treaty) में ऐसे बदलाव किए गए जिन्होंने विदेशी निवेशकों की राह कठिन कर दी। अगर कोई निवेशक भारत में नुकसान उठाए और न्याय चाहे, तो उसे पहले पांच साल तक भारतीय अदालतों में भटकना होगा। तब जाकर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता (international arbitration) का रास्ता खुलेगा और वह मध्यस्थता भी एक भारतीय न्यायाधीश के सामने। जब भारत के अपने नागरिक यहां की अदालतों से कतराते हैं, तो एक विदेशी निवेशक से यह उम्मीद करना कि वह इस व्यवस्था पर भरोसा करेगा, यह थोड़ा अव्यावहारिक है।
इसके साथ ही QCO यानी Quality Control Orders की तादाद 2017 में महज 14 थी, जो दिसंबर 2024 तक 765 हो गई। ये आदेश घरेलू उद्योग की रक्षा के नाम पर लागू होते हैं, लेकिन असर में ये आयात पर अघोषित रोक की तरह काम करते हैं- और विदेशी कंपनियों को भारत में काम करना मुश्किल बनाते हैं।
सरकार की तरफ से जो जवाब आता है, वह यह है कि भारतीयों को देश में ही निवेश करना चाहिए। लेकिन निवेशक भावनाओं से नहीं, फायदे के हिसाब से चलते हैं। और आज का हिसाब यही कहता है कि भारत से बाहर जाओ, या भारत में मत आओ।
एक और जरूरी संदर्भ- जब कहा जाता है कि भारत बड़ा बाजार है तो ध्यान रहे कि 2025 में भारत की पूरी GDP अमेरिका के एक राज्य- कैलिफोर्निया- से भी छोटी थी। यह अहंकार नहीं, सावधानी की बात है।
विदेश में जो परिवार काम करते हैं और घर पैसे भेजते हैं, रुपए की गिरावट से उनके घर का खर्च बढ़ता है। जो बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं, उनकी फीस डॉलर में चुकानी पड़ती है। जो दवाइयां या मशीनें आयात होती हैं, वे महंगी होती जाती हैं। और रोजगार? FDI न आने का सीधा मतलब है- कम नई नौकरियां, कम तकनीक, कम विकल्प।
भारत के पास अभी भी असली ताकत है- बड़ी आबादी, बढ़ता मध्यम वर्ग, डिजिटल बुनियादी ढांचा और राजनीतिक स्थिरता। ये फायदे गंवाए नहीं गए हैं। लेकिन ये फायदे तभी फल देंगे जब नीतियाँ उन्हें सहारा दें।
जब राजनीतिक सफलता इतनी बड़ी हो कि सरकार को लगने लगे- जीत रहे हैं, तो सब ठीक है- तभी असली खतरा पैदा होता है। क्योंकि चुनाव सत्ता देते हैं। समृद्धि केवल सही नीतियां देती हैं। और दुनिया देख रही है कि भारत इन दोनों में से किसे प्राथमिकता देता है।
सोर्स- ( सरजीत एस भल्ला फर्स्ट ऑफिशियल हाउसहोल्ड इनकम सर्वे के तकनीकी विशेषज्ञ समूह के अध्यक्ष हैं। यह विश्लेषण Indian Express में प्रकाशित उनके मूल लेख पर आधारित है। व्यक्त विचार उनके निजी हैं। )
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साल 2014 के बाद से जीडीपी वृद्धि के आधार पर दुनिया में भारत की रैंक नौवीं है। प्रति व्यक्ति आय वृद्धि में आठवीं। और अगर डॉलर में प्रति व्यक्ति आय की बात करें, तो भारत 16वें स्थान पर है। जबकि बांग्लादेश पहले और इथियोपिया दूसरे स्थान पर। यह आंकड़ा असहज करने वाला है, लेकिन नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सात साल से गिर ही रहा है रुपया
विडंबना यह है कि इस दौरान मुद्रास्फीति (inflation - यानी महंगाई) काबू में थी, चालू खाता घाटा प्रबंधनीय था, और राजनीतिक स्थिरता असाधारण रूप से मजबूत थी। सामान्य परिस्थितियों में ये सब संकेत मुद्रा को मजबूत बनाते हैं, लेकिन यहां उल्टा हो रहा है।
इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
निवेशक क्यों नहीं आ रहे?
2015 में द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT- Bilateral Investment Treaty) में ऐसे बदलाव किए गए जिन्होंने विदेशी निवेशकों की राह कठिन कर दी। अगर कोई निवेशक भारत में नुकसान उठाए और न्याय चाहे, तो उसे पहले पांच साल तक भारतीय अदालतों में भटकना होगा। तब जाकर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता (international arbitration) का रास्ता खुलेगा और वह मध्यस्थता भी एक भारतीय न्यायाधीश के सामने। जब भारत के अपने नागरिक यहां की अदालतों से कतराते हैं, तो एक विदेशी निवेशक से यह उम्मीद करना कि वह इस व्यवस्था पर भरोसा करेगा, यह थोड़ा अव्यावहारिक है।
इसके साथ ही QCO यानी Quality Control Orders की तादाद 2017 में महज 14 थी, जो दिसंबर 2024 तक 765 हो गई। ये आदेश घरेलू उद्योग की रक्षा के नाम पर लागू होते हैं, लेकिन असर में ये आयात पर अघोषित रोक की तरह काम करते हैं- और विदेशी कंपनियों को भारत में काम करना मुश्किल बनाते हैं।
सरकार की तरफ से जो जवाब आता है, वह यह है कि भारतीयों को देश में ही निवेश करना चाहिए। लेकिन निवेशक भावनाओं से नहीं, फायदे के हिसाब से चलते हैं। और आज का हिसाब यही कहता है कि भारत से बाहर जाओ, या भारत में मत आओ।
एक और जरूरी संदर्भ- जब कहा जाता है कि भारत बड़ा बाजार है तो ध्यान रहे कि 2025 में भारत की पूरी GDP अमेरिका के एक राज्य- कैलिफोर्निया- से भी छोटी थी। यह अहंकार नहीं, सावधानी की बात है।
आपकी जेब पर क्या असर?
तो फिर आगे क्या?
जब राजनीतिक सफलता इतनी बड़ी हो कि सरकार को लगने लगे- जीत रहे हैं, तो सब ठीक है- तभी असली खतरा पैदा होता है। क्योंकि चुनाव सत्ता देते हैं। समृद्धि केवल सही नीतियां देती हैं। और दुनिया देख रही है कि भारत इन दोनों में से किसे प्राथमिकता देता है।
सोर्स- ( सरजीत एस भल्ला फर्स्ट ऑफिशियल हाउसहोल्ड इनकम सर्वे के तकनीकी विशेषज्ञ समूह के अध्यक्ष हैं। यह विश्लेषण Indian Express में प्रकाशित उनके मूल लेख पर आधारित है। व्यक्त विचार उनके निजी हैं। )
ये खबरें भी पढ़िए...
महिला–ओबीसी आरक्षण और परिसीमन: भारतीय राजनीति की अगली बड़ी करवट
चीन की सीमा से पाक की सरहद तक भगवा...
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