दवाओं पर 700% और मेडिकल सामान पर 1,000% तक मार्जिन! अस्पतालों में मरीजों से कैसे वसूली जा रही मोटी रकम?

Arohi Raj | Oct 24, 2026, 11:51 IST
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सरकार ने 137 दवाओं के ट्रेड मार्जिन पर बड़ा फैसला लिया है।
सरकार ने 137 दवाओं के ट्रेड मार्जिन पर बड़ा फैसला लिया है।

अस्पतालों में इलाज कराना लगातार महंगा होता जा रहा है। मरीजों को दवाओं और मेडिकल सामान के लिए भारी रकम चुकानी पड़ती है। अब केंद्र सरकार ने भी इस समस्या को स्वीकार किया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि कुछ दवाओं पर 700% से ज्यादा मार्जिन लिया जा रहा है। मेडिकल सामान पर यह मार्जिन एक हजार प्रतिशत या उससे अधिक भी हो सकता है।

अस्पताल कई बार सस्ते में दवाएं खरीदकर मरीजों को पूरी कीमत पर बेचते हैं। मरीजों को उनकी असली खरीद कीमत का पता भी नहीं चलता। सरकार ने इस तरीके को गलत बताया है। अब इस समस्या को रोकने के उपायों पर विचार किया जा रहा है।


सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने क्या बताया?

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया है। इसमें अस्पतालों की दवाओं और मेडिकल सामान की कीमतों पर चिंता जताई गई है। सरकार ने माना कि कुछ अस्पताल ज्यादा मुनाफे वाली दवाओं को प्राथमिकता देते हैं। दवा कंपनियां इन अस्पतालों को अच्छा ट्रेड मार्जिन देती हैं। इसके बाद वही दवाएं मरीजों को मैक्सिमम रिटेल प्राइस (MRP) पर बेची जाती हैं।

सरकार ने इसे गलत कारोबारी तरीका बताया है। इस समस्या को दूर करने के लिए संबंधित पक्षों से बातचीत की जा रही है।

दवाओं पर 700% मार्जिन कैसे मिलता है?

अस्पताल दवा कंपनियों से बड़ी मात्रा में दवाएं खरीदते हैं। कई बार कंपनियां उन्हें कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराती हैं। इसके बाद अस्पताल मरीजों को वही दवाएं अधिकतम खुदरा मूल्य पर बेचते हैं। इसे मैक्सिमम रिटेल प्राइस यानी MRP कहा जाता है। सरकारी हलफनामे के मुताबिक, कुछ दवाओं पर मार्जिन 170% से 700% तक होता है।

कुछ मामलों में यह इससे भी ज्यादा हो सकता है। कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं में भी ज्यादा मार्जिन की बात सामने आई है। हालांकि एमआरपी पर दवा बेचना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। सरकार की चिंता अस्पतालों के ज्यादा मुनाफे और मरीजों की मजबूरी को लेकर है।

मेडिकल सामान पर 1,000% तक मार्जिन

अस्पतालों में केवल दवाएं ही महंगी नहीं मिलतीं। इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाले मेडिकल सामान पर भी भारी मार्जिन होता है। सरकार के मुताबिक, कुछ मेडिकल सामग्री पर सौ प्रतिशत से एक हजार प्रतिशत तक मार्जिन हो सकता है। कुछ मामलों में यह इससे भी ज्यादा हो सकता है। अस्पताल कई बार मेडिकल सामान का बिल अलग से बनाते हैं। मरीजों को सामान की खरीद कीमत की जानकारी नहीं मिलती। इससे मरीज यह समझ नहीं पाते कि अस्पताल ने सामान कितने में खरीदा था। उनसे कितनी अतिरिक्त रकम ली जा रही है। इसी वजह से इलाज का कुल खर्च काफी बढ़ सकता है।

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18 Oct 2026 ,
By Jageshwar prasad
कैंसर की दवाओं पर उच्च ट्रेड मार्जिन के कारण मरीजों को नुकसान हो रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इन दवाओं की कीमतों को डकैती और नरसंहार जैसा बताया । केंद्र सरकार ने ट्रेड मार्जिन को एमआरपी के 30 प्रतिशत में सीमित करने का निर्णय लिया। फिर भी राजस्थान में अस्पताल और डिस्ट्रीब्यूटर मरीजों से अधिक पैसे वसूल रहे।
कैंसर की दवाओं पर उच्च ट्रेड मार्जिन के कारण मरीजों को नुकसान हो रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इन दवाओं की कीमतों को डकैती और नरसंहार जैसा बताया । केंद्र सरकार ने ट्रेड मार्जिन को एमआरपी के 30 प्रतिशत में सीमित करने का निर्णय लिया। फिर भी राजस्थान में अस्पताल और डिस्ट्रीब्यूटर मरीजों से अधिक पैसे वसूल रहे।

