नालसार यूनिवर्सिटी विवाद: BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने छात्रों से मांगी माफी
Manya Jain | Aug 16, 2026, 13:06 IST
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नालसार यूनिवर्सिटी विवाद में BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने छात्रों से माफी मांगी। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद छात्रों के नामांकन पर लगी रोक का फैसला वापस लिया गया।
NALSAR यूनिवर्सिटी हैदराबाद विवाद में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने छात्रों से माफी मांगी है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद यह कदम उठाया गया। विवाद CJI सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में बुलाए जाने के विरोध से शुरू हुआ था। BCI ने पहले छात्रों के नामांकन पर रोक लगा दी थी। भारी विरोध के बाद बीसीआई ने अपना फैसला वापस ले लिया।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कानून के छात्रों को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने साफ कहा कि छात्रों को अपने विचार व्यक्त करने की पूरी आजादी होनी चाहिए।
मिश्रा ने लिखा कि अगर इस विवाद से जुड़े उनके किसी शब्द या पत्र से छात्रों की भावनाओं को ठेस पहुंची हो, तो वे इसके लिए खेद व्यक्त करते हैं और माफी मांगते हैं। उन्होंने आगे कहा कि खेद जताना अहंकार का विषय नहीं है। यह इस बात की स्वीकारोक्ति है कि छात्रों की भावनाएं और चिंताएं मायने रखती हैं।
यह विवाद हैदराबाद के नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च यानी नालसार (NALSAR – National Academy of Legal Studies and Research) के दीक्षांत समारोह से जुड़ा है। इस समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी सीजेआई (CJI – Chief Justice of India) सूर्यकांत को आमंत्रित किया गया था।
इस निमंत्रण के विरोध में विश्वविद्यालय के 450 से अधिक छात्रों ने प्रशासन को एक ज्ञापन सौंपा था। छात्रों ने 20 जुलाई के संसद मार्च के दौरान पुलिस की कथित ज्यादतियों पर चिंता जताई थी। उन्होंने कुछ हालिया न्यायिक घटनाक्रमों पर भी सवाल उठाए थे।
इस विरोध के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी बीसीआई (BCI – Bar Council of India) ने 13 अगस्त को एक कड़ा आदेश जारी किया। इसमें राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया गया कि वे नालसार के 2026 बैच के छात्रों का नामांकन वकील के रूप में न करें। साथ ही विरोध के पीछे के लोगों की पहचान के लिए जांच के आदेश भी दिए गए।
बीसीआई के इस फैसले के बाद देशभर में तीखी आलोचना शुरू हुई। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बीसीआई के कदम को पूरी तरह अनावश्यक बताया।
कोर्ट ने कहा कि छात्रों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि बीसीआई या राज्य बार काउंसिल के इशारे पर नालसार के छात्रों या फैकल्टी के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
भारी विरोध और अदालती फटकार के बाद बीसीआई ने अपना फैसला बदल दिया। नामांकन पर लगी रोक हटा ली गई और पूरी कार्यवाही बंद कर दी गई।
इस पूरे मामले ने बीसीआई के अधिकारों पर भी बड़े सवाल खड़े किए हैं। एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत किसी भी व्यक्ति को बार में नामांकित करने का प्राथमिक अधिकार राज्य बार काउंसिलों के पास होता है, सीधे बीसीआई के पास नहीं।
चूंकि नालसार के छात्र अभी वकील के रूप में पंजीकृत ही नहीं हुए थे, इसलिए उनके नामांकन पर सामूहिक रोक लगाने के फैसले को अवैध और अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया गया।
राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बीसीआई अध्यक्ष के इस्तीफे की मांग भी तेज हो गई है। कॉकरोच जनता पार्टी के सह-संयोजक सौरव दास ने मनन कुमार मिश्रा से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की मांग की है। एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी बीसीआई और मिश्रा की भूमिका पर तीखे सवाल उठाए हैं।
अपने पत्र के अंत में मनन कुमार मिश्रा ने छात्रों से इस विवाद को संवाद और आपसी सम्मान के जरिए सुलझाने की अपील की है। उन्होंने उम्मीद जताई कि मामले को राजनीतिक या बाहरी रंग नहीं दिया जाएगा।
उन्होंने कहा कि देश के कानून के छात्र बेहद समझदार और स्वतंत्र सोच रखने वाले नागरिक हैं। वे किसी भी बाहरी प्रभाव के बिना तथ्यों के आधार पर अपना स्वतंत्र निर्णय लेने में पूरी तरह सक्षम हैं।
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मिश्रा ने पत्र में क्या लिखा
मिश्रा ने लिखा कि अगर इस विवाद से जुड़े उनके किसी शब्द या पत्र से छात्रों की भावनाओं को ठेस पहुंची हो, तो वे इसके लिए खेद व्यक्त करते हैं और माफी मांगते हैं। उन्होंने आगे कहा कि खेद जताना अहंकार का विषय नहीं है। यह इस बात की स्वीकारोक्ति है कि छात्रों की भावनाएं और चिंताएं मायने रखती हैं।
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद
इस निमंत्रण के विरोध में विश्वविद्यालय के 450 से अधिक छात्रों ने प्रशासन को एक ज्ञापन सौंपा था। छात्रों ने 20 जुलाई के संसद मार्च के दौरान पुलिस की कथित ज्यादतियों पर चिंता जताई थी। उन्होंने कुछ हालिया न्यायिक घटनाक्रमों पर भी सवाल उठाए थे।
इस विरोध के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी बीसीआई (BCI – Bar Council of India) ने 13 अगस्त को एक कड़ा आदेश जारी किया। इसमें राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया गया कि वे नालसार के 2026 बैच के छात्रों का नामांकन वकील के रूप में न करें। साथ ही विरोध के पीछे के लोगों की पहचान के लिए जांच के आदेश भी दिए गए।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि छात्रों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि बीसीआई या राज्य बार काउंसिल के इशारे पर नालसार के छात्रों या फैकल्टी के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
भारी विरोध और अदालती फटकार के बाद बीसीआई ने अपना फैसला बदल दिया। नामांकन पर लगी रोक हटा ली गई और पूरी कार्यवाही बंद कर दी गई।
अधिकार क्षेत्र पर उठे सवाल
चूंकि नालसार के छात्र अभी वकील के रूप में पंजीकृत ही नहीं हुए थे, इसलिए उनके नामांकन पर सामूहिक रोक लगाने के फैसले को अवैध और अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया गया।
इस्तीफे की मांग तेज
मिश्रा की छात्रों से अपील
उन्होंने कहा कि देश के कानून के छात्र बेहद समझदार और स्वतंत्र सोच रखने वाले नागरिक हैं। वे किसी भी बाहरी प्रभाव के बिना तथ्यों के आधार पर अपना स्वतंत्र निर्णय लेने में पूरी तरह सक्षम हैं।
एक्सपर्ट कोट्स
- मनन कुमार मिश्रा, अध्यक्ष, बार काउंसिल ऑफ इंडिया: "यदि इस विवाद से जुड़े मेरे किसी भी शब्द या पत्र से हमारे कानून के छात्रों की भावनाओं को ठेस पहुंची है, तो मैं इसके लिए ईमानदारी से खेद व्यक्त करता हूं और माफी मांगता हूं।"
FAQ
- NALSAR विवाद क्या है?
यह विवाद CJI सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बुलाए जाने के विरोध से शुरू हुआ। 450 से अधिक छात्रों ने इसका विरोध किया था। - BCI ने क्या कार्रवाई की थी?
BCI ने राज्य बार काउंसिलों को नालसार के 2026 बैच के छात्रों का नामांकन रोकने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद यह रोक हटा ली गई। - मनन कुमार मिश्रा ने क्या कहा?
मिश्रा ने छात्रों से माफी मांगी और कहा कि उन्हें अपने विचार व्यक्त करने की पूरी आजादी होनी चाहिए। उन्होंने विवाद को राजनीतिक रंग न देने की अपील भी की।
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