भारतीय परिवारों में बढ़ती खामोशी: सच, भ्रम और समाधान-कैलाश चन्द्र
The Sootr | Apr 21, 2026, 19:09 IST
silent divorce bharatiya
भारत में Silent Divorce यानी बिना कानूनी अलगाव के भावनात्मक दूरी बढ़ रही है। डिजिटल व्यस्तता, काम का बोझ और संवाद की कमी इसकी बड़ी वजह हैं। लेकिन भारत की तलाक दर अभी भी दुनिया में सबसे कम है।
भारतीय समाज सदियों से परिवार- आधारित सभ्यता के रूप में पहचाना जाता रहा है। संयुक्त परिवार, कुटुम्ब व्यवस्था, धार्मिक- सांस्कृतिक मूल्य और पारिवारिक दायित्व, ये सब हमारे रिश्तों को स्थिरता प्रदान करते आए हैं। लेकिन हाल के वर्षों में शहरी जीवनशैली, डिजिटल व्यस्तता और बदलती सामाजिक प्रतीक- व्यवस्था के बीच एक नई चर्चा उभर रही है कि पति-पत्नी साथ रहते हुए भी भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं।
कुछ लोग इसे अघोषित तलाक या Silent Divorce कहकर प्रस्तुत करते हैं, मानों भारतीय परिवार बड़े पैमाने पर टूट रहे हों। लेकिन जहां कुछ अनुभूतियां सच्चाई का स्पर्श रखती हैं, वहीं पूरे समाज को टूटता हुआ बताना एक अतिशयोक्ति है। वास्तविकता इससे कहीं अधिक संतुलित और बहुआयामी है।
सबसे पहले तथ्यों की बात करें। भारत की आधिकारिक तलाक दर अब भी दुनिया में सबसे कम है- लगभग 1 से 1.5 प्रतिशत। यह केवल सरकारी आंकड़ा नहीं, बल्कि विभिन्न समाजशास्त्रीय सर्वेक्षणों द्वारा भी पुष्टि की गई वास्तविकता है। भारत जैसे विशाल और विविध देश में करोड़ों विवाहों के बावजूद अलगाव की घटनाएं सीमित स्तर पर हैं।
यह दावा करना कि 90 प्रतिशत विवाह केवल ढोंग बनकर रह गए हैं, किसी भी विश्वसनीय शोध द्वारा समर्थित नहीं है। हां! यह भी सच है कि पारिवारिक जीवन में तनाव, संवाद की कमी और भावनात्मक दूरी जैसी समस्याएं बढ़ी हैं, लेकिन इन्हें पूरे समाज पर लागू नहीं किया जा सकता।
साइलेंट डाइवोर्स शब्द आज के समय की एक सामाजिक स्थिति को जरूर दर्शाता है। पति-पत्नी साथ रहते हैं, रोजमर्रा के काम चलते रहते हैं, लेकिन मन के स्तर पर दूरी बनी रहती है। न संवाद, न सामूहिकता और ना ही भावनात्मक निकटता। यह
स्थिति महानगरीय जीवन, कार्य-तनाव, डिजिटल व्यस्तता और एकाकी जीवनशैली के कारण बढ़ी है। मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग तो इस दूरी का सबसे बड़ा कारण बन चुका है। सामूहिक भोजन, परिवार के साथ समय बिताना, दैनिक बातचीत, ये सब स्क्रीन समय में दबकर रह गए हैं।
लेकिन यह कहना कि हर घर की यही कहानी है, ठीक नहीं। भारत में आज भी बड़े परिवारों, कस्बों और ग्रामीण समाज में दांपत्य संबंध पहले की तरह ही स्वाभाविक रूप से चल रहे हैं। संयुक्त परिवारों में सफाई से दिखता है कि रिश्तों में संवाद अधिक है, जिम्मेदारियां साझी हैं और सामाजिक-सांस्कृतिक जुड़ाव रिश्तों को मजबूती देता है।
शोध यह भी दिखाता है कि ऐसे परिवारों में भावनात्मक दूरी की संभावना कम होती है। जहां कई पीढ़ियां एक साथ रहती हैं, वहां जीवन की व्यस्तता भी रिश्तों को खत्म नहीं कर पाती, बल्कि उनके बीच स्वाभाविक संबंध बनाए रखती है।