बीमा वाले और सामान्य मरीजों में अंतर

सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं और हेल्थ इंश्योरेंस के तहत इलाज के पैकेज तय होते हैं। इन पैकेजों में दवाओं और मेडिकल सामान का खर्च भी शामिल हो सकता है। सरकारी एजेंसियां और बीमा कंपनियां अस्पतालों से दरें तय करती हैं। इससे इलाज की कुल रकम पहले से निर्धारित हो सकती है।

दूसरी तरफ अपने पैसे से इलाज कराने वाले मरीजों की स्थिति अलग होती है। उनसे मेडिकल सामान का अलग बिल लिया जा सकता है। कई बार यह बिल सामान की पूरी एमआरपी पर बनाया जाता है। ऐसे में मरीज पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है।

हर साल 6.3 करोड़ लोग गरीबी की चपेट में

महंगे इलाज का असर लोगों की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ रहा है। केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि हर साल करीब 6.3 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। इसकी बड़ी वजह इलाज और दवाओं पर होने वाला खर्च है। बीमारी के दौरान परिवारों को अस्पताल का बिल भरना पड़ता है। दवाओं और दूसरी मेडिकल जरूरतों पर भी पैसा खर्च होता है। कई परिवारों के लिए यह खर्च उठाना मुश्किल हो जाता है।

दवाओं की कीमत कौन तय करता है?

भारत में दवाओं की कीमतों पर नजर रखने के लिए सरकारी संस्था काम करती है। इसका नाम राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण यानी NPPA है। यह संस्था जरूरी दवाओं की अधिकतम कीमत तय करती है। इसे ड्रग प्राइस कंट्रोल की व्यवस्था से समझा जा सकता है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 23 जून 2026 तक 935 दवा फॉर्मूलेशन की अधिकतम कीमत निर्धारित हुई थी। इसके अलावा नई दवाओं की तीन हजार आठ सौ पांच खुदरा कीमतें भी तय की गई थीं। जिन दवाओं की कीमत सीधे नियंत्रित नहीं होती, उन पर भी नियम लागू हैं। ऐसी नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की एमआरपी में निर्माता 12 महीने के दौरान 10% से ज्यादा बढ़ोतरी नहीं कर सकते।

कैंसर की दवाएं होंगी सस्ती: 137 दवाओं की कीमतों में 70% तक की कटौती, मरीजों को मिलेगी बड़ी राहत | Cancer Medicines to Become Cheaper: Prices of 137 Drugs Cut by Up to 70%, Patients to Get Major Relief
कैंसर मरीजों को राहत: एनपीपीए के फैसले से 137 दवाएं होंगी सस्ती, कीमतें 70 प्रतिशत तक गिरेगी
18 Oct 2026 ,
By Sandeep Kumar
कैंसर की दवाएं सस्ती हो सकती हैं। एनपीपीए के फैसले के बाद 137 कैंसर रोधी दवाएं नई कीमतों के दायरे में आई हैं। इन दवाओं की संशोधित कीमतें 9 नवंबर 2026 से प्रभावी होंगी। दवाओं की कीमतें 70 प्रतिशत तक घट सकती हैं। दवा विक्रेताओं को संशोधित मूल्य सूची प्रदर्शित करनी होगी। सरकार के मुताबिक मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपए की बचत होगी।
कैंसर की दवाएं सस्ती हो सकती हैं। एनपीपीए के फैसले के बाद 137 कैंसर रोधी दवाएं नई कीमतों के दायरे में आई हैं। इन दवाओं की संशोधित कीमतें 9 नवंबर 2026 से प्रभावी होंगी। दवाओं की कीमतें 70 प्रतिशत तक घट सकती हैं। दवा विक्रेताओं को संशोधित मूल्य सूची प्रदर्शित करनी होगी। सरकार के मुताबिक मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपए की बचत होगी।

कैंसर की 137 दवाओं पर राहत की तैयारी

कैंसर के मरीजों के लिए दवाओं का खर्च बड़ी परेशानी बन सकता है। इसे देखते हुए सरकार ने अक्टूबर 2026 में एक फैसला लिया है। इसके तहत 137 नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं का ट्रेड मार्जिन सीमित किया जाएगा। इन दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की सीमा 30% तय की गई है।

नई कीमतें 9 नवंबर 2026 से लागू होनी हैं। सरकार का अनुमान है कि इससे कुछ दवाओं की एमआरपी में 70% तक कमी आ सकती है। हालांकि यह संभावित राहत है। वास्तविक कमी अलग-अलग दवाओं की कीमत पर निर्भर करेगी।

अस्पतालों के बिल पर नियंत्रण क्यों मुश्किल?

