बिरसा मुंडा: राष्ट्र निर्माण में जनजातीय समाज के योगदान का स्मृति दिवस
The Sootr | Nov 14, 2024, 14:25 IST
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समाज, संस्कृति और राष्ट्र के लिए जनजातीय समाज के अभूतपूर्व योगदान का स्मरण करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस आयोजन करने की परंपरा आरंभ की। 15 नवंबर को बलिदानी भगवान बिरसा मुंडा की जयंती है।
जनजातीय समाज ने एक ओर वन, पर्वत और नदियों के संरक्षण के माध्यम से संपूर्ण प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा में अपना जीवन समर्पित किया है। वहीं दूसरी ओर राष्ट्र पर संकट आते ही युद्ध के मैदान में प्रत्येक विदेशी आक्रमण का सशस्त्र सामना भी किया है। समाज,संस्कृति और राष्ट्र के लिये जनजातीय समाज के अभूतपूर्व योगदान का स्मरण करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस आयोजन करने की परंपरा आरंभ की। 15 नवंबर को बलिदानी भगवान बिरसा मुंडा की जयंती है।
भारत यदि सोने की चिड़िया रहा है, विश्व गुरु रहा है तो इसमें जनजातीय समाज का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सोने की चिड़िया का अर्थ है आर्थिक संपन्नता और विश्व गुरु होने का अर्थ ज्ञान विज्ञान में सर्वोपरि। भारत की संपन्नता शिल्प, कौशल और विशिष्ट तकनीक से निर्मित वस्तुओं के निर्यात में रही है। इनका निर्माण जनजातीय समाज के कुटीर उद्योगों में होता था। इसकी झलक जनजातीय समाज की रंगोली, भीति चित्रों में मिलती है। यहां से ये वस्तुएं जलयानों द्वारा दुनियां भर में जातीं थीं और बदले में सोना आता था इसलिए भारत सोने की चिड़िया कहलाता। प्राचीन भारत में शिक्षा, चिकित्सा और अनुसंधान के सभी केन्द्र वन में होते थे। इनका संचालन तो ऋषि महर्षि करते थे लेकिन इन केंद्रों और आश्रमों सुरक्षा से लेकर अन्य सामग्री जुटाने तक की संपूर्ण व्यवस्था जनजातीय समाज के बंधुओं के हाथ में ही होती थी। इन आश्रमों की सुरक्षा के लिये संघर्ष और व्यवस्था के लिये धन जुटाने की कथाओं का वर्णन पुराणों में है।
इसी प्रकार भारत पर हुए प्रत्येक आक्रमणकारी का सामना करने में भारतीय जनजातीय समाज कभी पीछे नहीं रहा । इसे भारत पर यूनानी हमलावर सिकन्दर के आक्रमण से लेकर अंग्रेजी काल तक देखा जा सकता है। जनजातीय समाज के योद्धाओं ने हर आक्रमण का डटकर सामना किया। सल्तनत काल और अंग्रेजी काल में जनजातीय समाज के संघर्ष और बलिदान की घटनाओं से इतिहास के पन्ने भरे हैं। अंग्रेजों ने भारत पर अपना शासन स्थापित करने के बाद भारतीय समाज का केवल शोषण और दमन ही नहीं किया था अपितु भारतीय संस्कृति को नष्ट करने का भी काम किया था। यह काम वनक्षेत्र में निवास करने वाले जनजातीय समाज में अधिक हुआ। अंग्रेजों ने भारत पर अपनी सत्ता स्थापित करने और उसे बनाए रखने के लिये बड़ी कूटनीति से काम लिया। उन्होंने सूची वन संपदा पर अधिकार करके वनों में निवास करने वाले जनजातीय समाज के सामने पेट भरने का संकट उपस्थित कर दिया। दूसरे वनों में चर्च सक्रिय हुआ। अंग्रेजों ने वन संपदा के संग्रहण के लिए जो ठेकेदार खड़े किए थे वे नगरीय समाज के थे।
