शायद ही जानते होंगे जगन्नाथ पुरी के चमत्कारी रहस्य, जानें क्या है सबसे बड़ा राज
Kaushiki | Jul 04, 2026, 14:20 IST
Jagannath Rath Yatra Secrets
ओडिशा के पुरी में विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई 2026 से शुरू हो रही है। इस मंदिर में हर 12 साल में भगवान की मूर्तियां बदलने की अनोखी परंपरा है जिसे नवकलेवर कहते हैं। जानिए इस प्रथा और धड़कते ब्रह्म पदार्थ से जुड़ा गहरा रहस्य।
Puri Jagannath Temple Mystery: भारत में उड़ीसा के पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा बहुत ज्यादा प्रसिद्ध है। हर साल लाखों भक्त इस पावन यात्रा में शामिल होने आते हैं। इस साल यह विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा आगामी 16 जुलाई से शुरू होगी। भक्त पूरे साल इस खास दिन का बेसब्री से इंतजार करते हैं।
मान्यता है कि जो भी इस पवित्र रथ यात्रा में शामिल होता है उसे मोक्ष मिलता है। उसे जीवन के सभी दुखों से मुक्ति मिल जाती है। लेकिन पुरी के इस पावन मंदिर से जुड़े कई ऐसे गहरे रहस्य भी हैं। ये रहस्य आज भी पूरी दुनिया के लोगों को हैरान कर देते हैं।
पुरी का यह पावन धाम दुनिया का इकलौता ऐसा अनोखा मंदिर माना जाता है। जहां भगवान की लकड़ी की अधूरी मूर्तियां स्थापित की गई हैं। इन मूर्तियों को हर 12 साल में पूरी तरह से बदल दिया जाता है। कभी-कभी यह बदलाव 19 साल के लंबे अंतराल पर भी होता है।
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मूर्तियों को बदलने की इस बेहद महत्वपूर्ण परंपरा को नवकलेवर नाम दिया गया है। नवकलेवर का सीधा और सरल अर्थ नया शरीर होता है। इस प्राचीन परंपरा के तहत पुरानी मूर्तियों की जगह नई मूर्तियां रखी जाती हैं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां बदली जाती हैं।
साथ ही सुदर्शन जी की मूर्ति को भी नया रूप दिया जाता है। चूंकि ये सभी मूर्तियां खास नीम की लकड़ी से बनी होती हैं। लकड़ी से बने होने के कारण समय के साथ इनके खंडित होने की आशंका रहती है। इसीलिए तय समय पर इन्हें बदलने का नियम बनाया गया है।
नवकलेवर अनुष्ठान की सबसे बड़ी और खास बात इसकी गोपनीयता मानी जाती है। मूर्तियां बदलते समय पूरे पुरी शहर की बिजली काट दी जाती है। चारों तरफ पूरी तरह से सिर्फ घना और गहरा अंधेरा कर दिया जाता है। इस गुप्त प्रक्रिया को कोई भी बाहर का इंसान नहीं देख सकता।
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भगवान की ये सुंदर मूर्तियां बनाने के लिए नीम की लकड़ी चुनते हैं। इन विशेष पेड़ों का चयन मंदिर के मुख्य पुजारी स्वयं करते हैं। इसके लिए कई कड़े नियमों का पालन करना बहुत जरूरी माना जाता है।
मान्यता है कि वह नीम का पेड़ करीब सौ साल पुराना हो। उस पेड़ में किसी भी प्रकार का कोई दोष या बीमारी नहीं होनी चाहिए। पेड़ को काटने से पहले उसकी पूरी विधि से पूजा होती है। यह अनोखी परंपरा आस्था और गहरे रहस्यों का एक बहुत सुंदर संगम है।
यही बातें इस पावन जगन्नाथ धाम को सबसे विशेष बनाती हैं। पंचांग के अनुसार जब आषाढ़ महीने में अधिकमास यानी मलमास पड़ता है। यानी जिस साल कैलेंडर में आषाढ़ के दो महीने आते हैं। उसी विशेष साल में यह नवकलेवर उत्सव पूरे नियम से मनाया जाता है। आमतौर पर यह समय 12 से 19 साल का होता है।
