बोल हरि बोल: बीजेपी में खलबली, कलेक्टर और कप्तान की कुर्सी जाते-जाते बची और वो पटवारी साहब!
Harish Divekar | Jul 12, 2026, 14:00 IST
बोल हरि बोल
वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम बोल हरि बोल के जरिए जानिए मध्य प्रदेश की सियासत, अधिकारियों पर गिरी गाज और कांग्रेस-बीजेपी के भीतर चल रही अंदरूनी हलचल का पूरा सच...
BHOPAL. सियासत में खबरें अपनी जगह होती हैं और चर्चाएं अपनी जगह। कई बार जो अखबार की हेडिंग नहीं बन पाता, वही सत्ता के गलियारों में सबसे ज्यादा बोला और सुना जाता है। इस हफ्ते भी कुछ ऐसे ही किस्से चर्चा में रहे हैं। कहीं दो अफसरों की कुर्सी बाल-बाल बची है तो कहीं किसी नेता का कद तौला गया। बयानों ने भी खूब बहस छेड़ी है।
...तो जनाब देश-प्रदेश में खबरें तो बहुत हैं, पर आप तो सीधे नीचे उतर आइए और वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम Bol Hari Bol के रोचक किस्सों का आनंद लीजिए।
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बीजेपी में नई कोपलें फूटने का दौर लगातार जारी है। इसी के साथ पार्टी उन वटवृक्षों की टहनियां भी लगातार छांट रही है, जो अपने साए में नए पौधों को पनपने नहीं देते। बीजेपी के इस अभियान से वरिष्ठ और गरिष्ठ हो चुके नेताओं के ग्रहनक्षत्र बिगड़ गए हैं। नरोत्तम मिश्रा इसका ताजा उदाहरण हैं। बीजेपी के इस अभियान की सही तस्वीर 2028 के चुनाव में देखने मिलेगी, जब सभी वरिष्ठ और गरिष्ठ नेताओं को संरक्षक मंडल में रखकर युवा पीढ़ी को आगे लाया जाएगा।
माना जा रहा है कि 2028 के चुनाव में 55 बसंत देख चुके नेताओं को टिकट अव्वल तो मिलेगा ही नहीं और यदि मिला भी तो जीत की गारंटी देनी होगी। फिर वो चाहे कितना ही दिग्गज और क्षेत्र का प्रभावशाली नेता ही क्यों न हो। इतना ही नहीं, जो नेता अपने बच्चों को टिकट दिलाने का सपना देख रहे हैं, उनमें से कई नेताओं को निराशा ही हाथ लगने वाली है। दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद सीनियर नेताओं में बेचैनी दिखाई देने लगी है।
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खंडवा कलेक्टर-एसपी की कुर्सी बाल-बाल बच गई है, लेकिन प्रोटोकॉल में लापरवाही बरतने पर दोनों को डांट भरपूर मिली है। दोनों अफसरों के माफी मांगने के बाद उन पर कोई एक्शन नहीं लिया गया है। दरअसल, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार परिवार के साथ ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने गए थे। उनके साथ रिश्तेदार ईओडब्ल्यू डीजी उपेन्द्र जैन भी थे।
दोनों के दौरे की जानकारी कलेक्टर-एसपी को होने के बाद भी वे प्रोटोकॉल में नहीं पहुंचे। इस पर उपेन्द्र जैन ने खासी नाराजगी जताई। भनक लगते ही कलेक्टर-एसपी दौड़ते हुए पहुंचे और लापरवाही के लिए माफी मांगी। मुख्य चुनाव आयुक्त ने दोनों को माफ करते हुए मामला खत्म कर दिया। यदि यह शिकायत मुख्यमंत्री तक पहुंचती तो मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रोटोकॉल में लापरवाही करने के मामले में दोनों का हटना तय था।
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प्रदेश की दो हॉट सीट काफी चर्चा में हैं। दरअसल, सुपर हॉट सीट पर बैठे बड़े साहब का कार्यकाल अगस्त में पूरा हो रहा है। वहीं, पीएचक्यू में सेकंड हॉट सीट बन चुकी खुफियागिरी वाले साहब भी अगस्त में रिटायर हो रहे हैं। वैसे यह खाकी वाली सीट पहले ज्यादा चर्चा में नहीं रहती थी, लेकिन इस सरकार में खाकी वाले मुखिया से ज्यादा खुफिया वाले साहब की सीट पावरफुल है। यही वजह है कि बड़े साहब के साथ खुफिया वाले साहब की सीट पर कौन बैठेगा, इसकी चर्चा प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हो रही है। हर कोई अपने हिसाब से पतंग उड़ाने में लगा हुआ है।