सरकार के सामने अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था को नियंत्रित करना बड़ी चुनौती है। स्वास्थ्य सेवाएं मुख्य रूप से राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। अस्पतालों पर क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट या राज्यों के दूसरे कानून लागू हो सकते हैं। केंद्र सरकार की भूमिका मुख्य रूप से दवाओं की कीमतें नियंत्रित करने से जुड़ी है। एक परेशानी मेडिकल बिलिंग की व्यवस्था भी है।

कई अस्पताल पूरे इलाज का एक पैकेज बिल बनाते हैं। इसमें हर मेडिकल सामान की अलग जानकारी नहीं होती। सरकार के पास भी सभी सामान की खरीद कीमत का पर्याप्त डेटा नहीं है। अधिकारियों को आशंका है कि सामान की कीमत सीमित करने पर दूसरी फीस बढ़ाई जा सकती है।

उदाहरण के लिए अस्पताल सर्जन की फीस बढ़ा सकते हैं। अस्पतालों ने भी अपनी वित्तीय परेशानियां बताई हैं। उनका कहना है कि बीमा कंपनियों और सरकारी योजनाओं से भुगतान में देरी होती है। इन्हीं कारणों से पूरे अस्पताल बिल को नियंत्रित करना आसान नहीं है।

सरकार अब क्या कदम उठाएगी?

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया है कि ज्यादा मार्जिन गंभीर समस्या है। सरकार संबंधित पक्षों से बातचीत करके उचित कदम उठाने पर विचार कर रही है। इसके लिए मेडिकल सामान की कीमतों से जुड़ा डेटा जुटाना जरूरी बताया गया है।

सरकार को यह भी देखना होगा कि किन सामानों पर कितना मार्जिन लिया जा रहा है। इसके बाद कीमतों पर नियंत्रण और बिलिंग नियमों की समीक्षा की जा सकती है। फिलहाल मेडिकल सामान की कीमतों पर व्यापक नियंत्रण का अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।

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मरीज अस्पताल के बिल में क्या जांचें?

मरीजों और उनके परिवारों को अस्पताल का बिल ध्यान से जांचना चाहिए। अस्पताल से दवाओं और मेडिकल सामान का अलग-अलग विवरण मांगा जा सकता है। दवाओं का नाम और उनकी मात्रा जरूर देखें। दवा की MRP और बिल में दर्ज कीमत का मिलान करें।

मरीज एनपीपीए के फार्मा सही दाम पोर्टल पर भी दवाओं की कीमत जांच सकते हैं। अगर किसी दवा की कीमत सरकारी सीमा से ज्यादा लगती है तो सबूत संभालकर रखें। दवा की पैकिंग और अस्पताल का बिल सुरक्षित रखना जरूरी है। इनके आधार पर संबंधित प्राधिकरण से शिकायत की जा सकती है।

मरीजों को राहत कैसे मिलेगी?

अस्पतालों में ज्यादा मार्जिन का सीधा असर मरीजों की जेब पर पड़ता है। सरकार ने इस समस्या को स्वीकार कर लिया है। अब चुनौती इससे निपटने के प्रभावी नियम बनाने की है। दवाओं की कीमत नियंत्रित करना और पूरे इलाज का बिल नियंत्रित करना अलग बातें हैं।

मरीजों को राहत देने के लिए अस्पतालों की बिलिंग में पारदर्शिता जरूरी है। मरीज को पता होना चाहिए कि उससे किस सामान के कितने पैसे लिए गए हैं। इससे अनावश्यक खर्च की पहचान करने में मदद मिल सकती है। सरकार के सामने मरीजों को महंगे इलाज से बचाने की चुनौती है। साथ ही अस्पतालों की वास्तविक लागत को भी ध्यान में रखना होगा।

FAQs

  1. अस्पतालों में दवाओं की कीमतें क्यों ज्यादा होती हैं?
    अस्पताल दवा कंपनियों से बड़ी मात्रा में दवाएं खरीदते हैं, जिन पर उन्हें बड़ा ट्रेड मार्जिन मिलता है। इसके परिणामस्वरूप, दवाएं मरीजों को मैक्सिमम रिटेल प्राइस पर बेची जाती हैं, जिससे कीमतें 170% से 700% तक बढ़ जाती हैं।
  2. सरकार ने अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था पर क्या कहा है?
    सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया है कि अस्पतालों में दवाओं और मेडिकल सामान पर ज्यादा मार्जिन एक गंभीर समस्या है। इसके समाधान के लिए संबंधित पक्षों से बातचीत की जा रही है और कीमतों पर नियंत्रण के उपायों पर विचार किया जा रहा है।
  3. मरीजों को अस्पताल के बिल में क्या जांचना चाहिए?
    मरीजों को अस्पताल का बिल ध्यान से जांचना चाहिए और दवाओं तथा मेडिकल सामान का अलग-अलग विवरण मांगा जाना चाहिए। उन्हें दवाओं के नाम, मात्रा और उनकी एमआरपी की तुलना बिल में दर्ज कीमत से करनी चाहिए।
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