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BHOPAL. क्रिकेट के मैदानों में चौकों-छक्कों की बरसात चल रही है। जमीन पर मावठा मेहरबान है। वहीं मध्यप्रदेश की सियासी और अफसरशाही की पिच पर हर खिलाड़ी अपनी-अपनी स्टाइल में खेल रहा है। हर कोई अपनी पारी लंबी करने की जुगत में है।
कोयलांचल वाले जिले के कप्तान साहब की बल्लेबाजी इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा में है। उनकी पारी इतनी तेज है कि इसकी खबर सीधे थर्ड अंपायर यानी पीएचक्यू तक पहुंच चुकी है। अब आगे नो बॉल होगी, फ्री हिट मिलेगा या विकेट गिरेगा, इस पर सबकी नजर है।
उधर, दाढ़ी वाले साहब बैठकों में धुआंधार कमेंट्री कर रहे हैं। किसी भी खिलाड़ी को सीधे सवालों के बाउंसर फेंक देते हैं। दिलचस्प यह है कि उनके कैप्टन भी पूरा सपोर्ट करते हैं।
इसी तरह सियासी पिच पर एक बड़ा बदलाव भी हुआ है। पंडित जी अब प्लेइंग इलेवन से बाहर हो गए हैं। यह स्ट्रैटेजिक रेस्ट है या टीम कॉम्बिनेशन का खेल, इस पर सियासी कमेंटेटर अपने-अपने हिसाब से विश्लेषण कर रहे हैं। बाकी टूर्नामेंट लंबा है। मैच भी बचे हैं और खिलाड़ी भी।
खैर, देश-प्रदेश में तो कई मसले चल रहे हैं। आप तो सीधे नीचे उतर आईए और वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम Bol Hari Bol के रोचक किस्सों का आनंद लीजिए।
क्या राजनीति में जाएंगे साहब!
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बड़वानी के लोगों ने हाल ही में एक ऐसा जुलूस देखा है, जिसने थोड़ी देर के लिए उन्हें कन्फ्यूज कर दिया। कई लोगों को लगा कि कोई बड़ा नेता चुनाव जीत गया है। किसी को लगा कि कोई नया नेता लॉन्च हो रहा है। बाद में सामने आया कि मामला कुछ और ही था।
दरअसल, यह आयोजन एसपी रहे जगदीश डावर की विदाई का था। शहर में बैनर और पोस्टर लगाए गए। स्वागत के इंतजाम भी तगड़े थे। डावर साहब खुली जीप में सवार थे। स्टाइल बिल्कुल वैसी थी, जैसी आम तौर पर चुनावी रोड शो में दिखाई देती है। लोग सड़क किनारे खड़े होकर हाथ हिला रहे थे और एसपी साहब अभिवादन स्वीकार कर रहे थे।
जुलूस के आगे डीजे बज रहा था। लोग नाचते-गाते साथ चल रहे थे। यह नजारा जिसने भी देखा, उसे लगा कि यह सामान्य विदाई कार्यक्रम से थोड़ा ज्यादा है। अब चर्चा है कि यह सिर्फ विदाई नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन था। डावर साहब का परिवार राजनीति से जुड़ा है। डावर साहब खुद भी बड़वानी जिले के रहने वाले हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि रिटायरमेंट के बाद उनका अगला कदम राजनीति की तरफ हो सकता है।
मामा का एक और मैजिक मॉडल
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सूबे की सियासत में अगर किसी नेता की स्टाइल अलग पहचान रखती है तो उसमें मामा का नाम सबसे ऊपर आता है। मंच हो, सभा हो या सरकारी कार्यक्रम मामा का अंदाज हमेशा हटकर रहता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र के बच्चों के लिए बड़ा ऐलान कर दिया।
मंच से मुस्कुराते हुए मामा ने कहा कि उनके क्षेत्र विदिशा-रायसेन के जो बच्चे 10वीं और 12वीं में शानदार नंबर लाएंगे, उन्हें प्रेम-सुंदर सम्मान दिया जाएगा। यानी पढ़ाई में अच्छा करो और मामा से सम्मान पाओ। यह योजना इसी साल के बोर्ड रिजल्ट से लागू होगी।
अब राजनीतिक गलियारों में इस घोषणा की अलग-अलग तरह से चर्चा हो रही है। समर्थक कह रहे हैं कि मामा हमेशा बच्चों और युवाओं के लिए कुछ नया सोचते हैं। दूसरी तरफ विरोधी खेमे में कानाफूसी तेज हो गई है।
कुछ लोग तंज कसते हुए कह रहे हैं कि मामा अपने संसदीय क्षेत्र में इतना एक्टिव रहते हैं कि लगता है मानो वहां अलग ही प्रशासनिक मॉडल चल रहा हो। फिलहाल इतना तय है कि मामा अपने अंदाज से सुर्खियां बटोरना जानते हैं। कभी योजनाओं से, कभी भाषणों से और कभी अचानक किए गए ऐलानों से।
कलेक्टर साहब का व्यवहार...हाय राम?