अब सवाल उठता है कि आज परिवारों में खामोशी क्यों बढ़ी है? इसका उत्तर आधुनिक जीवनशैली में छिपा है। तेज प्रतिस्पर्धा, लंबा कार्य- सप्ताह, आर्थिक दबाव, बच्चों की परवरिश का तनाव, शहरी आवागमन, डिजिटल निर्भरता और सामाजिक अलगाव, इन सबने भावनात्मक संतुलन को प्रभावित किया है।
न्यूक्लियर परिवारों में पति-पत्नी दोनों पर दबाव बढ़ा है, और माता-पिता तथा बड़े परिजनों का सहारा कम हुआ है। परिणामस्वरूप तनाव और थकान के बीच संवाद कम होता जाता है। रिश्तों का आधार जो कभी सामूहिकता था, आज व्यक्तिगत व्यस्तता पर आकर टिक गया है।
लेकिन यह कमजोर होना अंतिम सत्य नहीं है। भारतीय परिवारों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी लचक और अनुकूलन-क्षमता है। पाश्चात्य समाजों की तरह व्यक्तिवादी विचारधारा अभी हमारी मूल प्रवृत्ति नहीं बनी है।
भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का अनुबंध नहीं, बल्कि एक सामाजिक-धार्मिक दायित्व है। कर्तव्य-बोध और ‘साझेदारी’ हमारे विवाह के प्रमुख स्तंभ हैं। यही कारण है कि मुश्किलें बढ़ने के बावजूद रिश्ते टिकते भी हैं और सुधरने की क्षमता भी रखते हैं।
आज की चुनौती यह नहीं कि परिवार टूट रहे हैं, बल्कि यह कि परिवारों में संवाद कम हो रहा है। संवाद किसी भी रिश्ते का प्राण है। जब बातचीत कम होती है, तो मन का तनाव बढ़ता है और व्यक्ति भीतर ही भीतर अलगाव महसूस करने लगता है।
डिजिटल दुनिया ने इस समस्या को और बढ़ाया है। यदि पति-पत्नी अपने दिन का बड़ा हिस्सा स्क्रीन पर बिताएंगे, तो जीवनसाथी के लिए समय और ऊर्जा स्वाभाविक रूप से कम पड़ेंगे ही। इसलिए समाधान तकनीक के विरोध में नहीं, बल्कि उसके अनुशासित उपयोग में है।
दूसरा समाधान परिवार और समाज के साथ दुबारा जुड़ाव है। त्योहार, पूजा, सामूहिक भोजन, पारिवारिक यात्राएं, घर के बुजुर्गों के साथ समय- ये सब घरेलू तनाव को कम करते हैं और रिश्तों में अपनापन बढ़ाते हैं। भारतीय संस्कृति में ऐसे क्षण हमेशा परिवार की स्थिरता के अनिवार्य अंग रहे हैं।
तीसरा समाधान बच्चों की परवरिश से जुड़ा है। आधुनिक परिवारों में एकल संतान या बच्चों के अत्यधिक हॉस्टल-निर्भर जीवन ने माता-पिता और बच्चों के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ाई है। परिवार का भावनात्मक तंत्र जब कमजोर होता है, तो पति-पत्नी के बीच भी तनाव बढ़ना स्वाभाविक है। इसलिए माता-पिता को चाहिए कि बच्चों को केवल सुविधाएं नहीं, बल्कि साथ भी दें।
अंत में, परिवार को बचाने का सबसे बड़ा तरीका वही है जो हमारी संस्कृति सदियों से सिखाती आई है- आपसी संवाद, समानता, सम्मान और सह-अस्तित्व। रिश्ते अधिकारों से नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों, धैर्य और प्रेम से चलते हैं। आज की दुनिया तेज है, तनावपूर्ण है, लेकिन पारिवारिक जीवन को बचाए रखने के साधन भी उतने ही मजबूत हैं, बस उन्हें अपनाने की जरूरत है।
भारत का परिवार संकट में नहीं, बल्कि संक्रमण काल में है। यदि हम समय रहते संवाद, संस्कार और सामूहिकता की ओर पुनः लौट आएँ, तो यह संक्रमण भी एक सृजनात्मक परिवर्तन में बदल सकता है।
(लेखक कैलाश चन्द्र आरएसएस के मध्य क्षेत्र प्रचार प्रमुख हैं)
