कौन हैं गुजरात के डॉ. गणेश बरैया जिन्हें सर्कस वाले खरीदना चाहते थे, जानें उनकी संघर्ष भरी कहानी

Aman Vaishnav | Mar 17, 2026, 15:50 IST
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gujarat dr ganesh baraiya success story
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गुजरात के गणेश बरैया जो महज 3 फीट के हैं उन्होेने अपनी शारीरिक लंबाई को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। जीवन में कई उतार चढ़ाव आने के बाद भी गणेश ने हार नहीं मानी थी। उनकी यह यात्रा अपमान से लेकर सम्मान पाने तक की बड़ी कहानी है।

कद 3 फीट और वजन सिर्फ 20 किलो, लेकिन हौसला हिमालय जैसा ऊंचा। यह कहानी गुजरात के गणेश बरैया की है जिन्होंने साबित किया कि सफलता शरीर की बनावट नहीं बल्कि इरादों की मजबूती से मिलती है। अपमान और तिरस्कार झेलने वाला यह लड़का आज सफेद कोट पहनकर मरीजों का इलाज कर रहा है।

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सर्कस मंडली ने दिया था 5 लाख का ऑफर

गुजरात के गोरखी गांव में एक किसान के घर जन्मे गणेश बरैया नौ भाई-बहनों में आठवें नंबर पर हैं। गणेश उनके परिवार में अकेले ऐसे हैं, जिन्हें ड्वार्फिज्म (बौनापन) की समस्या है। बचपन में उन्हें कई मुसीबतें झेलनी पड़ीं और तिरस्कार का सामना करना पड़ा था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जब गणेश 10 साल के थे, तो एक सर्कस मंडली ने उन्हें 5 लाख रुपए में खरीदने का ऑफर दिया था। उनका कहना था कि वे सर्कस में ही काम कर सकते हैं, लेकिन गणेश के पिता ने उन्हें भगा दिया था।

इसी दिन उनके पिता ने ये फैसला किया कि उनका बेटा कभी भी दया का पात्र नहीं बनेगा। बल्कि सम्मान से अपना जीवन जिएगा। गणेश की बहनें उन्हें गोद में उठाकर स्कूल ले जाती थीं। उनके पिता उन्हें कंधे पर बैठाकर पढ़ाई करने के लिए लेकर जाते थे।

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ऐसे हुई डॉक्टरी की शुरुआत

गणेश की जिंदगी में असली बदलाव तब आया जब उन्होंने 2018 में दिव्यांग कोटे से नीट (NEET) परीक्षा पास की थी। हालांकि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) ने उन्हें एमबीबीएस में दाखिला देने से मना कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ उन्होंने कोर्ट का रुख किया, लेकिन गुजरात हाई कोर्ट ने भी वही फैसला दिया था।

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गणेश के जीवन में आया मोड़

गणेश अब हताश हो गए थे और सोच रहे थे कि मेडिकल की पढ़ाई छोड़ देते हैं। तभी उनके जीवन में चमत्कार जैसा एक मोड़ आया। डॉ. दलपत कटारिया ने बिना बताए उनकी याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर कर दी थी। एक साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने गणेश के हक में फैसला सुनाया था। 2019 में वे भावनगर मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में दाखिला लेने में सफल हो गए थे।

पढ़ाई करना इतना भी आसान नहीं था

शुरुआत में पढ़ाई आसान नहीं थी। पहले सेमेस्टर में वे फेल हो गए थे, क्योंकि वे जल्दी-जल्दी लिख नहीं पाते थे। पेपर लंबे होते थे और समय कम था। इसके बाद उनके शिक्षक सीनियर और दोस्तों ने मदद की थी। पहली बार एक एमबीबीएस छात्र के तौर पर उन्हें राइटर और अतिरिक्त समय मिला था।

इसके बाद उन्होंने सारे सेमेस्टर पहले प्रयास में ही पास कर लिए थे। क्लास में उनके दोस्त उनकी सीट पहली बेंच पर रिजर्व कर देते थे। एनाटॉमी के प्रैक्टिकल्स में प्रोफेसर और दोस्त उन्हें टेबल पर चढ़ा दिया करते थे ताकि वे अच्छे से देख और सीख सकें। गुजराती माध्यम से आने के कारण गणेश को अंग्रेजी समझने में थोड़ी परेशानी होती थी तो दोस्त उन्हें नोट्स पढ़कर समझाते थे।

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अमपनी सफलता का श्रेय साथियों को

गणेश अपनी सफलता का श्रेय हमेशा उन लोगों को देते हैं जो उनके साथ खड़े रहे थे। खासकर डॉ. कटारिया और प्राचार्य रैवरसिंह सरवैया का नाम लेते हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वे कहते हैं कि उनके हर कदम में इन लोगों की मदद रही थी।

आज जब अस्पताल में लोग उन्हें पहचानते हैं, सेल्फी लेते हैं तो गणेश इसे अपनी जिम्मेदारी मानते हैं। बहुत से लोग उनसे अपने बच्चों के लिए सलाह लेने आते हैं। गणेश कहते है यदि मेरी कहानी किसी बच्चे को हिम्मत दे सके तो यही मेरी असली सफलता है।

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