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मूर्तियों को बदलने के दौरान सबसे रहस्यमयी घटना ब्रह्म पदार्थ की होती है। इसे पुरानी मूर्ति से निकालकर नई मूर्ति में डाला जाता है। जिस रात यह बेहद पवित्र काम होता है तब बड़ा अनुष्ठान किया जाता है। पूरे मंदिर परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जाते हैं। मंदिर के सबसे मुख्य पुजारी इस गुप्त कार्य को अकेले पूरा करते हैं।
काम शुरू करने से पहले उनकी दोनों आंखों पर पट्टी बांधते हैं। पुजारी के हाथों में भी मोटे कपड़े के दस्ताने अच्छी तरह लपेटते हैं। ताकि वे उस गुप्त पदार्थ को सीधे छू या देख न सकें। इसके बाद वे पुरानी मूर्ति के सीने से ब्रह्म पदार्थ बाहर निकालते हैं।
फिर उसे बहुत ही सावधानी से नई मूर्ति में रख देते हैं। यह प्रक्रिया पूरी तरह से बिना देखे और सिर्फ महसूस करके की जाती है। इस दौरान मंदिर के अंदर कोई दूसरा इंसान नहीं जा सकता।
यह सेवा करने वाले पुजारियों ने अपने अनुभव के बारे में बताया है। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी भी उस पदार्थ को देखा नहीं है। लेकिन जब भी वे उसे अपने हाथों में लेते हैं तो हैरान रह जाते हैं। उन्हें महसूस होता है कि उनके हाथ में कुछ धड़क रहा है।
यह धड़कन बिल्कुल किसी जीवित इंसान के दिल की तरह महसूस होती है। धार्मिक मान्यता है कि यह साक्षात भगवान श्री कृष्ण का हृदय है। माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण का वह पावन हृदय आज भी धड़कता है।
इसी वजह से इसे बहुत ही ज्यादा पवित्र माना जाता है। रथ यात्रा के दौरान तीनों भगवान भव्य और बड़े रथों पर सवार होते हैं। वे मुख्य श्रीमंदिर से अपनी मौसी के घर गुंडीचा मंदिर जाते हैं। यह पूरी रथ यात्रा कुल मिलाकर 9 दिनों तक बड़े स्तर पर चलती है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया से यह शुरू होती है।
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इस महापर्व के पहले दिन तीनों देव विशाल रथों में सवार होते हैं। वे अपने भाई-बहन के साथ मौसी के घर प्रस्थान करते हैं। अगले सात दिनों तक सभी देवता गुंडीचा मंदिर में ही विश्राम करते हैं। इस दौरान वहां मौजूद लाखों श्रद्धालुओं को दर्शन दिए जाते हैं।
नौवें दिन इस भव्य उत्सव की वापसी यात्रा शुरू की जाती है। इस वापसी की यात्रा को धार्मिक भाषा में बहुड़ा यात्रा कहते हैं। बहुड़ा यात्रा के साथ ही सभी देव अपने मुख्य मंदिर वापस लौटते हैं। लाखों श्रद्धालु पूरी श्रद्धा से भगवान के रथों की रस्सियां खींचते हैं।
माना जाता है कि भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच सड़क पर आते हैं। वे उन लोगों को दर्शन देते हैं जो मंदिर नहीं जा पाते।इस साल यह रथ यात्रा 16 जुलाई दिन गुरुवार से शुरू होगी। इसके बाद यह उत्सव 24 जुलाई को बहुड़ा यात्रा के साथ पूरा होगा।
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इस यात्रा की सबसे अनोखी परंपरा नए रथ बनाने की मानी जाती है। भगवान के तीनों रथ हर साल पूरी तरह नए बनाए जाते हैं। इन रथों के निर्माण का काम अक्षय तृतीया के पावन दिन शुरू होता है। इसके लिए फासी और धौरा जैसी खास लकड़ियां लाते हैं।
