बोल हरि बोल: किसान आंदोलन में जाएगी कलेक्टरी, डोसे पर भारी पड़ा लिट्टी-चोखा!
Harish Divekar | Aug 30, 2026, 11:34 IST
बोल हरि बोल
वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के कॉलम बोल हरि बोल के जरिए जानें प्रशासनिक फेरबदल, किसान आंदोलन के कारण खतरे में पड़ी कलेक्टरी, ई-ऑफिस में ढिलाई और अफसरों के पुनर्वास की पूरी कहानी...
BHOPAL. सत्ता के गलियारों में इन दिनों कुर्सियों से ज्यादा उनके खिसकने की चर्चा है। किसान आंदोलन का असर दो कलेक्टरों की कुर्सी तक पहुंचता दिख रहा है तो मंत्रालय में उत्तर बनाम दक्षिण की अफसरी जंग के खूब चटखारे लिए जा रहे हैं। एक सेक्रेटरी साहब ई-ऑफिस के जमाने में भी कंप्यूटर से दूरी बनाए हुए हैं।
उधर, वर्दी में रहते पुनर्वास पर ज्ञान बांटने वाले खाकी के एक बड़े साहब रिटायर होते ही खुद नई कुर्सी की तलाश में जुट गए। अंदरखाने और भी बहुत कुछ पक रहा है। आइए पढ़ते हैं इस हफ्ते की कानाफूसी वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के साथ… बोल हरि बोल!
प्रदेश की प्रशासनिक जमावट में जल्द बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। सत्ता के गलियारों में चल रही चर्चा पर भरोसा करें तो आने वाले दिनों में 7 से 8 कलेक्टरों की कुर्सियां इधर से उधर हो सकती हैं। कुछ कलेक्टरों को जिलों से बुलाकर मंत्रालय में बैठाया जा सकता है तो कुछ अफसरों को एक बार फिर कलेक्टरी का मौका मिलने की चर्चा है।
इस पूरी उठापटक के बीच सबसे ज्यादा बेचैनी दो जिलों में बताई जा रही है। वजह है किसान आंदोलन। खबर है कि किसान आंदोलन के दौरान इन दोनों जिलों के मैदानी प्रबंधन को लेकर ऊपर तक अच्छा फीडबैक नहीं पहुंचा। सरकार को लगता है कि समय रहते हालात को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता था। चर्चा है कि इसी कथित लापरवाही की कीमत अब दोनों कलेक्टरों को अपनी कुर्सी गंवाकर चुकानी पड़ सकती है।
दरअसल सरकार इसके जरिए मैदानी अफसरों को संदेश भी देना चाहती है कि जिले की कमान मिली है तो मुश्किल वक्त में रिजल्ट भी देना होगा। सिर्फ मीटिंग, प्रेजेंटेशन और कागजी रिपोर्ट से कलेक्टरी नहीं चलेगी। अब किसे मंत्रालय बुलाया जाएगा, किसे दूसरा जिला मिलेगा और किन दो साहबों की कलेक्टरी किसान आंदोलन की भेंट चढ़ेगी, इसका पता तबादला सूची आने के बाद ही चलेगा।
फिलहाल सूची निकली नहीं है, लेकिन कलेक्टर बिरादरी में हिसाब-किताब शुरू हो गया है। आखिर किसान खेत में नाराज हो तो फसल का गणित बिगड़ता है और सड़क पर नाराज हो तो कभी-कभी कलेक्टर की कुर्सी का गणित भी बिगड़ जाता है।
आपने कहावत सुनी ही होगी, एक बिहारी, सब पर भारी। इन दिनों मंत्रालय के गलियारों में इसी कहावत का अफसरी संस्करण खूब सुनाई दे रहा है। यहां कहानी एक नहीं, दो हैं। एक तरफ बिहारी बाबू हैं तो दूसरी तरफ बिहारी मैडम। संयोग ऐसा कि दोनों कमिश्नर हैं और दोनों की अपने-अपने सेक्रेटरी से ऐसी ठनी है कि अब मामला कमरे से निकलकर मंत्रालय के गलियारों का पसंदीदा गॉसिप बन गया है।
पहले बिहारी बाबू की बात। उनके सामने तमिलनाडु वाले साहब हैं। बताते हैं कि साहब कुछ समय से बिहारी बाबू पर कमेंट करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे थे। कभी मीटिंग में तंज तो कभी कामकाज को लेकर कटाक्ष। बिहारी बाबू पहले सुनते रहे। फिर एक दिन शायद लगा कि अब हिसाब बराबर करने का वक्त आ गया है। चर्चा है कि बाबू ने ऐसा पलटवार किया कि तमिलनाडु वाले साहब को भी अंदाजा हो गया कि सामने वाला चुप जरूर था, कमजोर नहीं।
अब इस भिड़ंत का असर कुर्सी तक पहुंचने की खबर है। गलियारों में कानाफूसी है कि बिहारी बाबू का विभाग बदला जा सकता है। उधर, बिहारी मैडम की कहानी भी कम मसालेदार नहीं है। उनके तेवरों से कर्नाटक वाली मैडम इतनी परेशान बताई जा रही हैं कि मामला बड़े साहब तक पहुंच गया। चर्चा है कि कर्नाटक वाली मैडम ने गुहार लगाई है कि अब उनका विभाग ही बदल दिया जाए। अब कौन जाएगा और कौन रहेगा, यह ऊपर वाले साहब तय करेंगे।
इधर मंत्रालय वालों ने जरूर इस पूरी कहानी को नया नाम दे दिया है, "डोसे पर भारी पड़ा लिट्टी-चोखा!" वैसे यहां लड़ाई स्वाद की नहीं, अफसरी तेवरों की है।
सरकार चाहती है कि मंत्रालय पेपरलेस हो। फाइलें कंप्यूटर पर चलें। फैसले तेजी से हों। आला अफसर भी दिन-रात ई-ऑफिस का राग अलाप रहे हैं। लेकिन एक सेक्रेटरी साहब हैं, जो शायद डिजिटल क्रांति को अपनी रफ्तार से स्वीकार करना चाहते हैं।
मंत्रालय में चर्चा है कि साहब 15 दिन में एकाध बार ही कंप्यूटर खोलते हैं। अब सोचिए, ई-ऑफिस में फाइल दौड़ रही है और जिस टेबल पर फैसला होना है, वहां कंप्यूटर ही आराम फरमा रहा हो तो बेचारी डिजिटल फाइल जाए भी तो जाए कहां!