बड़े साहब वाली कुर्सी का फैसला तो दिल्ली की सहमति से होगा, लेकिन खुफियागिरी वाली सीट का फैसला तो मुख्यमंत्री को ही लेना है, तो अभी से नफे-नुकसान के आकलन के साथ योग्य वर की तेजी से तलाश जारी है। वहीं, बड़े साहब को एक्सटेंशन मिलता है या फिर दिल्ली-भोपाल में से किसी की लॉटरी खुलेगी, यह तो 31 अगस्त को ही पता चलेगा।
कमलनाथ के बाद प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर आए जीतू पटवारी लगातार अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं के निशाने पर रहे हैं। उन पर सबसे कमजोर प्रदेश अध्यक्ष होने का भी आरोप लगाया गया। यह भी माना जाने लगा कि पटवारी को हटा दिया जाएगा, लेकिन इसी बीच सरकार की ओर से पटवारी के खिलाफ लगातार एक्शन लेने से पटवारी के नंबर पार्टी हाईकमान की नजरों में बढ़ गए हैं।
एक तरह से देखा जाए तो सरकार की सख्ती से पटवारी को अध्यक्ष पद के लिए अभयदान मिल गया है। इससे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बेचैन हैं। जो नेता जीतू पटवारी के हटने का इंतजार कर रहे थे, उनकी प्लानिंग पर पानी फिर गया है। इधर, पटवारी भी समझ चुके हैं कि एक मौका और मिला है। सही से डटे रहे तो चुनाव उनके नेतृत्व में हो सकता है। आगे की बातें भविष्य के गर्त में हैं कि वो खुद चुनाव जीत पाएंगे या नहीं।
अपना मध्यप्रदेश हाल के वक्त में किसी न किसी कारण से पूरे देश में चर्चाओं में बना हुआ है। कभी पक्ष तो कभी विपक्ष की तरफ से बल्लेबाजी हो रही है। अब देखिए ना, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी मैदान में उतर गए। उन्होंने चावल घोटाले पर सरकार को आड़े हाथों लिया। खरगे ने कहा, "मध्यप्रदेश आज भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार और लूट का केंद्र और भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुका है। एक घोटाला खत्म नहीं होता, दूसरा सामने आ जाता है।
अब एथेनॉल के नाम पर 1200 करोड़ रुपए का चावल घोटाला सामने आया है। जिस चावल को कुपोषित बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किशोरियों के पोषण के लिए इस्तेमाल होना था, उसी चावल को मुनाफे के खेल में घुमाया गया। 5 लाख मीट्रिक टन चावल, राइस मिलरों, एथेनॉल माफिया और भाजपा सरकार के संरक्षण में भ्रष्टाचार के इस खेल का हिस्सा बना दिया गया। भाजपा और सरकारी तंत्र की मिलीभगत से जनता के हक के अनाज पर डाका डाला जा रहा है।"
इसके पहले जमीनों के मामले में बड़ा घोटाला सामने आया। उज्जैन में उन्हीं इलाकों में जमीनों का विस्तार हुआ, जहां सरकारी प्रोजेक्ट और हाईवे प्रस्तावित हैं। यह कोई पहला मामला नहीं है। बीते एक महीने से मध्यप्रदेश लगातार पूरे देश में चर्चित है।
क्या मध्यप्रदेश की राजनीति में मामा का पहले जैसा असर नहीं रहा? यह सवाल इन दिनों सत्ता के गलियारों में तैर रहा है। इसकी वजह एक वायरल वीडियो है, जिसमें मामा और महाराज साथ नजर आ रहे हैं। वीडियो में कार्यकर्ताओं का पूरा ध्यान महाराज के स्वागत पर दिख रहा है। फूल-मालाएं, अभिनंदन और उत्साह सब उनकी ओर है। वहीं, ठीक बगल में चल रहे मामा अपेक्षाकृत शांत नजर आ रहे हैं। बस फिर क्या था, वीडियो सोशल मीडिया पर पहुंचा और उसके साथ राजनीतिक व्याख्याओं का दौर भी शुरू हो गया।
मामा के समर्थक इसे सामान्य घटना मानने को तैयार नहीं हैं। वहीं, विरोधी चुटकी लेने का मौका कैसे छोड़ते। कानाफूसी शुरू हो गई कि दिल्ली से बार-बार भोपाल आने का असर अब पहले जैसा नहीं रहा। कुछ लोगों ने तंज कसते हुए कहा कि बार-बार आएंगे तो चरचराटा बना रहेगा, फिर लोग इसे सामान्य मानने लगेंगे।
हालांकि, एक वीडियो से किसी नेता की राजनीतिक ताकत का आकलन नहीं किया जा सकता, लेकिन सत्ता की राजनीति में तस्वीरें और प्रतीक भी अपने संदेश छोड़ जाते हैं। इसलिए इस वीडियो की चर्चा स्वागत से ज्यादा उस सवाल पर हो रही है कि क्या मामा का राजनीतिक इकबाल पहले जैसा ही है या सत्ता के समीकरण बदलने के साथ तस्वीरें भी बदलने लगी हैं?