पीढ़ियों से खास कारीगर इस बड़ी जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं। रथ बनाते समय सभी शास्त्रीय नियमों का पालन किया जाता है। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष कहलाता है जिसमें कुल 16 पहिए होते हैं। बड़े भाई बलभद्र का रथ तालध्वज कहलाता है जिसमें 14 पहिए हैं।
माता सुभद्रा का रथ दर्पदलन कहलाता है जिसमें कुल 12 पहिए होते हैं। तीनों रथों का आकार और सजावट एक-दूसरे से बिल्कुल अलग होती है। इन विशाल रथों को पूरी तरह तैयार करने में करीब दो महीने लगते हैं। यह सुंदर कलाकारी देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।
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श्री जगन्नाथ मंदिर मेंरथ यात्रा शुरू होने से पहले एक बहुत ही अनोखा अनुष्ठान होता है। इस खास और प्रसिद्ध अनुष्ठान को छेरा पहंरा कहा जाता है। इसमें पुरी के गजपति महाराज स्वयं सोने की झाड़ू लेकर आते हैं। वे भगवान के तीनों भव्य रथों की अच्छी तरह सफाई करते हैं।
सफाई करने के बाद वे रथों पर पवित्र सुगंधित जल का छिड़काव करते हैं। यह सुंदर परंपरा समाज को एक बहुत बड़ा और जरूरी संदेश देती है। यह बताती है कि भगवान के सामने राजा और रंक सब बराबर हैं।
ईश्वर की नजर में सभी इंसान सिर्फ उनके सेवक (जगन्नाथ मंदिर का रत्न भंडार)मात्र ही हैं। वापसी के बाद भगवान का बहुत ही प्रसिद्ध सुना बेश उत्सव होता है। इस उत्सव में भगवान को शुद्ध सोने के भारी आभूषण पहनाए जाते हैं। अंत में नीलाद्रि बीजे अनुष्ठान के साथ भगवान फिर मंदिर में जाते हैं। सदियों पुरानी यह भव्य परंपरा आज भी वैसी ही बनी हुई है।
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मान्यता है कि जो भी इस पवित्र रथ यात्रा में शामिल होता है उसे मोक्ष मिलता है। उसे जीवन के सभी दुखों से मुक्ति मिल जाती है। लेकिन पुरी के इस पावन मंदिर से जुड़े कई ऐसे गहरे रहस्य भी हैं। ये रहस्य आज भी पूरी दुनिया के लोगों को हैरान कर देते हैं।
पुरी का यह पावन धाम दुनिया का इकलौता ऐसा अनोखा मंदिर माना जाता है। जहां भगवान की लकड़ी की अधूरी मूर्तियां स्थापित की गई हैं। इन मूर्तियों को हर 12 साल में पूरी तरह से बदल दिया जाता है। कभी-कभी यह बदलाव 19 साल के लंबे अंतराल पर भी होता है।
अब जगन्नाथ पुरी धाम में होंगे कतार में खड़े होकर दर्शन - Now Queue System Applied In Darshan Of Puri's Jagannath Temple In Odisha - Amar Ujala Hindi News Live
क्या होती है नवकलेवर की प्रथा
साथ ही सुदर्शन जी की मूर्ति को भी नया रूप दिया जाता है। चूंकि ये सभी मूर्तियां खास नीम की लकड़ी से बनी होती हैं। लकड़ी से बने होने के कारण समय के साथ इनके खंडित होने की आशंका रहती है। इसीलिए तय समय पर इन्हें बदलने का नियम बनाया गया है।
नवकलेवर अनुष्ठान की सबसे बड़ी और खास बात इसकी गोपनीयता मानी जाती है। मूर्तियां बदलते समय पूरे पुरी शहर की बिजली काट दी जाती है। चारों तरफ पूरी तरह से सिर्फ घना और गहरा अंधेरा कर दिया जाता है। इस गुप्त प्रक्रिया को कोई भी बाहर का इंसान नहीं देख सकता।