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कुछ लोग इसे अघोषित तलाक या Silent Divorce कहकर प्रस्तुत करते हैं, मानों भारतीय परिवार बड़े पैमाने पर टूट रहे हों। लेकिन जहां कुछ अनुभूतियां सच्चाई का स्पर्श रखती हैं, वहीं पूरे समाज को टूटता हुआ बताना एक अतिशयोक्ति है। वास्तविकता इससे कहीं अधिक संतुलित और बहुआयामी है।
सबसे कम तलाक भारत में
यह दावा करना कि 90 प्रतिशत विवाह केवल ढोंग बनकर रह गए हैं, किसी भी विश्वसनीय शोध द्वारा समर्थित नहीं है। हां! यह भी सच है कि पारिवारिक जीवन में तनाव, संवाद की कमी और भावनात्मक दूरी जैसी समस्याएं बढ़ी हैं, लेकिन इन्हें पूरे समाज पर लागू नहीं किया जा सकता।
मोबाइल है विघटन का कारण
स्थिति महानगरीय जीवन, कार्य-तनाव, डिजिटल व्यस्तता और एकाकी जीवनशैली के कारण बढ़ी है। मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग तो इस दूरी का सबसे बड़ा कारण बन चुका है। सामूहिक भोजन, परिवार के साथ समय बिताना, दैनिक बातचीत, ये सब स्क्रीन समय में दबकर रह गए हैं।
लेकिन यह कहना कि हर घर की यही कहानी है, ठीक नहीं। भारत में आज भी बड़े परिवारों, कस्बों और ग्रामीण समाज में दांपत्य संबंध पहले की तरह ही स्वाभाविक रूप से चल रहे हैं। संयुक्त परिवारों में सफाई से दिखता है कि रिश्तों में संवाद अधिक है, जिम्मेदारियां साझी हैं और सामाजिक-सांस्कृतिक जुड़ाव रिश्तों को मजबूती देता है।
मोबाइल फोन बढ़ा रहे परिवारों में दूरियां
अब सवाल उठता है कि आज परिवारों में खामोशी क्यों बढ़ी है? इसका उत्तर आधुनिक जीवनशैली में छिपा है। तेज प्रतिस्पर्धा, लंबा कार्य- सप्ताह, आर्थिक दबाव, बच्चों की परवरिश का तनाव, शहरी आवागमन, डिजिटल निर्भरता और सामाजिक अलगाव, इन सबने भावनात्मक संतुलन को प्रभावित किया है।
न्यूक्लियर परिवारों में पति-पत्नी दोनों पर दबाव बढ़ा है, और माता-पिता तथा बड़े परिजनों का सहारा कम हुआ है। परिणामस्वरूप तनाव और थकान के बीच संवाद कम होता जाता है। रिश्तों का आधार जो कभी सामूहिकता था, आज व्यक्तिगत व्यस्तता पर आकर टिक गया है।
लेकिन यह कमजोर होना अंतिम सत्य नहीं है। भारतीय परिवारों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी लचक और अनुकूलन-क्षमता है। पाश्चात्य समाजों की तरह व्यक्तिवादी विचारधारा अभी हमारी मूल प्रवृत्ति नहीं बनी है।
भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का अनुबंध नहीं, बल्कि एक सामाजिक-धार्मिक दायित्व है। कर्तव्य-बोध और ‘साझेदारी’ हमारे विवाह के प्रमुख स्तंभ हैं। यही कारण है कि मुश्किलें बढ़ने के बावजूद रिश्ते टिकते भी हैं और सुधरने की क्षमता भी रखते हैं।
संवाद ही बचाएगा परिवार की संस्था
डिजिटल दुनिया ने इस समस्या को और बढ़ाया है। यदि पति-पत्नी अपने दिन का बड़ा हिस्सा स्क्रीन पर बिताएंगे, तो जीवनसाथी के लिए समय और ऊर्जा स्वाभाविक रूप से कम पड़ेंगे ही। इसलिए समाधान तकनीक के विरोध में नहीं, बल्कि उसके अनुशासित उपयोग में है।
दूसरा समाधान परिवार और समाज के साथ दुबारा जुड़ाव है। त्योहार, पूजा, सामूहिक भोजन, पारिवारिक यात्राएं, घर के बुजुर्गों के साथ समय- ये सब घरेलू तनाव को कम करते हैं और रिश्तों में अपनापन बढ़ाते हैं। भारतीय संस्कृति में ऐसे क्षण हमेशा परिवार की स्थिरता के अनिवार्य अंग रहे हैं।