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महाराष्ट्र बॉर्डर से लगे एक जिले के कलेक्टर साहब इन दिनों अपने काम से ज्यादा अपने व्यवहार को लेकर चर्चा में हैं। अंदरखाने बात चल रही है कि साहब मीटिंग और दफ्तर में अधीनस्थ कर्मचारियों से बेहद सख्त और कई बार मर्यादा से बाहर भाषा में बात करते हैं।
पिछले दिनों तो एक अधिकारी दफ्तर से आंसू पोंछते हुए बाहर निकला था। अब एक और मामला सामने आया है। कलेक्टर साहब एक लिपिक पर भड़क पड़े। उसे अपशब्द तक कह डाले। बोले, "ह**मी... शिकायतें पेंडिंग हैं, कुछ नहीं करता, ऊपर बैठा रहता है, कोई काम नहीं है। इसे नीचे लाकर बैठाओ।"
इसके बाद अपने स्टेनों पर भी असभ्य तरीके से भड़के। जब कलेक्टर यह डायलॉग डिलेवरी कर रहे थे, तब वहां कुछ मीडियाकर्मी भी थे। साहब की शिकायतें अब ऊपर तक पहुंच चुकी हैं। अब देखना यह है कि यह चर्चा फाइलों तक सीमित रहती है या आगे कोई औपचारिक कार्रवाई का रास्ता बनता है।
कोयलांचल के करोड़ीमल कप्तान!
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कोयला दिखने में भला काला होता है, लेकिन हर कोई इसके रंग का कायल होता है। अब देखिए न, मध्यप्रदेश में भी खूब कोयला होता है। ऐसे ही कोयला पैदा करने वाले एक जिले के पुलिस कप्तान साहब इन दिनों चर्चाओं में हैं। वैसे तो यह जिला बैठे बिठाए चंद अफसरों को गांधी जी के दर्शन कराता ही है, लेकिन कप्तान साहब 'करोड़ीमल' बन गए हैं। जी हां, सही पढ़ा है आपने 'करोड़ीमल'।
दरअसल, कप्तान साहब ने जिले के सात थानों की बंदी बांध दी है। इन थानेदारों की जिम्मेदारी है कि हर महीने एक खोका साहब तक पहुंचाया जाए, बस फिर क्या है...कप्तान साहब कहें और थानेदार काम न करें, ऐसा हो सकता है क्या भला? खूब माल पीटा जा रहा है।
कोयले की दलाली के सबके हाथ काले हो रहे हैं। साहब के इस कांड की भनक पीएचक्यू तक पहुंच गई है। दिलचस्प यह है कि कुछ बड़े अफसरों को इसकी पूरी जानकारी है, लेकिन उनकी मेहरबानी बरकरार है?
दाढ़ी वाले बाबा का खौफ...
