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महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का निधन
महाराष्ट्र के बारामती में हुए विमान क्रैश में उपमुख्यमंत्री अजित पवार की मौत हो गई है। जैसे ही यह खबर आई, महाराष्ट्र की राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई।
अजित पवार की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में रही, जिनके शायद ही कोई दुश्मन होंगे। चाहे पार्टी कोई हो, और नेता कहीं का हो, उनके हमेशा अच्छे रिश्ते रहे। यही वजह है कि उनके निधन के बाद विरोधी दलों के नेता भी उन्हें अजातशत्रु कहकर सम्मानित कर रहे हैं।
अजित पवार का संघर्षपूर्ण सफर
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अजित पवार ने अपने राजनीतिक करियर में कई अहम मंत्री पद संभाले हैं।
जून 1991 से नवंबर 1992 तक, वह कृषि और बिजली के राज्य मंत्री रहे थे।
नवंबर 1992 से फरवरी 1993 तक, जल आपूर्ति, बिजली और योजना राज्य मंत्री बने थे।
अक्टूबर 1999 से जुलाई 2004 तक, वह सिंचाई और बागवानी मंत्री रहे थे।
जुलाई 2004 से नवंबर 2004 तक, उन्होंने ग्रामीण विकास, जल आपूर्ति और स्वच्छता, और सिंचाई मंत्री के रूप में भी काम किया था।
नवंबर 2004 से नवंबर 2009 तक, वह जल संसाधन मंत्री रहे (कृष्णा घाटी सिंचाई को छोड़कर), साथ ही जल संसाधन और स्वच्छता विभाग भी देखे।
नवंबर 2009 से नवंबर 2010 तक, वह जल संसाधन मंत्री रहे (कृष्णा घाटी और कोंकण सिंचाई को छोड़कर) और ऊर्जा मंत्री भी थे।
नवंबर 2010 से सितंबर 2012 तक, वह उपमुख्यमंत्री बने। वित्त, योजना और ऊर्जा विभाग की जिम्मेदारी भी संभाली थी।
दिसंबर 2012 से सितंबर 2014 तक, उन्होंने फिर से उपमुख्यमंत्री का पद संभाला। वित्त, योजना और ऊर्जा विभाग की जिम्मेदारी उठाई।
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जब अपने चाचा के खिलाफ की बगावत
अजित पवार के लिए साल 2019 उनका राजनीतिक करियर के लिहाज से बहुत नाटकीय रहा। उन्होंने अपने चाचा और पार्टी के प्रमुख शरद पवार के खिलाफ पहली बार खुलकर बगावत की थी। अजित पवार ने बीजेपी से अप्रत्याशित गठबंधन किया और देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाने के लिए उनका समर्थन किया। इसके बाद खुद उपमुख्यमंत्री बन गए। लेकिन तीन दिन बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया और बीजेपी सरकार से समर्थन वापस ले लिया। इससे फडणवीस को भी इस्तीफा देना पड़ा।
फिर दिसंबर 2019 में, अजित पवार अपने चाचा के साथ लौटे और उद्धव ठाकरे के महा विकास अघाड़ी गठबंधन के साथ उपमुख्यमंत्री बनकर सरकार में फिर से शामिल हो गए। ये कदम उनके लिए एनसीपी में अपनी स्थिति को फिर से मजबूत करने और अपनी पकड़ बनाए रखने की रणनीति थी।
फिर जुलाई 2023 में, महा विकास अघाड़ी सरकार गिरने के बाद अजित पवार ने एक बार फिर अपने चाचा के खिलाफ बगावत की। इसके बाद उनकी पार्टी में बटवारा हो गया। अजित पवार बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना सरकार में शामिल हो गए।
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2024 का लोकसभा और विधानसभा चुनाव
2024 के लोकसभा चुनाव में अजित पवार ने अपने चाचा की छाया से बाहर निकलने की कोशिश की, और ये कोशिश किसी बड़ी मुसीबत से कम नहीं रही। पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा करने के बावजूद, वो सिर्फ एक सीट ही जीत सके। सवाल उठने लगा था कि क्या 65 साल के अजित पवार महाराष्ट्र की सख्त राजनीति में अकेले टिक पाएंगे? हालांकि, राजनीतिक पंडितों ने उन्हें पूरी तरह से खारिज नहीं किया था।
जब बीजेपी, शिवसेना और NCP के महायुति गठबंधन ने 2024 का विधानसभा चुनाव लड़ा, तब अजित पवार को बहुत कम आंका जा रहा था। कई लोगों ने तो उन्हें पहले ही खारिज कर दिया था। लेकिन जब नतीजे आए, तो अजित पवार ने सबको चौंका दिया।
महायुति गठबंधन को शानदार सफलता मिली, और ये जीत सिर्फ एकनाथ शिंदे या देवेन्द्र फडणवीस की नहीं, बल्कि अजित पवार की भी थी। 41 सीटों के साथ अजित पवार ने साबित कर दिया कि वह अकेले भी जनता को अपने पक्ष में लाने की ताकत रखते हैं।
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