भूपेंद्र यादव टीम पर एक्शन तो सचिव जवाबदेह क्यों नहीं, अशोक खेमका का बड़ा सवाल
Jageshwar prasad | Jul 12, 2026, 08:12 IST
भूपेंद्र यादव के 4 सहायक हटे, पर्यावरण सचिव पर क्यों नहीं एक्शन? अशोक खेमका ने उठाए सवाल
पूर्व आईएएस अशोक खेमका ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव की टीम पर एक्शन को लेकर कुछ सवाल उठाए हैं।उन्होंने इस एक्शन को अरावली से जोड़ा है। उन्होंने कहा कि जवाबदेही अधूरी नहीं रहनी चाहिए।
समझें क्या है पूरा मामला
- पूर्व आईएएस अशोक खेमका ने भूपेंद्र यादव टीम पर एक्शन को लेकर सवाल उठाया।
- उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को अरावली से जोड़ा है, जिसकी नई परिभाषा तय की गई।
- रिटायर्ड आईएएस ने कहा, कार्रवाई सिर्फ मंत्री के स्टाफ तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
- पूछा, उस सचिव को क्यों रहना चाहिए, जिसने अरावली पर बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट दी।
- कहा, अरावली पर लचर कानून से खनन और रियल एस्टेट लॉबी को लाभ की आशंका।
पूर्व सीनियर आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने इस कार्रवाई को लेकर सोशल मीडिया पर एक बड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने इस मामले को अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा से जोड़ा है।
खेमका ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा है कि भ्रष्टाचार पर जीरो टोलरेंस संदेश को सही अर्थों में लागू किया जा रहा है तो एक्शन केवल मंत्री के स्टाफ तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए।
पर्यावरण सचिव के खिलाफ एक्शन क्यों नहीं?
उन्होंने लिखा कि पर्यावरण मंत्री के स्टाफ के खिलाफ यह कार्रवाई भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस है तो पर्यावरण मंत्रालय का सचिव को भी जवाबदेह बनाना चाहिए।
उन्होंने पूछा कि वह सचिव क्यों बचा रहना चाहिए, जिसके नेतृत्व वाली समिति ने सुप्रीम कोर्ट में अरावली पर बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।
Swift action against the personal staff of the Environment Minister reinforces the PM’s zero-tolerance message on corruption. But… @PMOIndia 1/2
— Ashok Khemka (@AshokKhemka_IAS) July 10, 2026
खनन और रियल एस्टेट लॉबी को फायदा पहुंचाने की आशंका
खेमका ने आशंका जताई कि इस लचर रिपोर्ट का सीधा फायदा खनन और रियल एस्टेट से जुड़े बड़े हितों या माफियाओं को मिल सकता है।
अरावली क्षेत्र दिल्ली-एनसीआर समेत कई राज्यों के लिए महत्वपूर्ण पर्यावरणीय सुरक्षा कवच है। वहां होने वाला अवैध खनन और अनियंत्रित निर्माण हमेशा से विवादों और अदालती कार्रवाइयों के केंद्र में रहा है।
खेमका ने लिखा कि जवाबदेही आधी अधूरी नहीं रुक सकती। उनका सीधा इशारा इस बात पर है कि यदि मंत्रियों के निजी स्टाफ पर कार्रवाई हो सकती है तो नीतिगत फैसले लेने वाले बड़े अधिकारियों को ढील क्यों दी जा रही है?
प्रशासनिक हलकों में मची हलचल
जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट में बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट जमा करना सिर्फ तकनीकी भूल नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है, ताकि बाद में कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाया जा सके।
क्या है स्टाफ हटाने का मामला?
अचानक हुए इस बदलाव की वजह प्रशासनिक बताई गई है, लेकिन यह किसी गंभीर आंतरिक विषय की ओर इशारा करता है। यह फैसला 3 जुलाई को अलग-अलग सरकारी आदेश जारी करके लिया गया।
इस मामले की खबरें चार जुलाई को पीएम नरेंद्र मोदी के राजस्थान दौरे के बाद मीडिया में आई। अभी तक हटाने की असल वजह सामने नहीं आई है। लेकिन, चार करीबी लोगों पर एक्शन केंद्रीय मंत्री के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
दो अधिकारी मूल विभाग भेजे, दो की छुट्टी
अतिरिक्त निजी सहायक आयुष शरण और सहायक निजी सहायक सिद्धार्थ यादव को टर्मिनेट किया गया है। मंत्री की च्वॉइस पर नियुक्त हुए ये दोनों लोग उनके महत्वपूर्ण काम संभालते थे।
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