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5 पॉइंट में समझें पूरी खबर...
- हिंदी जगत के विख्यात कथाकार और यशस्वी संपादक ज्ञानरंजन का निधन हो गया है।
- 7 जनवरी को रात 10.30 बजे जबलपुर में अंतिम सांस ली।
- ज्ञानरंजन जी ने साहित्यिक पत्रिका 'पहल' का दशकों तक संपादन किया।
- पिता और घंटा जैसी कालजयी कहानियों के रचनाकार रहे।
- आकाशदीप और मैथिलीशरण गुप्त जैसे राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित भी हुए।
विनोद कुमार शुक्ल के बाद साहित्य जगत के लिए एक और अपूरणीय क्षति... हिंदी के सुविख्यात कथाकार ज्ञानरंजन नहीं रहे। 90 वर्ष की उम्र में उन्होंने जबलपुर के एक अस्पताल में 7 जनवरी को रात 10.30 बजे अंतिम सांस ली।
उन्होंने मां नर्मदा के आंचल की छांव जबलपुर में अध्यापन से लेकर लगभग पूरी साहित्य साधना की। प्रति​ष्ठित साहित्यिक पत्रिका पहल का लंबे समय तक संपादन किया।
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मध्यवर्गीय जीवन के कुशल शिल्पी
ज्ञानरंजन ने हिंदी कहानी को नई भाषा दी। उन्होंने पिता, घंटा और अमरूद जैसी कहानियां लिखीं। इन रचनाओं ने मध्यवर्ग के विरोधाभासों को दिखाया। उन्होंने समाज की विरूपताओं का गहरा खुलासा किया।
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पहल पत्रिका और वैचारिक योगदान
ज्ञानरंजन ने पहल पत्रिका का लंबे समय तक संपादन किया। इस पत्रिका ने साहित्य में ऊंचा मुकाम हासिल किया। साठोत्तरी कथा-साहित्य में उनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने नई पीढ़ी की सोच को गहराई से पकड़ा।
जन्म और शिक्षा
उनका जन्म 21 नवंबर, 1936 को हुआ था। जन्म महाराष्ट्र के अकोला जिले में हुआ था। उनका बचपन दिल्ली, अजमेर और बनारस में बीता। उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूर्ण हुई थी।
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वैश्विक स्तर पर पहचान
ज्ञानरंजन की कहानियों की कुल संख्या 25 है। ये सभी सपना नहीं संकलन में मौजूद हैं। उनकी रचनाओं का कई विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। कई विदेशी विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भी उनकी कहानियां शामिल हैं।
सम्मान और पुरस्कार
उन्हें वर्ष 2019 में आकाशदीप सम्मान मिला। इसके अलावा सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से नवाजे गए। उन्हें साहित्य भूषण और शिखर सम्मान भी मिला। वर्ष 2001-02 में उन्हें मैथिलीशरण गुप्त सम्मान मिला।
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