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News In Short
- 1 अप्रैल 2026 से देशभर में केवल 20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल ही मिलेगा।
- ईंधन का ऑक्टेन नंबर (RON) कम से कम 95 होना जरूरी किया गया है।
- अब तक एथेनॉल ब्लेंडिंग से सरकार ने 1.40 लाख करोड़ रुपए बचाए हैं।
- 2023 के बाद बनी गाड़ियों के लिए पूरी तरह सुरक्षित, पुरानी गाड़ियों के माइलेज में 3-7% की कमी संभव।
- गन्ने से बने एथेनॉल से कार्बन उत्सर्जन में 65% तक की गिरावट आएगी।
News In Detail
अगले फाइनेंशियल ईयर यानी 1 अप्रैल 2026 से पूरे भारत में केवल एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20 Petrol) ही बेचा जाएगा। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की अधिसूचना के मुतबिक, अब सभी तेल कंपनियों के लिए 20% एथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल की आपूर्ति करना जरूरी कर दिया गया है। सरकार का यह कदम असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर समान रूप से लागू होगा।
क्या है E20 पेट्रोल?
E20 पेट्रोल का सीधा मतलब है एक ऐसा मिश्रण जिसमें 20% एथेनॉल और 80% पारंपरिक पेट्रोल होता है। एथेनॉल एक बायो-फ्यूल है, जिसे गन्ने, मक्का और अन्य अनाजों से तैयार किया जाता है। यह एक नवीकरणीय और स्वच्छ ईंधन है। सरकार का लक्ष्य इसके जरिए कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना और विदेशी मुद्रा बचाना है। आंकड़ों की मानें तो 2014-15 से अब तक इस नीति से 1.40 लाख करोड़ रुपए की बचत हुई है। क्या है ईंधन ई-20
क्यों लिया गया यह फैसला?
एथेनॉल गन्ना, मक्का और अनाज से बनता है।
यह देश में ही तैयार होता है और पेट्रोल से ज्यादा साफ जलता है।
इससे कच्चे तेल के आयात में कमी आती है।
प्रदूषण घटाने में मदद मिलती है।
किसानों को फायदा, क्योंकि गन्ने और मक्का की मांग बढ़ती है।
RON 95 क्यों जरूरी?
नए नियमों में पेट्रोल का न्यूनतम रिसर्च ऑक्टेन नंबर 95 होना जरूरी कर दिया गया है। दरअसल, RON ईंधन की नॉकिंग रोकने की क्षमता को दर्शाता है। जब ईंधन इंजन में गलत तरीके से जलता है तो अजीब आवाज आती है और इंजन खराब हो सकता है। क्योंकि इथेनॉल का प्राकृतिक ऑक्टेन लेवल ज्यादा (करीब 108) होता है, इसलिए 20% मिश्रण के साथ 95 RON की अनिवार्यता इंजन की परफॉर्मेंस और स्थिरता को बेहतर बनाएगी।
पुराने वाहनों पर क्या होगा असर?
अगर आपने 2023 से 2025 के बीच नई गाड़ी खरीदी है, तो चिंता की बात नहीं है क्योंकि अधिकांश नए वाहन E20 के अनुकूल डिजाइन किए गए हैं। हालांकि, इससे पहले बने पुराने वाहनों के माइलेज में 3 से 7% तक की मामूली कमी देखी जा सकती है। लंबे समय तक इस्तेमाल से पुराने वाहनों के कुछ रबर या प्लास्टिक पार्ट्स पर असर पड़ने की आशंका है, लेकिन सरकार ने तकनीकी अध्ययनों के आधार पर इसे सुरक्षित बताया है।
पर्यावरण और किसानों को बड़ा फायदा
नीति आयोग के अध्ययन के मुताबिक, गन्ने से बने एथेनॉल के इस्तेमाल से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 65% तक की कमी आएगी। यह पारंपरिक E10 ईंधन के मुकाबले 30% कम कार्बन छोड़ता है। इससे न केवल प्रदूषण कम होगा, बल्कि अनाज और गन्ना उगाने वाले किसानों की आय में भी भारी बढ़ोत्तरी होगी। सरकार (पेट्रोलियम मंत्रालय) का विजन 2030 तक भारत को बायो-फ्यूल सेक्टर में ग्लोबल लीडर बनाने का है।
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