न बजेंगे घंटे न होगा शंखनाद... पुरी के जगन्नाथ धाम में खामोशी क्यों? - puri jagannath temple rath yatra anasara vidhan 15 days darshan closed ntcpvp - AajTak
नीम के पेड़ों का चुनाव कैसे होता है
मान्यता है कि वह नीम का पेड़ करीब सौ साल पुराना हो। उस पेड़ में किसी भी प्रकार का कोई दोष या बीमारी नहीं होनी चाहिए। पेड़ को काटने से पहले उसकी पूरी विधि से पूजा होती है। यह अनोखी परंपरा आस्था और गहरे रहस्यों का एक बहुत सुंदर संगम है।
यही बातें इस पावन जगन्नाथ धाम को सबसे विशेष बनाती हैं। पंचांग के अनुसार जब आषाढ़ महीने में अधिकमास यानी मलमास पड़ता है। यानी जिस साल कैलेंडर में आषाढ़ के दो महीने आते हैं। उसी विशेष साल में यह नवकलेवर उत्सव पूरे नियम से मनाया जाता है। आमतौर पर यह समय 12 से 19 साल का होता है।
Jagannath Rath Yatra 2026 Date: पुरी रथ यात्रा कब शुरू होगी? भाई-बहन के साथ मौसी के घर जाते हैं भगवान जगन्नाथ, जानें तारीख और मुहूर्त - News18 हिंदी
क्या है धड़कते ब्रह्म पदार्थ का रहस्य
काम शुरू करने से पहले उनकी दोनों आंखों पर पट्टी बांधते हैं। पुजारी के हाथों में भी मोटे कपड़े के दस्ताने अच्छी तरह लपेटते हैं। ताकि वे उस गुप्त पदार्थ को सीधे छू या देख न सकें। इसके बाद वे पुरानी मूर्ति के सीने से ब्रह्म पदार्थ बाहर निकालते हैं।
फिर उसे बहुत ही सावधानी से नई मूर्ति में रख देते हैं। यह प्रक्रिया पूरी तरह से बिना देखे और सिर्फ महसूस करके की जाती है। इस दौरान मंदिर के अंदर कोई दूसरा इंसान नहीं जा सकता।
पुजारियों को होता है एक अद्भुत अहसास
यह धड़कन बिल्कुल किसी जीवित इंसान के दिल की तरह महसूस होती है। धार्मिक मान्यता है कि यह साक्षात भगवान श्री कृष्ण का हृदय है। माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण का वह पावन हृदय आज भी धड़कता है।
इसी वजह से इसे बहुत ही ज्यादा पवित्र माना जाता है। रथ यात्रा के दौरान तीनों भगवान भव्य और बड़े रथों पर सवार होते हैं। वे मुख्य श्रीमंदिर से अपनी मौसी के घर गुंडीचा मंदिर जाते हैं। यह पूरी रथ यात्रा कुल मिलाकर 9 दिनों तक बड़े स्तर पर चलती है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया से यह शुरू होती है।
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नौ दिनों के महापर्व में कब क्या होता है
नौवें दिन इस भव्य उत्सव की वापसी यात्रा शुरू की जाती है। इस वापसी की यात्रा को धार्मिक भाषा में बहुड़ा यात्रा कहते हैं। बहुड़ा यात्रा के साथ ही सभी देव अपने मुख्य मंदिर वापस लौटते हैं। लाखों श्रद्धालु पूरी श्रद्धा से भगवान के रथों की रस्सियां खींचते हैं।
माना जाता है कि भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच सड़क पर आते हैं। वे उन लोगों को दर्शन देते हैं जो मंदिर नहीं जा पाते।इस साल यह रथ यात्रा 16 जुलाई दिन गुरुवार से शुरू होगी। इसके बाद यह उत्सव 24 जुलाई को बहुड़ा यात्रा के साथ पूरा होगा।
Jagannath Rath Yatra 2024: जगन्नाथ रथ यात्रा से पहले होती है सोने की झाड़ू से सफाई, जानें इसके पीछे का कारण - gold broom ritual on jagannath rath yatra 2024 know the significance