कर्मचारियों के बीच इसे लेकर खूब चुटकी ली जा रही है। कोई पूछता है कि साहब का पासवर्ड तो याद है न? कोई कहता है कि ई-ऑफिस की फाइल भेजने के साथ साहब को कंप्यूटर खोलने का रिमाइंडर भी भेजना चाहिए। वैसे ये वही साहब बताए जाते हैं, जो कुछ समय पहले मिशनरी को फंडिंग देने से जुड़े मामले को लेकर चर्चा में आए थे। अब सरकार ई-ऑफिस की स्पीड बढ़ाने में लगी है और साहब का कंप्यूटर कितनी स्पीड से खुलता है, ये मंत्रालय वाले बेहतर जानते हैं। फिलहाल कर्मचारी यही कह रहे हैं कि ई-ऑफिस अपनी जगह है, साहब का ऑफलाइन मोड अपनी जगह!
कहावत है, पर उपदेश कुशल बहुतेरे। दूसरों को नसीहत देना आसान है, लेकिन वही नसीहत जब खुद पर लागू करने का वक्त आता है तो बड़े-बड़ों के सिद्धांत डगमगा जाते हैं। हाल ही में रिटायर हुए खाकी के एक बड़े साहब के किस्से को लेकर इन दिनों कुछ ऐसी ही चर्चा है। जब तक साहब वर्दी में थे, रिटायरमेंट के बाद अफसरों के पुनर्वास पर उनके विचार बड़े क्रांतिकारी हुआ करते थे।
साहब कहा करते थे कि पुलिस अफसर वर्दी में ही अच्छा लगता है। रिटायर होने के बाद दूसरी कुर्सी के लिए भागदौड़ करने से भद्द पिटती है। सुनने वाले सोचते थे, क्या सिद्धांत हैं साहब के…
फिर कैलेंडर बदला। रिटायरमेंट की तारीख आई और साहब की वर्दी उतर गई। बताते हैं कि इसके साथ ही पुनर्वास को लेकर दर्शन भी बदल गया। गलियारों में कानाफूसी है कि दूसरों को पुनर्वास से बचने का ज्ञान देने वाले साहब ने अपने पुनर्वास के लिए पूरे घोड़े खोल दिए। जहां संभावना दिखी, वहां संपर्क हुआ और जहां रास्ता नजर आया, वहां कोशिश की गई।
अब खबर है कि साहब की मेहनत रंग लाती दिख रही है। चर्चा है कि उन्हें सलाहकार की भूमिका मिल सकती है। अगर ऐसा होता है तो साहब के पुराने साथी शायद मुस्कुराते हुए एक सवाल जरूर पूछें। साहब, पुनर्वास से भद्द तो दूसरों की ही पिटती थी न?
वैसे सत्ता के गलियारों का पुराना दस्तूर है। कुर्सी पर बैठकर दिए गए कई उपदेश, कुर्सी जाते ही अपना अर्थ बदल लेते हैं। बाकी साहब सलाहकार बनते हैं या नहीं, यह जल्द साफ हो जाएगा। तब तक गलियारों में कानाफूसी जारी रखिए, क्योंकि यहां जो दिखाई देता है, कहानी अक्सर उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प होती है। बाकी जो है सो तो है ही… Bol Hari Bol!
