बोल हरि बोल: चड्डी-बेल्ट की चर्चा जोरों पर, साहब के बदले तेवर और माननीया का नाम किसने उछाला?
Harish Divekar | Jun 28, 2026, 12:51 IST
पत्रकार हरीश दिवेकर का लोकप्रिय कॉलम बोल हरि बोल
मध्य प्रदेश की सियासत में चड्डी-बेल्ट की चर्चा जोरों पर है। मंत्री के बयान से लेकर मुख्य सचिव के बदले तेवर और रीति पाठक के मंत्री पद की अफवाहों का पूरा सच, वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के कॉलम बोल हरि बोल में पढ़िए ये सब कुछ...
BHOPAL. सियासत और सिस्टम में जो दिखता है, वह पूरी कहानी नहीं होती। असली हलचल सत्ता के गलियारों, बंद कमरों और राजनीतिक कानाफूसियों में छिपी होती है। पेश है, इस हफ्ते की चर्चित राजनीतिक गपशप। दूसरी खबरों को छोड़िए और आप तो सीधे नीचे उतर आईए और वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम Bol Hari Bol के रोचक किस्सों का आनंद लीजिए।
बीजेपी में नया फॉर्मूला चलता है कि जिस नेता का नाम किसी बड़े पद के लिए सबसे ज्यादा उछलने लगे, समझ लीजिए उसकी राह सबसे मुश्किल हो गई। मंत्री बनने की चर्चा जितनी तेज, संभावना उतनी कमजोर।
अब ताजा किस्सा विंध्य की विधायक रीति पाठक का है। समर्थकों का उत्साह ऐसा कि सोशल मीडिया पर उन्हें मंत्री बनते हुए लगभग घोषित ही कर दिया गया। बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया, पोस्टर बनने लगे और राजनीतिक गणित भी बैठाया जाने लगा। जैसे-जैसे अफवाहों का गुब्बारा बड़ा होता गया, आखिरकार विधायक महोदया को खुद मैदान में उतरना पड़ा। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि मंत्री पद को लेकर जो खबरें चल रही हैं, वे पूरी तरह भ्रामक हैं। अफवाह फैलाने वालों से उनका कोई लेना-देना नहीं है।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए, लेकिन उसका इस्तेमाल अफवाह फैलाने के लिए नहीं होना चाहिए। साथ ही यह संदेश भी दे दिया कि वे पार्टी की समर्पित कार्यकर्ता हैं और संगठन जो जिम्मेदारी देगा, वही उनका कर्तव्य होगा। अब राजनीतिक गलियारों में इस पोस्ट के भी अपने-अपने मायने निकाले जा रहे हैं। कोई इसे अफवाहों पर विराम मान रहा है, तो कोई कह रहा है कि मैडम का नाम पहले ही मंत्री पद की सूची से कट जाए, इसलिए विरोधियों ने साजिश रची है।
राजनीति में चर्चा में बने रहने के अपने-अपने तरीके हैं। कोई भाषण देता है, कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है और आजकल तो वीडियोबाजी भी खूब चलन में है। कैमरा ऑन हुआ नहीं कि नेता जी भी एक्शन मोड में आ जाते हैं। अब देखिए, देशभर के लाखों भांजे-भांजियों के मामा शिवराज सिंह चौहान उत्तर प्रदेश के खेतों में पहुंच गए। मौका था धान की रोपाई का। मामा ने खुद खेत में उतरकर भांजियों के साथ धान लगाया और किसानों को हरित खाद के फायदे भी समझाए।
उधर, भोपाल में मंत्री विश्वास सारंग ने भी जनता के बीच अपना अलग अंदाज दिखाया। वे अपने विधानसभा क्षेत्र में मीसाबंदी रहे बुजुर्ग का हालचाल पूछने पहुंचे थे। मुलाकात खत्म हुई तो कुछ देर के लिए ऑटो की ड्राइविंग सीट संभाल ली। मंत्री जी ने ऑटो चलाया, वीडियो बन गया और फिर वही वीडियो उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर भी पहुंच गया। अब राजनीतिक गलियारों में इस पर खूब चर्चा है।
कोई कह रहा है कि जनता तक पहुंचने का सबसे आसान रास्ता अब सोशल मीडिया की रीलों से होकर जाता है। कुछ लोग मुस्कुराते हुए पूछ रहे हैं कि अगली बारी किसकी है? कौन ट्रैक्टर चलाएगा, कौन बस और कौन नाव? क्योंकि आज की राजनीति में काम के साथ कैमरे की मौजूदगी भी उतनी ही जरूरी मानी जाने लगी है।