जब वासियों के सामने पेट भरने की समस्या आई तो उनमें से कुछ को सिपाही या चौकीदार बना दिया और उन्हें अपने ही समाज बंधुओं के शोषण दमन के काम में लगा दिया । इसके पीछे अंग्रेजों की योजना थी कि यदि शोषण दमन से कुछ नाराजी हो तो वह अंग्रेजों के विरुद्ध न हो अपितु सामने दिख रहे उनकी ही समाज के सिपाहियों और नगरीय समाज के ठेकेदारों के प्रति हो। इसी स्थिति का लाभ ईसाई धर्म प्रचारक उठा रहे थे। मिशनरीज कुछ कूटरचित कहानियों और भावुक प्रसंग सुनकर जनजातीय समाज को अन्य समाज से ही नहीं उनकी जड़ों से दूर करने का प्रयास करते थे। शिक्षा और स्वास्थ्य सबंधी सहायता का आकर्षण देकर धर्मातान्तरण करवा रहे थे। अंग्रेजी काल में जनजातीय समाज ने पूरे देश में इन दोनों मोर्चों पर एक साथ संघर्ष किया। एक ओर अपनी संस्कृति रक्षा केलिये जन जागरण अभियान और दूसरा अंग्रेजों से भारत की मुक्ति के लिये सशस्त्र संघर्ष। लेकिन जन सामान्य को जनजातीय समाज के इस संघर्ष की जानकारी सबसे कम है। जन सामान्य को यह जानकारी देने केलिये ही प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी ने वर्ष 2021 में प्रतिवर्ष 15 नवम्बर को जनजातीय गौरव दिवस आयोजित करने की घोषणा की।
बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों से मुक्ति के लिए दिया जीवन का बलिदान
प्रत्येक समाज की अपनी विशेषताएं होती हैं जो उनकी मूल संस्कृति और परंपराओं में प्रतिबिम्बित होता हैं। स्वतंत्रता के बाद जनजातीय समाज के विकास के लिये प्रत्येक सरकार ने योजना बनाईं। लेकिन दो बातों पर ध्यान नहीं दिया। एक तो जनजातीय समाज का गौरवमय अतीत समाज के सामने कैसे आये और उनकी परंपराओं का संरक्षण कैसे हो। इसके अतिरिक्त एक और बात सरकार ने उनकी हित की जो योजनाएँ बनाती है, कई बार जानकारी के अभाव में वह समाज उन योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाता । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जनजाति गौरव दिवस आयोजित करने के पीछे यही प्रमुख उद्देश्य रहे हैं। एक तो जनजातीय समाज का गौरवशाली अतीत, राष्ट्र रक्षा के लिये उनके द्वारा किये गए बलिदान से समाज अवगत हो, दूसरा सरकार की योजनाओं की उन्हें जानकारी मिले। तीसरा वे अपनी संस्कृति और परंपराओं का महत्व समझें और चौथा इनमें स्वत्व का बोध हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनजातीय गौरव दिवस से एक "जन मन योजना" जोड़ी और "विकसित भारत संकल्प यात्रा" से जोड़ा।
प्रधानमंत्री जनधन योजना को "प्रधानमंत्री-जनजाति आदिवासी न्याय महा अभियान" के रूप में जाना जाता है इसका उद्देश्य देश के सभी राज्यों में निवासरत जनजातीय समुदायों को आत्मनिर्भर बनाना है । इसके लिये उनके शैक्षिक, आर्थिक, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास करना है। उनके विकास के लिये सरकार की अनेक योजनाएं हैं लेकिन जानकारी के अभाव में वे इसका लाभ नहीं उठा पाते। उन्हें इन योजनाओं की पर्याप्त जानकारी और योजना का लाभ उठाने के लिये उचित मार्गदर्शन देने के लिये 'विकसित भारत संकल्प यात्रा' का आयोजन किया गया। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2021 में पहले जनजातीय गौरव दिवस आयोजन के साथ इस यात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया थाव। