गरुड़ कमांडो को मिलेंगे हाई-टेक माइक्रो UAV, सीमा पर दुश्मन की खैर नहीं

Anjali Dwivedi | Apr 19, 2026, 18:18 IST
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iaf garud force micro uav
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भारतीय वायुसेना की गरुड़ स्पेशल फोर्स के लिए 16 हजार 400 फीट की ऊंचाई पर काम करने वाले माइक्रो UAV खरीदे जा रहे हैं। यह ड्रोन -20 से 50 डिग्री तापमान में दुश्मन पर नजर रखेगा।

दुनियाभर में बढ़ते तनाव और मिडिल ईस्ट के संकट को देखते हुए भारत अपनी सुरक्षा मजबूत कर रहा है। भारतीय वायु सेना (IAF) ने अपनी जांबाज गरुड़ स्पेशल फोर्स की ताकत बढ़ाने का बड़ा फैसला लिया है।

इन कमांडो के लिए अब अत्याधुनिक माइक्रो यूएवी (Micro UAV) सिस्टम खरीदे जाएंगे। सरकार ने इसकी आधिकारिक प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। यह कदम दुश्मनों पर पैनी नजर रखने में काफी मददगार साबित होगा।

आसमान से नजर, जमीन पर प्रहार

यह हाई-टेक ड्रोन कोई मामूली डिवाइस नहीं है। इसे खासतौर पर उन दुर्गम पहाड़ी इलाकों और बर्फीली चोटियों के लिए तैयार किया गया है, जहां इंसानों का पहुंचना मुश्किल होता है।

यह 16 हजार 400 फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरने में सक्षम है। इसका मतलब है कि हिमालय की ऊंची वादियों में छिपे दुश्मन की हर हरकत अब गरुड़ कमांडो की नजरों से बच नहीं पाएगी।

Micro UAV हर तापमान करेगा काम

इस Micro UAV की सबसे बड़ी खूबी इसकी सहनशक्ति है। अधिकारियों के मुताबिक, यह सिस्टम माइनस 20 डिग्री की हाड़ कंपाने वाली ठंड से लेकर 50 डिग्री सेल्सियस की भीषण गर्मी में भी पूरी सटीकता के साथ काम करेगा। चाहे रेगिस्तान की तपती रेत हो या सियाचिन जैसी बर्फीली ऊंचाइयां, यह ड्रोन हर मौसम में रियल-टाइम सिचुएशनल अवेयरनेस प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है।

रक्षा मंत्रालय का मास्टर प्लान

रक्षा मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (RFI) जारी कर दी है। यह ड्रोन इतना कॉम्पैक्ट और हल्का होगा कि महज दो लोगों की टीम इसे कहीं भी ले जा सकती है और ऑपरेट कर सकती है। इसमें वर्टिकल टेक-ऑफ और लैंडिंग की सुविधा है, यानी इसे उड़ाने के लिए किसी रनवे की जरूरत नहीं होगी। साथ ही, इसका कम्युनिकेशन पूरी तरह एन्क्रिप्टेड होगा, जिसे दुश्मन हैक नहीं कर पाएगा।

GPS के बिना भी करेगा

इस यूएवी की मिशन रेंज 15 किलोमीटर है और यह एक बार में कम से कम 60 मिनट तक हवा में रह सकता है। सबसे खास बात यह है कि अगर किसी इलाके में GPS काम नहीं कर रहा हो, तब भी यह ड्रोन भारतीय नेविगेशन सिस्टम IRNSS से जुड़कर अपना काम जारी रखेगा।

इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड पेलोड लगे होंगे, जो दिन के उजाले और रात के घने अंधेरे में भी साफ तस्वीरें खींचने में सक्षम हैं।

60% स्वदेशी तकनीक अनिवार्य

यह प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत मिशन को बड़ी मजबूती देगा। सरकार ने शर्त रखी है कि इस सिस्टम में कम से कम 60% स्वदेशी कंटेंट होना अनिवार्य है। इससे भारतीय स्टार्टअप्स और MSMEs को न सिर्फ बढ़ावा मिलेगा, बल्कि रक्षा क्षेत्र में विदेशी निर्भरता भी कम होगी। यह कदम घरेलू रक्षा उद्योग के लिए एक गेम-चेंजर साबित होने वाला है।

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