तीसरा समाधान बच्चों की परवरिश से जुड़ा है। आधुनिक परिवारों में एकल संतान या बच्चों के अत्यधिक हॉस्टल-निर्भर जीवन ने माता-पिता और बच्चों के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ाई है। परिवार का भावनात्मक तंत्र जब कमजोर होता है, तो पति-पत्नी के बीच भी तनाव बढ़ना स्वाभाविक है। इसलिए माता-पिता को चाहिए कि बच्चों को केवल सुविधाएं नहीं, बल्कि साथ भी दें।
अंत में, परिवार को बचाने का सबसे बड़ा तरीका वही है जो हमारी संस्कृति सदियों से सिखाती आई है- आपसी संवाद, समानता, सम्मान और सह-अस्तित्व। रिश्ते अधिकारों से नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों, धैर्य और प्रेम से चलते हैं। आज की दुनिया तेज है, तनावपूर्ण है, लेकिन पारिवारिक जीवन को बचाए रखने के साधन भी उतने ही मजबूत हैं, बस उन्हें अपनाने की जरूरत है।
भारत का परिवार संकट में नहीं, बल्कि संक्रमण काल में है। यदि हम समय रहते संवाद, संस्कार और सामूहिकता की ओर पुनः लौट आएँ, तो यह संक्रमण भी एक सृजनात्मक परिवर्तन में बदल सकता है।
(लेखक कैलाश चन्द्र आरएसएस के मध्य क्षेत्र प्रचार प्रमुख हैं)
FAQ
- Silent Divorce क्या होता है और यह सामान्य तलाक से कैसे अलग है?
Silent Divorce एक ऐसी स्थिति है जिसमें पति-पत्नी कानूनी रूप से अलग नहीं होते, लेकिन उनके बीच भावनात्मक संवाद लगभग खत्म हो जाता है। दोनों एक ही घर में रहते हैं, रोजमर्रा के काम चलते रहते हैं, लेकिन मन से एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं। सामान्य तलाक में कानूनी प्रक्रिया होती है और अलगाव सार्वजनिक होता है। Silent Divorce में यह सब बाहर से दिखता नहीं। यह ज्यादातर शहरी जीवन, डिजिटल व्यस्तता और काम के अत्यधिक बोझ के कारण होता है। - क्या भारत में Silent Divorce की समस्या बहुत बड़ी है?
भारत की आधिकारिक तलाक दर दुनिया में सबसे कम है, करीब 1 से 1.5 प्रतिशत। यह दावा कि 90 प्रतिशत भारतीय विवाह दिखावा बन गए हैं, किसी विश्वसनीय शोध पर आधारित नहीं है। हां, शहरी परिवारों में भावनात्मक दूरी की समस्या जरूर बढ़ी है। लेकिन ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में संयुक्त परिवार अभी भी मजबूत हैं। समस्या असली है, लेकिन पूरे समाज को इसके आधार पर नहीं आंका जा सकता। प्रश्न 3: Silent Divorce से बचने के लिए क्या किया जा सकता है? - Silent Divorce से बचने के लिए क्या किया जा सकता है?
सबसे पहले संवाद बढ़ाएं। रोज कुछ समय सिर्फ एक-दूसरे से बात करने के लिए निकालें। स्मार्टफोन का उपयोग सीमित करें, खासकर परिवार के साथ समय बिताते वक्त। त्योहारों, पारिवारिक यात्राओं और सामूहिक भोजन को नियमित आदत बनाएं। बुजुर्गों और बड़े परिजनों से जुड़े रहें। बच्चों को सिर्फ सुविधाएं नहीं, अपना साथ भी दें। जरूरत हो तो किसी विवाह परामर्शदाता (Marriage Counselor) की मदद लेने में संकोच न करें।
महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए चाहिए सबका साथ : पीएम मोदी
खाड़ी देशों में भारतीयों की सुरक्षा से समझौता कर रही कांग्रेस: पीएम मोदी
ईश्वर किसी को भी बिना प्रतिभा के इस दुनिया में भेजता ही नहीं
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