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य सरकार की प्रमुख योजनाओं के लाभ सभी लक्षित लाभार्थियों तक पहुंचाना है। यात्रा पर निकले इन वाहनों में जनजातीय समाज के हित में लागू की गई सभी योजनाओं की जानकारी और इच्छुक व्यक्तियों के लिये आवेदन पत्र भी होते हैं। ये यात्रा वाहन जनजातीय गांवों और बस्तियों में कार्यक्रम आयोजित करते हैं और योजनाओं की जानकारी देने के साथ जनजातीय समाज के गौरव शाली इतिहास की जानकारी भी देते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जनजाति गौरव दिवस आयोजित करने के लिए 15 नवम्बर की तिथि का चयन भी विशेष महत्वपूर्ण है। राष्ट्र रक्षा के लिये जनजातीय समाज ने असंख्य बलिदान दिया है । देश का ऐसा कोई प्राँत, कोई कोना ऐसा नहीं जहां अपनी संस्कृति रक्षा और राष्ट्र रक्षा बलिदान न हुआ हो । जनजातीय समाज ने दोनों दिशाओं में संघर्ष किया है। समाज में कुछ ऐसी विलक्षण विभूतियाँ हुई हैं जिन्होंने अकेले इन दोनों दिशाओं में संघर्ष किया। जनजातीय संस्कृति रक्षा के लिये टोलियाँ बनाकर जन जागरण अभियान चलाया, समझा और उनके स्वत्व से जोड़ा, प्रवचन दिए और दूसरी ओर क्रांतिकारी दल गठित करके विदेशी सत्ता से सशस्त्र संघर्ष भी किया । ऐसे ही विलक्षण महानायक बिरसा मुंडा थे । वे केवल चौबीस वर्ष की आयु में बलिदान हुए । उनकी जन्म तिथि 15 नवम्बर है । प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इसी तिथि का चयन किया और वर्ष 2021 को उनके जन्म स्थान जाकर उन्हें नमन किया और उनकी जन्मतिथि 15 नवम्बर को प्रतिवर्ष जनजातीय गौरव दिवस मनाने की घोषणा की। मोदी जी 15 नवम्बर को केवल औपचारिक उत्सव आयोजन की तिथि तक सीमित नहीं रखना चाहते थे। वे इस दिन को जनजातीय समाज के उत्थान और विकास का निमित्त भी बनाना चाहते थे । इसलिये इस दिन गौरव दिवस के साथ प्रतिवर्ष दो यात्रा निकालने के भी निर्देश दिए। एक प्रतिवर्ष क्षेत्र और जिलों का निर्धारण करके शासन का एक ऐसा सुसज्जित वाहन जनजातीय क्षेत्रों में जाए जिसमें जनजातीय समाज के विकास की सभी योजनाओं का विवरण हो और उनका लाभ उठाने का मार्गदर्शन भी दिया जाए। इसके एक अभियान अन्य समाज में चले जिसमें जनजातीय समाज के राष्ट्र निर्माण में योगदान का विवरण दिया जाए। मोदी ने एक यात्रा को "जन मन" नाम दिया और दूसरी यात्रा का "संकल्प यात्रा" नाम दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस संकल्प को पूरा करने के लिये मध्यप्रदेश सरकार ने प्रत्येक जिला मुख्यालय तथा जनजातीय जनसंख्या बाहुल्य ब्लाक स्तर पर जनजातीय जागरण आयोजन करती है। ऐसे आयोजनों का यह चौथा साल है। मध्यप्रदेश में इस वर्ष इन दोनों संकल्पों को पूरा करने और आयोजन गरिमापूर्ण बनाने के लिये मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने बैठक करके विशिष्ट निर्देश जारी कर दिये भी दिए हैं। इस आधार पर जिला प्रशासन और स्थानीय सामाजिक संगठन सक्रिय भी हैं।
जीवन परिचय :
संपूर्ण भारतीय जनजातीय समाज क्रांतिकारी बिरसा मुंडा को एक अवतारी पुरुष मानता है और भगवान के रूप में मान्यता देता हैं। बिरसा मुंडा ने अपनी नम्रता, कौशल और आत्मबल से ब्रिटिश सरकार की जड़ें हिला दी थीं। उनके आव्हान पर सैकड़ों हजारों जनजातीय युवा एकत्र हो जाते थे। उत्पीड़न के विरुद्ध आरंभ उनका आंदोलन 'उलगुलान' या क्रांति कहा गया।
भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को झारखंड राज्य के अंतर्गत रांची जिले के उलिहातू ग्राम में हुआ था । उनका जन्म वर्ष कहीं कहीं 1872 भी लिखा है पर सरकारी रिकार्ड में 1875 ही माना गया है। पिता सुगना मुंडा बकरी चराने का काम करते थे। माता करमी हातू महुआ आदि वनोपज बीनकर बदले मे आटा आदि ले आतीं थीं। बिरसा के दो भाई और दो बहने भी थीं । उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके गांव के शिक्षक जयपाल नाग द्वारा हुई।1880 में आगे बढ़ने के लिये साल्गा गांव के ईसाई मिशनरी स्कूल भेजे गए। वहां उनका धर्मातान्तरण हुआ और नाम बिरसा डेविड रख दिया गया । उन दिनों यह पूरा क्षेत्र ईसाई मिशनरी के प्रभाव में था और अधिकांश लोगों का मतान्तरण कर दिया गया था। बिरसा जी बचपन से कुशाग्र बुद्धि और शारीरिक रूप से बलिष्ठ थे। वे प्रतिदिन व्यायाम करते थे। उन्हें अपनी परंपराओं से लगाव था।
उस विद्यालय जब भी शिक्षक जनजातीय परंपराओं का परिहास करते तो बिरसा आपत्ति करते थे। बिरसा को ईसाई मत की प्रशंसा पर आपत्ति नहीं थी लेकिन भारतीय परंपराओं विशेषकर जनजातीय समाज की परंपराओं का परिहास उन्हें पसंद न था। एक दिन वे इसी विषय पर पादरी से तर्क करने लगे तो उन्हें विद्यालय से निकाल दिया गया । यह 1890 का वर्ष था। पुरी नगर स्थित भगवान जगन्नाथ जनजातीय समाज के कुल देवता माने जाते हैं। आज भी जगन्नाथ रथ यात्रा में सबर जनजातीय समाज के मुखिया शामिल होते हैं। बिरसा ने पूरी तक पदयात्रा की। वहां पहुंचकर पन्द्रह दिन की साधना की। उन्हें एक स्वप्न आया । इसका रहस्य उन्होंने पुजारी जी से समझा। पुजारी ने समझाया कि ईश्वर ने उन्हें एक विशेष निमित्त से भेजा है । यह सुनकर बिरसा ने ईसाई मत त्यागकर पुनः जनजातीय सनातन परंपरा में वापसी की । लौटकर अपने गांव आये और समाज से अपनी परंपराओं पर दृढ़ रहने का अभियान चलाया। उन्होंने आडंबर और भ्रामक प्रचार से दूर रहने, नशा से दूर रहने, बलि प्रथा बंद करने, जनेऊ पहनने और अपने परिश्रम और पुरुषार्थ को जाग्रत करने का अभियान चलाया। वे गांव-गांव जाते प्रवचन करते, लोगों को बुराइयों से दूर रहने और अपनी परंपराओं पर दृढ़ रहने का अभियान चलाया। जिन लोगों ने ईसाई मत अपना लिया था ऐसे लोगों की अपनी परंपराओं में वापसी भी कराई । उनके चेहरे पर अद्भुत ओजस्विता थी। इसी कारण समाज ने उन्हें भगवान के समान आदर देना आरंभ कर दिया ।
जब भगवान बिरसा मुंडा विभिन्न गांवों की यात्रा कर रहे थे तब उन्होंने जनजातीय समाज का शोषण और दमन देखा। उन्होंने यह बंद करने के लिये भी युवकों की टोली बनाई। तथा मांग रखी कि बैगारी बंद होनी चाहिए, उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिए। ठेकेदारों के अत्याचार बंद होने चाहिए। यदि कहीं अत्याचार का समाचार मिला तो बिरसा अथवा उनकी टोली के सदस्य पहुंच जाते। उनकी गतिविधियों से अंग्रेज सरकार भी बौखलाई और चर्च भी। अंत में 1895 में गिरफ्तार कर लिए गए। दो साल कारावास मिला। 