मध्यप्रदेश में कुछ मजाकिया अंदाज वाले अफसर एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि क्यों भाई, कभी बेल्ट बांधी है... चड्डी पहनी है? यह सवाल किसी फिटनेस कैंप का नहीं, बल्कि मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के एक बयान का असर है। दरअसल, भोपाल में मंत्री जी ने मुस्कुराते हुए ऐसा किस्सा सुनाया कि राजनीतिक गलियारों से लेकर अफसरशाही तक चर्चा शुरू हो गई।
उन्होंने कहा कि सरकार बनने के बाद जो भी अधिकारी मिलने आता है, वह किसी न किसी तरह खुद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा हुआ बताने की कोशिश करता है। कोई कहता है कि उसने भी शाखा में बेल्ट बांधी है, तो कोई दावा करता है कि उसने भी चड्डी पहनकर शाखा लगाई है।
बस फिर क्या था। अफसरों के बीच यह बयान हल्के-फुल्के मजाक का विषय बन गया है। वे एक-दूसरे से मुस्कुराते हुए पूछ रहे हैं कि बताइए, आपने भी कभी बेल्ट बांधी थी या नहीं? जवाब भी उतने ही दिलचस्प मिल रहे हैं। उधर, राजनीति के जानकार इस बयान के अपने-अपने अर्थ निकाल रहे हैं रहे हैं। कोई इसे संगठन और सत्ता के रिश्ते पर टिप्पणी मान रहा है, तो कोई इसे मंत्री जी का आत्ममंथन वाला संदेश बता रहा है।
मध्यप्रदेश कांग्रेस में एक बार फिर बयानों का टकराव चर्चा का विषय बन गया है। सरकार को घेरने की कोशिश इस बार अपनी ही पार्टी के नेताओं के अलग-अलग रुख की वजह से कमजोर पड़ती नजर आई है। मामला उज्जैन की उस सरकारी जमीन का है, जिसे एक रुपए की लीज पर वीर भारत न्यास को दिए जाने को लेकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने बड़ा सवाल उठाया था। उन्होंने इसे गोलमाल बताते हुए सरकार पर निशाना साधा। कुछ ही समय बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने पूरे मामले की तस्वीर बदल दी।
उज्जैन पहुंचकर दिग्विजय सिंह ने ट्रस्ट डीड और सरकारी दस्तावेज दिखाए। उन्होंने कहा कि वीर भारत न्यास कोई निजी संस्था नहीं, बल्कि सरकारी और सार्वजनिक ट्रस्ट है, जिसके पदेन अध्यक्ष स्वयं मुख्यमंत्री होते हैं। इसलिए इसे भ्रष्टाचार का मामला बताना उचित नहीं है।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि उनके मुख्यमंत्री रहते हुए और कमलनाथ सरकार के समय भी यही व्यवस्था लागू थी। इतना ही नहीं, दिग्विजय सिंह ने दो टूक शब्दों में यह भी कह दिया कि कुछ लोग झूठे आरोप लगाकर ब्लैकमेलिंग का खेल खेलते हैं। बस फिर क्या था, राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई कि विपक्ष सरकार को घेरने निकला था, लेकिन अपने ही बयान से घिर गया।
वल्लभ भवन के गलियारों में इन दिनों सूबे के प्रशासनिक मुखिया के बदले हुए अंदाज की खूब चर्चा है। दरअसल, इसकी वजह हाल ही में हुई कलेक्टर कॉन्फ्रेंस है। इस वीसी में मुख्य सचिव अनुराग जैन का व्यवहार पहले के मुकाबले सहज और सौहार्दपूर्ण था। बैठक में उन्होंने अच्छा काम करने वाले कलेक्टरों की तारीफ की। उन्होंने कहा कि प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था अब पटरी पर है। सरकार की मंशा के अनुरूप काम हो रहा है और सिस्टम बेहतर दिशा में आगे बढ़ रहा है। बैठक का माहौल पहले की तुलना में सकारात्मक रहा, लेकिन हर बदलाव के अपने मायने निकाले जाते हैं।
ऐसे में कुछ अफसर इस बदले हुए अंदाज को अलग नजरिए से देख रहे हैं। कानाफूसी है कि साहब का एक्सटेंशन अगस्त में खत्म होने वाला है, इसलिए अब तेवर भी कुछ नरम हो गए हैं। जो मुख्य सचिव कभी सख्त प्रशासनिक शैली के लिए जाने जाते थे, वे अब सहज हैं। हालांकि यह सिर्फ अफसरशाही की चर्चा है, हकीकत क्या है, इसका जवाब आने वाला वक्त ही देगा।
द सूत्र पर पढ़िए
जब खाकी वाले साहब इंदौरी, मैडम फाइल वूमेन और उपमुख्यमंत्री पोस्टमैन बनें…
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बोल हरि बोल: सत्ता के गलियारों में रौब, रोष और रील का रियलिटी शो!
मैडम के तीखे तेवर, डॉक्टर साहब की फटकार और वो दिल्ली वाली मुलाकात!
