बदल गई होली मनाने की परंपरा, अब रंगों से ज्यादा सोशल मीडिया के फिल्टर्स का चढ़ा खुमार

होली अब डिजिटल हो गई है। राजपूत, अग्रवाल और ब्राह्मण व अन्य समाजों ने परंपराओं को मॉडर्न टच दिया है। रील और वीडियो कॉल के बीच आज भी पुरानी आस्था कायम है।

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Kaushiki
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होली केवल रंगों का उत्सव नहीं बल्कि हमारी संस्कृति का प्रतीक है। भोपाल में होली मनाने के तरीकों में अब बड़ा बदलाव आया है। विभिन्न समाजों ने अपनी जड़ों को नई मॉडर्न स्टाइल से जोड़ा है। फाग गीतों की मधुर धुन आज भी कानों में मिश्री घोलती है।

गुजिया और पारंपरिक पकवानों की खुशबू घर-घर में महकती है। मॉडर्न लाइफस्टाइल के बावजूद लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए हैं। आइए जानें समय के साथ होली की नई झलक...

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राजपूत समाज में होली

राजपूत समाज में होली की शुरुआत कुलदेवता के पूजन से होती है। चित्र पर गुलाल अर्पित कर पारंपरिक राजस्थानी फाग गीत गाए जाते हैं। ये लोग गेर नृत्य के साथ दाल-बाटी और चूरमा का आनंद लिया जाता है। अब कई परिवार पिकनिक स्टाइल में फार्महाउस पर होली मनाते हैं। 

अग्रवाल समाज की होली

अग्रवाल समाज भक्ति और एकता का संदेश देता है। कुलदेवी लक्ष्मी और महाराजा अग्रसेन को गुलाल अर्पित किया जाता है। अब लोग रंगों की जगह केवल सूखे गुलाल का उपयोग करते हैं। भजन-कीर्तन के साथ समाज के लोग आपसी मेल-मिलाप बढ़ा रहे हैं।

कायस्थ समाज की बदलती पूजा शैली

कायस्थ समाज में गोबर के कंडों से होली जलाने की परंपरा है। फिर लोग एक-दूसरे को अबीर लगाकर गले लगकर होली की बधाई देते हैं। अब पहले की तरह व्यक्तिगत मुलाकातें कम हो गई हैं, और सोशल मीडिया का चलन बढ़ गया है। लोग अब व्हाट्सएप और फेसबुक के जरिए एक-दूसरे को शुभकामनाएं भेज रहे हैं।

ब्राह्मण समाज की बदलती पूजा शैली

ब्राह्मण समाज में मंत्रोच्चार के साथ होली पूजन का विधान है। कुल देवी और ऋषि को गुलाल लगाकर आशीर्वाद लिया जाता है। अब लोग घरों के बजाय मंदिरों में सामूहिक मिलन करते हैं। सामूहिक स्थलों पर होली मनाना अब एक नई परंपरा बन गई है।

बंगाली समाज की बदलती पूजा शैली

बंगाली समुदाय होली को डोल यात्रा के रूप में मनाता है। सुबह प्रभात फेरियां निकाली जाती हैं और रवींद्र संगीत गूंजता है। तुलसी के पौधे में रंगीन जल चढ़ाना बहुत शुभ माना जाता है। अब युवा समूह बनाकर सार्वजनिक स्थलों पर होली खेलते हैं। 

मराठी समाज का सांस्कृतिक उल्लास

मराठी समाज में होली को शिमगा के नाम से जानते हैं। पूरनपोली इस पर्व का सबसे प्रमुख और स्वादिष्ट पकवान होता है। सप्ताह भर मंदिरों में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। अब सार्वजनिक चल समारोहों की जगह निजी मिलन बढ़ रहे हैं।

गुजराती समाज की होली

गुजराती समाज में होलिका दहन के अंगारे घर लाए जाते हैं। लोग गेहूं की बालियों को सेंककर प्रसाद ग्रहण करते हैं। अब फूलों और गुलाल से होली खेलने का चलन बढ़ा है। ढोकला और मीठी कड़ी जैसे व्यंजनों का लुत्फ लिया जाता है। 

सिंधी समाज की होली

सिंधी समाज में मीठी रोटी और कोकी बनाने की परंपरा है। पंजाबी समाज के गुरुद्वारों में कीर्तन दरबार सजाए जाते हैं। शोकग्रस्त परिवारों के घर जाकर गुलाल लगाना एक नेक परंपरा है। यह रिवाज समाज में संवेदनशीलता और प्यार को बढ़ावा देता है।

होली की मान्यताएं

होलिका दहन की राख को घर में छिड़कना शुभ होता है। कई लोग इसे पोटली में भरकर घर में सुरक्षित रखते हैं। मान्यता है कि इससे घर में नजर दोष नहीं लगता। श्रद्धालु इस रात विशेष मंत्रों का जाप और साधना करते हैं।

यह समय नकारात्मकता को जलाकर नई शुरुआत करने का होता है। होली की अग्नि से नई फसल की बालियां सेंकी जाती हैं। समाज के बड़े-बुजुर्ग नई पीढ़ी को ये परंपराएं सिखा रहे हैं। बदलाव के बीच भी आस्था का रंग गहरा बना हुआ है।

आज के डिजिटल दौर में होली

आज के डिजिटल दौर में होली मनाने का अंदाज पूरी तरह बदल गया है। अब लोग असली रंगों से ज्यादा सोशल मीडिया के रंगों में रंगे हैं। पहले लोग घर जाकर मिलते थे। अब बस व्हाट्सएप पर मैसेज भेजते हैं।

फेसबुक और इंस्टाग्राम पर रील बनाना अब होली का नया रिवाज है। फोटो और सेल्फी के चक्कर में लोग असली त्योहार का मजा भूल रहे हैं। इंटरनेट ने दूर बैठे अपनों को वीडियो कॉल के जरिए पास ला दिया है।

अब लोग ऑनलाइन शॉपिंग से ही पिचकारी और गुलाल घर मंगवा लेते हैं। हालांकि, इन बदलावों के बीच पुरानी मान्यताएं आज भी अपनी जगह बनी हुई हैं।

लोग आज भी होलिका की राख को नजर दोष से बचने के लिए संभालते हैं। बुजुर्ग आज भी बच्चों को होली की अग्नि का धार्मिक महत्व समझाते हैं। आस्था और तकनीक का यह मेल होली को एक नया रूप दे रहा है।

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