सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ापन: संविधान में परिभाषा अब भी अधूरी

The Sootr | Aug 10, 2026, 14:41 IST
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लार्ड केल्विन के मापन सिद्धांत के हवाले से लेखक सवाल उठाते हैं कि संविधान में सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन को स्पष्ट परिभाषित और नापने योग्य क्यों नहीं बनाया गया। ताकि आरक्षण व्यवस्था वैज्ञानिक आधार पर तय हो सके।

विज्ञान का वह सिद्धांत, जो केल्विन ने दिया

लार्ड केल्विन बहुत बड़े वैज्ञानिक हुए। विज्ञान की एक शाखा है - थर्मोडायनामिक्स। केल्विन ने इस शाखा में बड़ा योगदान दिया, बल्कि इस शाखा की नींव ही रखी। तापमान को नापने की तीन यूनिट्स हैं - फारेनहाइट, सेल्सियस और केल्विन (°F, °C, °K)। तीसरी जो यूनिट है, उसका नाम लार्ड केल्विन के नाम पर ही रखा गया है।



केल्विन ने एक बात कही जो मैंने छात्र जीवन में पढ़ी थी, लेकिन आज तक याद है और वह बात मुझे बहुत पसंद है। केल्विन ने कहा कि यदि आप किसी चीज को नाप नहीं सकते और उसे अंकों में व्यक्त नहीं कर सकते, तो फिर वह चीज विज्ञान की परिधि में नहीं आती।



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कानून में परिभाषा जरूरी क्यों होती है

जब भी कोई कानून बनता है तो बिल्कुल शुरुआत में ही परिभाषाएं दी जाती हैं। कानून में यदि पेड़ लिखा हुआ है तो पेड़ से क्या आशय है, कितना ऊंचा कितना मोटा होगा तब उसे पेड़ माना जाएगा। यदि ये डिफाइन नहीं किया जाए तो धतूरा भी पेड़ है और बरगद भी पेड़ है।



संविधान के अपरिभाषित शब्द: सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन

लेकिन हमारे संविधान में कुछ अपरिभाषित शब्दों का प्रयोग किया गया है। जैसे कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन, जिसके आधार पर आरक्षण दिया गया। इन शब्दों को परिभाषित नहीं किया गया है। आर्थिक पिछड़ापन को नापा जा सकता था, इसलिए वह नहीं रखा गया।



पिछड़ापन सापेक्ष है, पर सीमा तय होनी चाहिए

वैसे तो हर व्यक्ति किसी न किसी से पिछड़ा हुआ है। बीए वाला एमए वाले से पिछड़ा हुआ है। M.A वाला डबल एमए वाले से, डबल M.A वाला PhD वाले से।



समाज में भी एक ही जाति में अनेक उपजातियां हैं जो अपने आपको एक-दूसरे से श्रेष्ठ मानती हैं। देश, काल और परिस्थिति के हिसाब से कहीं कोई पिछड़ा है तो दूसरी जगह वही अगड़ा है।



एक निजी अनुभव, जो आज भी याद है

मुझे याद है, मैं उस समय 25 साल का था। मेरे पिताजी नहीं थे। एक पंडित जी के कहने पर मैं अपनी छोटी बहन की शादी की बात करने एक जगह गया था।



उस परिवार के मुखिया ने गेट पर ही मेरा परिचय पूछा। कहा कि बच्चे हो इसलिए माफ कर देता हूं। सनाढ्य ब्राह्मण होकर तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कान्यकुब्जों के यहां रिश्ता मांगने की।



पिछड़ेपन को नापने का पैमाना क्यों जरूरी

तो आप स्पष्ट बताइए कि इस सीमा तक शिक्षा रहेगी तो हम उसे शैक्षणिक पिछड़ापन (Reservation) मानेंगे। ऐसा इसलिए ताकि समय-समय पर उस पिछड़ेपन को नापा जा सके और उस सीमा से बाहर निकलते ही उसे पिछड़ेपन के टैग से मुक्त किया जा सके। इसी तरह सामाजिक पिछड़ेपन की भी नापने योग्य अभिव्यक्ति हो।



आज विज्ञान इतना विकसित हो चुका है कि दया, ममता, क्रोध जैसी अमूर्त-अदृश्य भावनाएं भी नापी जाने लगी हैं। इन्हें नापने की भी विधियां खोजी जा चुकी हैं और उनका शोध कार्यों में उपयोग किया जा रहा है। फिर सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ापन को नापने में क्या दिक्कत है। भेदभाव, असमानता - इन सबको परिभाषित कीजिए और इनको नापने का वैज्ञानिक पैमाना बनाइए।



आंकड़ों का खेल: एक ही सच, दो कहानियां

चार करोड़ छात्रों में एक साल में केवल 200 शिकायतें हुईं और अगले साल 300 हो गईं। भगवान की कृपा से गणित हमने भी पढ़ी है, हम भी दोनों तरीके से कहना जानते हैं।



हम यह भी कह सकते हैं कि केवल 0.00075% छात्रों ने शिकायत की है, जो कि नगण्य है, अब भेदभाव नहीं बचा। हम यह भी कह सकते हैं कि शिकायतों में 150% की वृद्धि हुई है, भेदभाव चरम पर है।



वॉकर कब छूटेगा?

ऐसा न हो कि पिछड़ापन कभी का दूर हो चुका हो, फिर भी टैग लगा हुआ है। पैरों में तकलीफ थी तब वॉकर दिया गया था। अब पैर ठीक हुए वर्षों गुजर गए, पैर खूब हृष्ट-पुष्ट मस्त हो चुके हैं पर वॉकर नहीं छूट रहा है।



वैज्ञानिक पैमाना ही समाधान

सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन की विज्ञान-सम्मत सुस्पष्ट परिभाषा तय होनी चाहिए और उसे नापने का एक सुस्पष्ट पैमाना होना चाहिए।


एक सामान्य शिक्षित व्यक्ति भी उस पैमाने पर नापकर बता सके कि अमुक व्यक्ति पिछड़े में आता है कि नहीं, और यदि वह उस पैमाने में नहीं आ रहा है तो फिर उसे आरक्षण से अलग किया जाए। विचार मंथनकर्मचारी नेता सुधीर नायक



( नोट: लेखक सुधीर नायक, मप्र के कर्मचारी नेता एवं लेखक हैं। लेख में प्रकाशित विचार उनके व्यक्तिगत हैं)



FAQ

  1. लेखक ने लार्ड केल्विन के सिद्धांत का हवाला क्यों दिया है?
    केल्विन का मानना था कि जिस चीज को नापा या अंकों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। वह विज्ञान की परिधि में नहीं आती। लेखक इसी सिद्धांत के आधार पर तर्क देते हैं कि सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ापन भी नापने योग्य होना चाहिए।
  2. संविधान में आरक्षण को लेकर किन शब्दों को अपरिभाषित बताया गया है?
    लेख के मुताबिक, "सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन" शब्दों को संविधान में स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया, जबकि आर्थिक पिछड़ापन नापे जाने योग्य होने के कारण अलग रखा गया।
  3. लेखक किस तरह के मापदंड की मांग कर रहे हैं?
    लेखक चाहते हैं कि सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन की वैज्ञानिक, नापने योग्य परिभाषा बने ताकि कोई भी व्यक्ति स्पष्ट रूप से जान सके कि वह इस श्रेणी में आता है या नहीं।

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