जिसका नाम चला... उसका पत्ता कट
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अब ताजा किस्सा विंध्य की विधायक रीति पाठक का है। समर्थकों का उत्साह ऐसा कि सोशल मीडिया पर उन्हें मंत्री बनते हुए लगभग घोषित ही कर दिया गया। बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया, पोस्टर बनने लगे और राजनीतिक गणित भी बैठाया जाने लगा। जैसे-जैसे अफवाहों का गुब्बारा बड़ा होता गया, आखिरकार विधायक महोदया को खुद मैदान में उतरना पड़ा। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि मंत्री पद को लेकर जो खबरें चल रही हैं, वे पूरी तरह भ्रामक हैं। अफवाह फैलाने वालों से उनका कोई लेना-देना नहीं है।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए, लेकिन उसका इस्तेमाल अफवाह फैलाने के लिए नहीं होना चाहिए। साथ ही यह संदेश भी दे दिया कि वे पार्टी की समर्पित कार्यकर्ता हैं और संगठन जो जिम्मेदारी देगा, वही उनका कर्तव्य होगा। अब राजनीतिक गलियारों में इस पोस्ट के भी अपने-अपने मायने निकाले जा रहे हैं। कोई इसे अफवाहों पर विराम मान रहा है, तो कोई कह रहा है कि मैडम का नाम पहले ही मंत्री पद की सूची से कट जाए, इसलिए विरोधियों ने साजिश रची है।
वीडियोबाजी का दौर... कोई खेत में, कोई ऑटो में!
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उधर, भोपाल में मंत्री विश्वास सारंग ने भी जनता के बीच अपना अलग अंदाज दिखाया। वे अपने विधानसभा क्षेत्र में मीसाबंदी रहे बुजुर्ग का हालचाल पूछने पहुंचे थे। मुलाकात खत्म हुई तो कुछ देर के लिए ऑटो की ड्राइविंग सीट संभाल ली। मंत्री जी ने ऑटो चलाया, वीडियो बन गया और फिर वही वीडियो उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर भी पहुंच गया। अब राजनीतिक गलियारों में इस पर खूब चर्चा है।
कोई कह रहा है कि जनता तक पहुंचने का सबसे आसान रास्ता अब सोशल मीडिया की रीलों से होकर जाता है। कुछ लोग मुस्कुराते हुए पूछ रहे हैं कि अगली बारी किसकी है? कौन ट्रैक्टर चलाएगा, कौन बस और कौन नाव? क्योंकि आज की राजनीति में काम के साथ कैमरे की मौजूदगी भी उतनी ही जरूरी मानी जाने लगी है।
चड्डी-बेल्ट पर अफसरों में गपशप!
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उन्होंने कहा कि सरकार बनने के बाद जो भी अधिकारी मिलने आता है, वह किसी न किसी तरह खुद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा हुआ बताने की कोशिश करता है। कोई कहता है कि उसने भी शाखा में बेल्ट बांधी है, तो कोई दावा करता है कि उसने भी चड्डी पहनकर शाखा लगाई है।
बस फिर क्या था। अफसरों के बीच यह बयान हल्के-फुल्के मजाक का विषय बन गया है। वे एक-दूसरे से मुस्कुराते हुए पूछ रहे हैं कि बताइए, आपने भी कभी बेल्ट बांधी थी या नहीं? जवाब भी उतने ही दिलचस्प मिल रहे हैं। उधर, राजनीति के जानकार इस बयान के अपने-अपने अर्थ निकाल रहे हैं रहे हैं। कोई इसे संगठन और सत्ता के रिश्ते पर टिप्पणी मान रहा है, तो कोई इसे मंत्री जी का आत्ममंथन वाला संदेश बता रहा है।
कांग्रेस में फिर अलग-अलग सुर
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उज्जैन पहुंचकर दिग्विजय सिंह ने ट्रस्ट डीड और सरकारी दस्तावेज दिखाए। उन्होंने कहा कि वीर भारत न्यास कोई निजी संस्था नहीं, बल्कि सरकारी और सार्वजनिक ट्रस्ट है, जिसके पदेन अध्यक्ष स्वयं मुख्यमंत्री होते हैं। इसलिए इसे भ्रष्टाचार का मामला बताना उचित नहीं है।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि उनके मुख्यमंत्री रहते हुए और कमलनाथ सरकार के समय भी यही व्यवस्था लागू थी। इतना ही नहीं, दिग्विजय सिंह ने दो टूक शब्दों में यह भी कह दिया कि कुछ लोग झूठे आरोप लगाकर ब्लैकमेलिंग का खेल खेलते हैं। बस फिर क्या था, राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई कि विपक्ष सरकार को घेरने निकला था, लेकिन अपने ही बयान से घिर गया।
साहब के बदले तेवर या विदाई की आहट?
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ऐसे में कुछ अफसर इस बदले हुए अंदाज को अलग नजरिए से देख रहे हैं। कानाफूसी है कि साहब का एक्सटेंशन अगस्त में खत्म होने वाला है, इसलिए अब तेवर भी कुछ नरम हो गए हैं। जो मुख्य सचिव कभी सख्त प्रशासनिक शैली के लिए जाने जाते थे, वे अब सहज हैं। हालांकि यह सिर्फ अफसरशाही की चर्चा है, हकीकत क्या है, इसका जवाब आने वाला वक्त ही देगा।
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