गर्भकाल : मोहन यादव... एक उत्कृष्ट 'मुखिया' की यही पहचान
The Sootr | Sept 09, 2024, 17:16 IST
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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ने 13 दिसंबर 2023 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। 13 सितंबर 2024 को सरकार के कार्यकाल के 9 माह पूरे हो जाएंगे। कैसा रहा सरकार का गर्भकाल, 9 महीने में कितने कदम चली सरकार, 'द सूत्र' लेकर आया है पूरा एनालिसिस... पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार रवि अवस्थी का विशेष आलेख...
रवि अवस्थी@भोपाल
सिंधिया गलत नहीं हैं। वाकई, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ने अपने अल्प शासन काल में जो सफल नवाचार किए, उनमें कई अनुकरणीय कहे जा सकते हैं। इनमें औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने अंचलवार रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव की सफलतम श्रृंखला भी एक है। मौजूदा साल में ही अब तक हुई इस तरह की तीन कॉन्क्लेव के जरिए मध्यप्रदेश की धरती पर करीब दो लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिल चुके हैं। इनमें कई पर काम भी शुरू हो गया है। यह सिलसिला जारी है। वर्षांत तक दो और बड़ी कॉन्क्लेव बुंदेलखंड और विंध्य में आयोजित की जानी हैं।
औद्योगिक निवेश किसी भी राज्य के आर्थिक विकास की रीढ़ माना जाता है। विशेषकर मध्यप्रदेश जैसा कृषि प्रधान राज्य जो देश का हृदय प्रदेश होने से बंदरगाहों जैसे संसाधनों से वंचित है। जहां करारोपण या राज्य के खनिज संसाधनों का दोहन ही इसकी आर्थिक शक्ति का प्रमुख स्त्रोत हो, वहां औद्योगिक निवेश के लिए वर्ष में सिर्फ एक ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट को पर्याप्त नहीं माना जा सकता। वर्ष 2007 के बाद से मध्यप्रदेश में अब तक इस तरह की सात ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट हुईं, लेकिन इनमें मिले 10 फीसद निवेश प्रस्ताव ही यहां की धरा पर उतर सके। सिर्फ आठ माह पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने डॉ.मोहन यादव ने अतीत के इस कटु अनुभव से सबक लिया। उन्होंने प्रदेश के समग्र औद्योगिक विकास के लिए स्थानीय परिस्थिति और अन्य अनुकूलन की अवधारणा पर आंचलिक कॉन्क्लेव की श्रृंखला शुरू की और उनका यह प्रयोग अब तक सफल रहा है।
गर्भकाल …
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मुख्यमंत्री ने पहली कॉन्क्लेव जब उज्जैन में की तो यही माना गया कि अन्य मुख्यमंत्रियों की तरह उनका फोकस भी सिर्फ अपने गृह नगर पर है, लेकिन जबलपुर में दूसरी कॉन्क्लेव का आयोजन कर डॉ.यादव ने आलोचकों की न केवल इस गलतफहमी को दूर किया, बल्कि दोनों ही कॉन्क्लेव में मिले करीब 1.80 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव हासिल कर अपनी कार्यकुशलता को भी साबित किया। इसके लिए उन्होंने उन शहरों में भी समिट की जो विशेष प्रकार के उद्योगों के लिए जाने जाते हैं। देश के नामचीन उद्योगपतियों से मुलाकात कर डॉ.यादव उन्हें प्रदेश में निवेश के लिए राजी करने में भी सफल रहे।
दरअसल, प्रदेश में औद्योगिक निवेश में बाधा का एक बड़ा कारण यहां के तंत्र की जटिलताएं रहीं। जो उद्यमियों को इतना बेजार कर देती थीं कि वह थक हारकर निवेश से ही तौबा कर लेता था। यही वजह है कि बीते दो दशक में प्रदेश को करीब तीस लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव तो मिले लेकिन इनमें से सिर्फ 10 फीसद ही जमीन पर उतर पाए।
इस समस्या से निपटने के लिए तत्कालीन सरकार ने भी सिंगल विंडो जैसे उपाय किए। औद्योगिक नीति में बदलाव हुए, लेकिन अपेक्षित सफलता हासिल नहीं हो सकी। इसे देखते हुए मुख्यमंत्री डॉ.यादव ने मंत्रालय से इतर जिलों में ही फेलिसिएशन सेंटर्स की शुरुआत कर इन्वेस्टर्स पोर्टल भी तैयार कराया। सरकार की इस पारदर्शी कार्यशैली ने उद्यमियों को आकर्षित किया और बात बन गई।
सुशासन की ओर बढ़ते कदम
राष्ट्रद्रोहियों को कड़ा संदेश
महिला, किसान और अंत्योदय पर जोर
अपने अब तक के कार्यकाल में शायद ही कोई ऐसी कैबिनेट बैठक रही हो, जब किसानों के हित में निर्णय न लिए गए हों। प्रदेश में सिंचाई क्षमता बढ़ाने इनसे जुड़े प्रस्तावों को मंजूरी, बिजली व्यवस्था में सुधार जैसे कदम भी डॉ.यादव ने अपने इस अल्प शासनकाल में उठाए। वर्षों से विवादों में उलझी कालीसिंध-पार्वती-चंबल सिंध लिंक परियोजना को सुलझाकर इस मामले में किए गए अंतर्राज्यीय समझौते को उनकी बड़ी सफलता माना गया। प्रदेश में बंद पड़ी विवादित मिल्स के श्रमिकों के हित में लिए गए निर्णय व तेंदूपत्ता संग्राहकों की मजदूरी में एक हजार रुपए का इजाफा, उनकी गरीब कल्याण की सोच का ही परिणाम हैं।
पूर्ववर्ती के काम को आगे बढ़ाया
चुनौतियां कम नहीं
कहते हैं, शीर्ष पर पहुंचने से ज्यादा कठिन इस पर बने रहना होता है। किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री के लिए केंद्र और अपने मंत्रिमंडल सहयोगियों, जनप्रतिनिधियों से सामंजस्य बनाते हुए जनापेक्षाओं पर खरा उतरना किसी चुनौती से कम नहीं होता। ये चुनौतियां मध्यप्रदेश के 19वें मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव के समक्ष भी हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। इस लेख में उनके निजी विचार हैं।)
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