1897 में रिहा हुए लौटकर उन्होंने पुनः अपनी गतिविधि तेज की। इस बार उन्होंने संपूर्ण वन क्षेत्र की अलग-अलग टोलियां बनाएं और जनजातीय समाज को उनकी परंपरा में वापसी का अभियान चलाया ऐसी ही एक सभा डोंगरी सिबुआ गांव में चल रही थी। पुलिस ने छापा मारा और सबको बंदी बनाकर ले गए। जब यह समाचार आसपास फैला तो जन समूह ने थाना घेर लिया और जनजातीय बंधुओं ने अपने सभी साथियों को छुड़ा लिया । इस घटना के बाद क्षेत्र में सेना भेजी गई और भगवान बिरसा मुंडा की गिरफ्तारी पर पांच सौ रुपए का इनाम भी घोषित हुआ। अंत में जनवरी 1900 में दोबारा बंदी बनाए गए। रांची जेल लाया गया। भारी प्रताड़ना दी गई अंत में 30 मई 1900 को संसार त्याग कर परम ज्योति में विलीन हो गए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनजाति गौरव दिवस आयोजन की शुरुआत भले वर्ष 2021 से की लेकिन वे अपने प्रथम कार्यकाल से ही जनजातीय समाज के गौरवशाली अतीत को पूरे देश के सामने लाने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों से स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय के रूप में संरक्षित और पुनः स्थापित किया। संग्रहालय का यह भवन पहले जेल थी। इसी जेल में भगवान बिरसा मुंडा कैद रहे थे।यह संग्रहालय लगभग 25 एकड़ में फैला है।केन्द्र और राज्य सरकार की संयुक्त योजना के अंतर्गत इनको अंडमान निकोबार की काला पानी जेल की तरह लाइट और साउंड शो का आयोजन किया जाता है । इसमें भगवान बिरसा का जीवन वृत भी दिखाया जाता है। यह पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। संग्रहालय के बाहरी परिसर में भगवान बिरसा मुंडा के ग्राम उलिहातू का स्वरूप बनाया गया है। संग्रहालय में भगवान बिरसा मुंडा की 25 फीट की मूर्ति भी स्थापित की गई है। इसके साथ ही, संग्रहालय में विभिन्न आंदोलनों से जुड़े अन्य स्वतंत्रता सेनानियों जैसे शहीद बुधू भगत, सिद्धु-कान्हू, नीलांबर-पीतांबर,दिवा-किशुन, तेलंगा खड़िया, गया मुंडा, जात्रा भगत, पोटो एच, भागीरथ मांझी, गंगा नारायण सिंह की नौ फीट की मूर्तियां भी शामिल हैं। इस संग्रहालय का उद्घाटन प्रधानमंत्री ने 15 नवंबर 2021 को पहले जनजाति गौरव दिवस पर किया था।
भारत सोने की चिड़िया रही
आक्रमणकारियों का जनजातीय समाज ने किया सामना
जनजातीय समाज ने पूरे देश में अंग्रेजों से संघर्ष किया
बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों से मुक्ति के लिए दिया जीवन का बलिदान
जनजाति गौरव दिवस आयोजन का उद्देश्य
प्रधानमंत्री जनधन योजना
15 नवंबर की तिथि का चयन
मध्यप्रदेश सरकार करती रही कई कार्यक्रम
जीवन परिचय : भगवान बिरसा मुंडा
भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को झारखंड राज्य के अंतर्गत रांची जिले के उलिहातू ग्राम में हुआ था । उनका जन्म वर्ष कहीं कहीं 1872 भी लिखा है पर सरकारी रिकार्ड में 1875 ही माना गया है। पिता सुगना मुंडा बकरी चराने का काम करते थे। माता करमी हातू महुआ आदि वनोपज बीनकर बदले मे आटा आदि ले आतीं थीं। बिरसा के दो भाई और दो बहने भी थीं । उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके गांव के शिक्षक जयपाल नाग द्वारा हुई।1880 में आगे बढ़ने के लिये साल्गा गांव के ईसाई मिशनरी स्कूल भेजे गए। वहां उनका धर्मातान्तरण हुआ और नाम बिरसा डेविड रख दिया गया । उन दिनों यह पूरा क्षेत्र ईसाई मिशनरी के प्रभाव में था और अधिकांश लोगों का मतान्तरण कर दिया गया था। बिरसा जी बचपन से कुशाग्र बुद्धि और शारीरिक रूप से बलिष्ठ थे। वे प्रतिदिन व्यायाम करते थे। उन्हें अपनी परंपराओं से लगाव था।
पादरी ने बिरसा को स्कूल से निकाल दिया था
बिरसा मुंडा को हुआ दो साल का कारावास
जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय
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