संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भारतीय भाषाओं पर जताई चिंता, कहा- भूल रहे अपनी मातृभाषा

Manish Kumar | Nov 30, 2025, 23:51 IST
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mohan bhagwat on language india
Photograph: (The Sootr)

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भारतीय भाषाओं और संस्कृत के संरक्षण पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आजकल लोग अपनी मातृभाषा भूलते जा रहे हैं और साधु भी अंग्रेजी बोल रहे हैं। भागवत ने भारतीय संस्कृति और भाषा की रक्षा करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

NAGPUR. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने भारतीय भाषाओं के प्रति अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि एक समय था जब संस्कृत संचार का प्रमुख माध्यम हुआ करती थी। अब हालात यह हो गए हैं कि अमेरिकी प्रोफेसर संस्कृत पढ़ा रहे हैं, जबकि हमें खुद संस्कृत का प्रचार करना चाहिए था। ये बातें उन्होंने नागपुर में एक किताब के विमोचन के मौके पर कहीं।

मातृभाषा की उपेक्षा

भागवत ने यह भी बताया कि वर्तमान में कई बच्चे संस्कृत के बुनियादी शब्द भी नहीं जानते हैं और घर पर हिंदी और अंग्रेजी का मिश्रण बोलते हैं। उन्होंने यह कहा कि अगर हम घर पर अपनी मातृभाषा ठीक से बोलें तो इस स्थिति को सुधारा जा सकता है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम अपनी भाषाओं के प्रति असंवेदनशील हो गए हैं।

साधु-संत भी कर रहे अंग्रेजी में बात

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इस पर भी ध्यान आकर्षित किया कि आजकल साधु-संत भी अंग्रेजी में फर्राटेदार बात करते हैं। उन्होंने इस बदलाव को समझा, लेकिन इसे भारतीय भाषाओं के प्रति नजरिए में बदलाव के रूप में देखा। उनके मुताबिक, भारतीय संस्कृति और भाषा का संरक्षण करना जरूरी है, और इसके लिए भाषाओं के प्रति सही दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
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कल्पवृक्ष और भाषा की सीमाएं

भागवत ने उदाहरण देते हुए बताया कि अंग्रेजी में कुछ भारतीय शब्दों और अवधारणाओं का अनुवाद करना मुश्किल होता है। जैसे कल्पवृक्ष (इच्छापूर्ति करने वाला वृक्ष) का अंग्रेजी में अनुवाद नहीं किया जा सकता। यह सांस्कृतिक रूप से समृद्ध अवधारणाओं के विदेशी भाषाओं में अनुवाद की सीमा को दर्शाता है।

भारतीय भाषाओं का संरक्षण जरूरी

भागवत ने कहा कि भारतीय भाषाओं को संरक्षित करने की आवश्यकता है। अंग्रेजी में कई भारतीय अवधारणाओं का अनुवाद ठीक से नहीं किया जा सकता, और इससे हमारी सांस्कृतिक धरोहर और विचारों की गहराई को खोने का खतरा है। यही कारण है कि भारतीय भाषाओं का संरक्षण करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय भाषाओं का संरक्षण केवल एक भाषाई जरूरत नहीं, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हम अपनी मातृभाषाओं को पूरी तरह से अपनाएं और उनका प्रचार करें, तो हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को बचा सकते हैं।

संस्कृत के महत्व पर दिया जोर

संघ प्रमुख के मुताबिक, भारतीय भाषाओं के ज्ञान की स्थिति बहुत खराब हो चुकी है। संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा का अध्ययन अब विदेशी लोग कर रहे हैं, जबकि भारत में ही यह भाषा सिमटती जा रही है। यह भारत के लिए चिंता का विषय है क्योंकि संस्कृत भारतीय संस्कृति और दर्शन का मूल है।

भागवत ने नागरिकों से आह्वान किया कि वे भारतीय भाषाओं को सीखें और उनका प्रचार करें। उन्होंने यह भी कहा कि अगर हम अपने घरों में अपनी भाषाओं का सही इस्तेमाल करें, तो हमारी भाषाओं की स्थिति में सुधार हो सकता है।

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