मैडम पर किसका वरदहस्त, सैंयां जी कैसे बचे, पंडित जी का डायलॉग!
जब खाकी वाले साहब इंदौरी, मैडम फाइल वूमेन और उपमुख्यमंत्री पोस्टमैन बनें…
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बोल हरि बोल: सत्ता के गलियारों में रौब, रोष और रील का रियलिटी शो!
...तो जनाब देश-प्रदेश में खबरें तो बहुत हैं, पर आप तो सीधे नीचे उतर आइए और वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम Bol Hari Bol के रोचक किस्सों का आनंद लीजिए।
अहं और वहम दूर करती बीजेपी
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बीजेपी में नई कोपलें फूटने का दौर लगातार जारी है। इसी के साथ पार्टी उन वटवृक्षों की टहनियां भी लगातार छांट रही है, जो अपने साए में नए पौधों को पनपने नहीं देते। बीजेपी के इस अभियान से वरिष्ठ और गरिष्ठ हो चुके नेताओं के ग्रहनक्षत्र बिगड़ गए हैं। नरोत्तम मिश्रा इसका ताजा उदाहरण हैं। बीजेपी के इस अभियान की सही तस्वीर 2028 के चुनाव में देखने मिलेगी, जब सभी वरिष्ठ और गरिष्ठ नेताओं को संरक्षक मंडल में रखकर युवा पीढ़ी को आगे लाया जाएगा।
माना जा रहा है कि 2028 के चुनाव में 55 बसंत देख चुके नेताओं को टिकट अव्वल तो मिलेगा ही नहीं और यदि मिला भी तो जीत की गारंटी देनी होगी। फिर वो चाहे कितना ही दिग्गज और क्षेत्र का प्रभावशाली नेता ही क्यों न हो। इतना ही नहीं, जो नेता अपने बच्चों को टिकट दिलाने का सपना देख रहे हैं, उनमें से कई नेताओं को निराशा ही हाथ लगने वाली है। दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद सीनियर नेताओं में बेचैनी दिखाई देने लगी है।
बच गए कलेक्टर और एसपी साहब!
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खंडवा कलेक्टर-एसपी की कुर्सी बाल-बाल बच गई है, लेकिन प्रोटोकॉल में लापरवाही बरतने पर दोनों को डांट भरपूर मिली है। दोनों अफसरों के माफी मांगने के बाद उन पर कोई एक्शन नहीं लिया गया है। दरअसल, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार परिवार के साथ ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने गए थे। उनके साथ रिश्तेदार ईओडब्ल्यू डीजी उपेन्द्र जैन भी थे।
दोनों के दौरे की जानकारी कलेक्टर-एसपी को होने के बाद भी वे प्रोटोकॉल में नहीं पहुंचे। इस पर उपेन्द्र जैन ने खासी नाराजगी जताई। भनक लगते ही कलेक्टर-एसपी दौड़ते हुए पहुंचे और लापरवाही के लिए माफी मांगी। मुख्य चुनाव आयुक्त ने दोनों को माफ करते हुए मामला खत्म कर दिया। यदि यह शिकायत मुख्यमंत्री तक पहुंचती तो मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रोटोकॉल में लापरवाही करने के मामले में दोनों का हटना तय था।
दो हॉट सीट चर्चा में
1021f0ba-d29
प्रदेश की दो हॉट सीट काफी चर्चा में हैं। दरअसल, सुपर हॉट सीट पर बैठे बड़े साहब का कार्यकाल अगस्त में पूरा हो रहा है। वहीं, पीएचक्यू में सेकंड हॉट सीट बन चुकी खुफियागिरी वाले साहब भी अगस्त में रिटायर हो रहे हैं। वैसे यह खाकी वाली सीट पहले ज्यादा चर्चा में नहीं रहती थी, लेकिन इस सरकार में खाकी वाले मुखिया से ज्यादा खुफिया वाले साहब की सीट पावरफुल है। यही वजह है कि बड़े साहब के साथ खुफिया वाले साहब की सीट पर कौन बैठेगा, इसकी चर्चा प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हो रही है। हर कोई अपने हिसाब से पतंग उड़ाने में लगा हुआ है।
