पूरे भारत में मेडिकल लूट का बड़ा खुलासा: 11 रुपए की दवा मिल रही 325 में, मरीज परेशान
Amresh Kushwaha | Sept 16, 2026, 14:15 IST
ऐसे बढ़ता है अस्पतालों का बिल!
FDA के सर्वे में अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले मेडिकल सामान की ट्रेड प्राइस और MRP में भारी अंतर मिला। यहां 11 रुपए का IV सेट 325 रुपए में बिकता मिला। FDA प्रमुख तुकाराम मुंढे ने साफ गाइडलाइन बनाने की सिफारिश NPPA को भेजी है।
समझें क्या है पूरा मामला...
- एफडीए ने अस्पतालों में मेडिकल सामान की कीमतों का सर्वे किया।
- सर्वे में ट्रेड प्राइस और MRP के बीच भारी अंतर मिला।
- IV सेट सिर्फ 11 रुपए का, लेकिन MRP 325 रुपए तय थी।
- मरीज इलाज के दौरान इन सामानों का विकल्प नहीं चुन सकता।
- FDA ने कीमतों पर साफ गाइडलाइन बनाने की सिफारिश की है।
क्या मिला सर्वे में
महाराष्ट्र एफडीए के प्रमुख तुकाराम मुंढे ने यह आंकड़े सोशल मीडिया पर साझा किए हैं। उनके मुताबिक कई मेडिकल प्रोडक्ट्स की खरीद कीमत और उन पर छपी एमआरपी में बड़ा फासला है। उन्होंने कुछ उदाहरण भी सामने रखे। यह आंकड़े अस्पतालों में मरीजों से वसूली जाने वाली रकम पर सीधे सवाल खड़े करते हैं।
कितना बड़ा है अंतर
एक कैथेटर की भी हालत ऐसी ही मिली। इसकी ट्रेड प्राइस 29.41 रुपए थी। लेकिन इस पर छपी एमआरपी 310 रुपए थी। यानी कई मेडिकल सामान की खरीद कीमत और एमआरपी में कई गुना का फर्क सामने आया। यह फर्क सिर्फ एक-दो प्रोडक्ट तक सीमित नहीं है।
मरीज के पास विकल्प नहीं
The most expensive part of a hospital bill may never touch the hospital at all.
A patient admitted for care has no way of knowing whether the price on a medical consumable reflects its actual cost or a markup fixed long before it ever reached the ward. That gap in information…
— Tukaram Mundhe (@Tukaram_IndIAS) September 15, 2026
क्यों होता है यह अंतर
मौजूदा नियम में खामी
FDA ने क्या सुझाव दिया
सिफारिश का मकसद क्या है
मरीजों के लिए क्या मतलब
आगे क्या होगा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शी कीमत व्यवस्था लागू होने से मरीजों का भरोसा भी बढ़ेगा। अस्पताल और मेडिकल कंपनियों को भी अपनी प्राइसिंग साफ रखनी होगी। इससे लंबे समय में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में जवाबदेही बढ़ने की उम्मीद है। यह मामला सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश के अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था के लिए एक मिसाल बन सकता है।
अभी तक ज्यादातर मरीज बिल में लिखी रकम को ही अंतिम सच मानते हैं। उन्हें यह पता नहीं होता कि कीमत तय करने का पूरा तरीका कितना अस्पष्ट है। ऐसे में जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है जितना नियम बनाना। मरीज संगठन और उपभोक्ता समूह भी इस मुद्दे पर आवाज उठा सकते हैं। आने वाले समय में यह सर्वे स्वास्थ्य नीति में बड़े बदलाव की नींव बन सकता है।
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