हर साल क्यों बनते हैं नए रथ
पीढ़ियों से खास कारीगर इस बड़ी जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं। रथ बनाते समय सभी शास्त्रीय नियमों का पालन किया जाता है। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष कहलाता है जिसमें कुल 16 पहिए होते हैं। बड़े भाई बलभद्र का रथ तालध्वज कहलाता है जिसमें 14 पहिए हैं।
माता सुभद्रा का रथ दर्पदलन कहलाता है जिसमें कुल 12 पहिए होते हैं। तीनों रथों का आकार और सजावट एक-दूसरे से बिल्कुल अलग होती है। इन विशाल रथों को पूरी तरह तैयार करने में करीब दो महीने लगते हैं। यह सुंदर कलाकारी देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।
Jagannath Rath Yatra 2025:रथ यात्रा में क्यों की जाती है सोने की झाड़ू से सफाई? जानिए इसका धार्मिक महत्व - Jagannath Rath Yatra 2025 Spiritual Significance Of Golden Broom Is Used For
राजा खुद सोने की झाड़ू से करते हैं सफाई
सफाई करने के बाद वे रथों पर पवित्र सुगंधित जल का छिड़काव करते हैं। यह सुंदर परंपरा समाज को एक बहुत बड़ा और जरूरी संदेश देती है। यह बताती है कि भगवान के सामने राजा और रंक सब बराबर हैं।
ईश्वर की नजर में सभी इंसान सिर्फ उनके सेवक (जगन्नाथ मंदिर का रत्न भंडार)मात्र ही हैं। वापसी के बाद भगवान का बहुत ही प्रसिद्ध सुना बेश उत्सव होता है। इस उत्सव में भगवान को शुद्ध सोने के भारी आभूषण पहनाए जाते हैं। अंत में नीलाद्रि बीजे अनुष्ठान के साथ भगवान फिर मंदिर में जाते हैं। सदियों पुरानी यह भव्य परंपरा आज भी वैसी ही बनी हुई है।
FAQ
- भगवान जगन्नाथ की मूर्ति को हर 12 साल में क्यों बदला जाता है?
जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियां खास नीम की लकड़ी से बनी होती हैं। समय के साथ लकड़ी के खंडित होने की संभावना रहती है। इसीलिए नवकलेवर परंपरा के तहत हर 12 से 19 साल के बीच इन पुरानी मूर्तियों को बदलकर नई मूर्तियां स्थापित की जाती हैं। - जगन्नाथ मंदिर के नवकलेवर अनुष्ठान में ब्रह्म पदार्थ का क्या रहस्य है?
मूर्तियों को बदलते समय पुरानी मूर्ति से ब्रह्म पदार्थ निकालकर नई मूर्ति में रखा जाता है। इस दौरान पूरे शहर की बिजली काट दी जाती है। पुजारियों के अनुसार इसे हाथ में लेने पर यह किसी जीवित दिल की तरह धड़कता हुआ महसूस होता है। - साल 2026 में जगन्नाथ रथ यात्रा कब शुरू होगी और यह कितने दिन चलती है?
साल 2026 में जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई दिन गुरुवार से शुरू होने जा रही है। यह भव्य और पावन धार्मिक उत्सव कुल 9 दिनों तक चलता है। आगामी 24 जुलाई को बहुड़ा यात्रा यानी वापसी यात्रा के साथ इस उत्सव का समापन होगा।
इस साल कब से शुरू होगी भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा, जानें इस यात्रा का महत्व
पुरी जगन्नाथ मंदिर में बिना कुकर कैसे बनता है महाप्रसाद, एक चूल्हे पर रखे जाते हैं 7 बर्तन
जगन्नाथ यात्रा से देवशयनी एकादशी तक, जुलाई में आएंगे ये बड़े व्रत और त्योहार
महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ को आया बुखार, अब 15 दिन एकांतवास में गए प्रभु
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