बड़े साहब वाली कुर्सी का फैसला तो दिल्ली की सहमति से होगा, लेकिन खुफियागिरी वाली सीट का फैसला तो मुख्यमंत्री को ही लेना है, तो अभी से नफे-नुकसान के आकलन के साथ योग्य वर की तेजी से तलाश जारी है। वहीं, बड़े साहब को एक्सटेंशन मिलता है या फिर दिल्ली-भोपाल में से किसी की लॉटरी खुलेगी, यह तो 31 अगस्त को ही पता चलेगा।
पटवारी के नंबर बढ़ गए
एक तरह से देखा जाए तो सरकार की सख्ती से पटवारी को अध्यक्ष पद के लिए अभयदान मिल गया है। इससे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बेचैन हैं। जो नेता जीतू पटवारी के हटने का इंतजार कर रहे थे, उनकी प्लानिंग पर पानी फिर गया है। इधर, पटवारी भी समझ चुके हैं कि एक मौका और मिला है। सही से डटे रहे तो चुनाव उनके नेतृत्व में हो सकता है। आगे की बातें भविष्य के गर्त में हैं कि वो खुद चुनाव जीत पाएंगे या नहीं।
सुर्खियों में आया मध्यप्रदेश!
अब एथेनॉल के नाम पर 1200 करोड़ रुपए का चावल घोटाला सामने आया है। जिस चावल को कुपोषित बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किशोरियों के पोषण के लिए इस्तेमाल होना था, उसी चावल को मुनाफे के खेल में घुमाया गया। 5 लाख मीट्रिक टन चावल, राइस मिलरों, एथेनॉल माफिया और भाजपा सरकार के संरक्षण में भ्रष्टाचार के इस खेल का हिस्सा बना दिया गया। भाजपा और सरकारी तंत्र की मिलीभगत से जनता के हक के अनाज पर डाका डाला जा रहा है।"
इसके पहले जमीनों के मामले में बड़ा घोटाला सामने आया। उज्जैन में उन्हीं इलाकों में जमीनों का विस्तार हुआ, जहां सरकारी प्रोजेक्ट और हाईवे प्रस्तावित हैं। यह कोई पहला मामला नहीं है। बीते एक महीने से मध्यप्रदेश लगातार पूरे देश में चर्चित है।
मामा का इकबाल कम हो गया क्या?
मामा के समर्थक इसे सामान्य घटना मानने को तैयार नहीं हैं। वहीं, विरोधी चुटकी लेने का मौका कैसे छोड़ते। कानाफूसी शुरू हो गई कि दिल्ली से बार-बार भोपाल आने का असर अब पहले जैसा नहीं रहा। कुछ लोगों ने तंज कसते हुए कहा कि बार-बार आएंगे तो चरचराटा बना रहेगा, फिर लोग इसे सामान्य मानने लगेंगे।
हालांकि, एक वीडियो से किसी नेता की राजनीतिक ताकत का आकलन नहीं किया जा सकता, लेकिन सत्ता की राजनीति में तस्वीरें और प्रतीक भी अपने संदेश छोड़ जाते हैं। इसलिए इस वीडियो की चर्चा स्वागत से ज्यादा उस सवाल पर हो रही है कि क्या मामा का राजनीतिक इकबाल पहले जैसा ही है या सत्ता के समीकरण बदलने के साथ तस्वीरें भी बदलने लगी हैं?
द सूत्र पर पढ़िए बोल हरि बोल के अन्य कॉलम...
जब खाकी वाले साहब इंदौरी, मैडम फाइल वूमेन और उपमुख्यमंत्री पोस्टमैन बनें…
साहब और सिंघल की जोड़ी हिट, इधर मैडम को चाहिए चमाट मार असिस्टेंट!
बोल हरि बोल: सत्ता के गलियारों में रौब, रोष और रील का रियलिटी शो!
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