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इस पूरी उठापटक के बीच सबसे ज्यादा बेचैनी दो जिलों में बताई जा रही है। वजह है किसान आंदोलन। खबर है कि किसान आंदोलन के दौरान इन दोनों जिलों के मैदानी प्रबंधन को लेकर ऊपर तक अच्छा फीडबैक नहीं पहुंचा। सरकार को लगता है कि समय रहते हालात को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता था। चर्चा है कि इसी कथित लापरवाही की कीमत अब दोनों कलेक्टरों को अपनी कुर्सी गंवाकर चुकानी पड़ सकती है।
दरअसल सरकार इसके जरिए मैदानी अफसरों को संदेश भी देना चाहती है कि जिले की कमान मिली है तो मुश्किल वक्त में रिजल्ट भी देना होगा। सिर्फ मीटिंग, प्रेजेंटेशन और कागजी रिपोर्ट से कलेक्टरी नहीं चलेगी। अब किसे मंत्रालय बुलाया जाएगा, किसे दूसरा जिला मिलेगा और किन दो साहबों की कलेक्टरी किसान आंदोलन की भेंट चढ़ेगी, इसका पता तबादला सूची आने के बाद ही चलेगा।
फिलहाल सूची निकली नहीं है, लेकिन कलेक्टर बिरादरी में हिसाब-किताब शुरू हो गया है। आखिर किसान खेत में नाराज हो तो फसल का गणित बिगड़ता है और सड़क पर नाराज हो तो कभी-कभी कलेक्टर की कुर्सी का गणित भी बिगड़ जाता है।
डोसे पर भारी पड़ा लिट्टी-चोखा
पहले बिहारी बाबू की बात। उनके सामने तमिलनाडु वाले साहब हैं। बताते हैं कि साहब कुछ समय से बिहारी बाबू पर कमेंट करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे थे। कभी मीटिंग में तंज तो कभी कामकाज को लेकर कटाक्ष। बिहारी बाबू पहले सुनते रहे। फिर एक दिन शायद लगा कि अब हिसाब बराबर करने का वक्त आ गया है। चर्चा है कि बाबू ने ऐसा पलटवार किया कि तमिलनाडु वाले साहब को भी अंदाजा हो गया कि सामने वाला चुप जरूर था, कमजोर नहीं।
अब इस भिड़ंत का असर कुर्सी तक पहुंचने की खबर है। गलियारों में कानाफूसी है कि बिहारी बाबू का विभाग बदला जा सकता है। उधर, बिहारी मैडम की कहानी भी कम मसालेदार नहीं है। उनके तेवरों से कर्नाटक वाली मैडम इतनी परेशान बताई जा रही हैं कि मामला बड़े साहब तक पहुंच गया। चर्चा है कि कर्नाटक वाली मैडम ने गुहार लगाई है कि अब उनका विभाग ही बदल दिया जाए। अब कौन जाएगा और कौन रहेगा, यह ऊपर वाले साहब तय करेंगे।
इधर मंत्रालय वालों ने जरूर इस पूरी कहानी को नया नाम दे दिया है, "डोसे पर भारी पड़ा लिट्टी-चोखा!" वैसे यहां लड़ाई स्वाद की नहीं, अफसरी तेवरों की है।
ई-ऑफिस में साहब का ऑफलाइन मोड
मंत्रालय में चर्चा है कि साहब 15 दिन में एकाध बार ही कंप्यूटर खोलते हैं। अब सोचिए, ई-ऑफिस में फाइल दौड़ रही है और जिस टेबल पर फैसला होना है, वहां कंप्यूटर ही आराम फरमा रहा हो तो बेचारी डिजिटल फाइल जाए भी तो जाए कहां!
कर्मचारियों के बीच इसे लेकर खूब चुटकी ली जा रही है। कोई पूछता है कि साहब का पासवर्ड तो याद है न? कोई कहता है कि ई-ऑफिस की फाइल भेजने के साथ साहब को कंप्यूटर खोलने का रिमाइंडर भी भेजना चाहिए। वैसे ये वही साहब बताए जाते हैं, जो कुछ समय पहले मिशनरी को फंडिंग देने से जुड़े मामले को लेकर चर्चा में आए थे। अब सरकार ई-ऑफिस की स्पीड बढ़ाने में लगी है और साहब का कंप्यूटर कितनी स्पीड से खुलता है, ये मंत्रालय वाले बेहतर जानते हैं। फिलहाल कर्मचारी यही कह रहे हैं कि ई-ऑफिस अपनी जगह है, साहब का ऑफलाइन मोड अपनी जगह!
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अब खबर है कि साहब की मेहनत रंग लाती दिख रही है। चर्चा है कि उन्हें सलाहकार की भूमिका मिल सकती है। अगर ऐसा होता है तो साहब के पुराने साथी शायद मुस्कुराते हुए एक सवाल जरूर पूछें। साहब, पुनर्वास से भद्द तो दूसरों की ही पिटती थी न?
वैसे सत्ता के गलियारों का पुराना दस्तूर है। कुर्सी पर बैठकर दिए गए कई उपदेश, कुर्सी जाते ही अपना अर्थ बदल लेते हैं। बाकी साहब सलाहकार बनते हैं या नहीं, यह जल्द साफ हो जाएगा। तब तक गलियारों में कानाफूसी जारी रखिए, क्योंकि यहां जो दिखाई देता है, कहानी अक्सर उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प होती है। बाकी जो है सो तो है ही… Bol Hari Bol!
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