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अफसरशाही में फिलवक्त दाढ़ी वाले बाबा का नाम खूब चर्चित है। अफसरों में बड़े साहब का जितना डर है, उससे कहीं ज्यादा घबराहट बाबा की मौजूदगी से होने लगी है। बैठकों में बाबा का अंदाज अलग ही रहता है। वे सीधे मुद्दे पर आते हैं और कई बार किसी भी अफसर की जमकर क्लास लगा देते हैं।
ऐसे मौकों पर बड़े साहब रोकने या माहौल हल्का करने की जगह बाबा का समर्थन करते दिखते हैं। इससे सिस्टम में साफ मैसेज जा रहा है कि बाबा की बात को हल्के में लेने की गुंजाइश नहीं है।
इसी वजह से अब अफसरों के बीच बाबा का खौफ बढ़ता जा रहा है। अंदरखाने यह भी चर्चा है कि कई अफसर बैठकों से पहले ही होमवर्क करके पहुंचते हैं, ताकि कहीं बाबा के निशाने पर न आ जाएं।
मजेदार किस्सा यह भी चल रहा है कि अफसर आपस में आधे मजाक और आधे डर में यही कामना कर रहे हैं कि बाबा कुछ समय आध्यात्मिक साधना या विपश्यना कैंप चले जाएं, ताकि सिस्टम में थोड़ी राहत मिल सके।
तुम रूठे और हम छूठे!
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सिस्टम में इन दिनों नई गॉशिप चल रही है कि दिल्ली वाला रास्ता अब सेफ ऑप्शन बन गया है। इसके पीछे वजह IG पद के इम्पैनलमेंट को लेकर आया नया नियम है। इस नए नियम में एसपी और डीआईजी रैंक के अफसरों के लिए कम से कम दो साल का केंद्र डेपुटेशन जरूरी कर दिया गया है।
अंदरखाने कई अफसर इसे अपने लिए सेफ्टी वॉल्व मान रहे हैं। बात चल रही है कि यदि कभी राज्य सरकार से रिश्ते बिगड़ गए या मनमुताबिक पोस्टिंग नहीं मिली तो अफसर सीधे दिल्ली की ट्रेन पकड़ लेंगे। मतलब साफ है कि अब लूप लाइन में बैठकर सालों तक इंतजार करने का डर पहले जैसा नहीं रहा है।
यह भी कहा जा रहा है कि कुछ अफसर पहले ही अपने दिल्ली कनेक्शन मजबूत करने में जुट गए हैं, क्योंकि यदि राज्य नाराज हुआ तो दिल्ली दूर नहीं है। अब यह नया सिस्टम राज्य और अफसरों के रिश्तों को कितना बदलता है, यह आने वाले समय में साफ होगा। फिलहाल तो खाकी के कॉरिडोर में यही लाइन सबसे ज्यादा घूम रही है कि तुम रूठे और हम छूटे।
पंडित जी की ‘घर वापसी’
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लंबे समय तक सत्तारूढ़ खेमे का मैनेजमेंट संभालने के बाद आखिरकार पंडित जी की संघ में वापसी हो गई है। भोपाल में मजबूत पकड़ बनाने वाले पंडित जी को अब जबलपुर की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह फैसला अचानक नहीं, बल्कि लंबे मंथन के बाद लिया गया है। कुछ समय से इस पर लगातार बातचीत चल रही थी।
अब पंडित जी को इंदौर मुख्यालय बुलाकर औपचारिक रूप से नई जिम्मेदारी की जानकारी दी गई। वहां संगठन के बड़े नेताओं के साथ उनकी लंबी बैठक हुई, जिसके बाद तस्वीर साफ हो गई। अब राजनीतिक हलकों में इसे बड़े संगठनात्मक संतुलन के तौर पर देखा जा रहा है।
भोपाल से जबलपुर शिफ्ट होने को कुछ लोग नई रणनीति बता रहे हैं तो कुछ इसे बड़े फेरबदल की शुरुआत मान रहे हैं। फिलहाल नए मुखिया का ऐलान नहीं किया गया है। माना जा रहा है कि वरिष्ठ प्रचारक को नई जिम्मेदारी मिलेगी।
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