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भारत जैसे देश में अक्सर राजनीति और समाज की जड़ें जाति में सिमटी नजर आती हैं। वहीं महाराष्ट्र के अहिल्यानगर (पूर्व में अहमदनगर) जिले के एक छोटे से गांव सौंदाला ने इतिहास रच दिया है। इस गांव ने खुद को आधिकारिक तौर पर देश का पहला 'जाति मुक्त गांव' घोषित कर दिया है। यहां अब न कोई ब्राह्मण, न राजपूत और ना ही कोई दलित है। यहां हर व्यक्ति की पहचान सिर्फ भारतीय है।
एक कुएं से शुरू हुई क्रांति की कहानी
यह बदलाव कई साल पहले महाराष्ट्र के सोलापुर के पोथरे गांव में शुरू हुआ था। 68 साल के सामाजिक कार्यकर्ता प्रमोद झिंजाड़े ने बचपन में देखा था, जब दलितों को ऊपर से पानी पिलाया जाता था। उस भेदभाव ने उनके अंदर बदलाव की ख्वाहिश जगा दी। जब वे जवान हुए तो उन्होंने दलितों के लिए अलग कुआं बनवाया।
इत्तेफाक देखिए, जब अगले साल मराठवाड़ा में भीषण सूखा (Drought) पड़ा, तो गांव के सारे कुएं सूख गए। वहीं, दलित बस्ती का वह कुआं लबालब भरा था। प्यास ने सदियों पुरानी ऊंच-नीच की दीवार गिरा दी और सवर्ण भी उसी कुएं पर पानी भरने पहुंचे। पानी की उसी एक बूंद ने समानता का पाठ पढ़ाया।
हेरवाड़ पैटर्न से मिली सौंदाला को प्रेरणा
झिंजाड़े ने महात्मा फुले समाज सेवा मंडल के जरिए विधवाओं के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ मुहिम छेड़ी। कोल्हापुर के हेरवाड़ गांव ने जब विधवा प्रथा खत्म करने का प्रस्ताव पारित किया, तो इसे हेरवाड़ पैटर्न कहा गया। इसी सफलता से उत्साहित होकर झिंजाड़े ने महाराष्ट्र के सरपंचों को पत्र लिखकर जाति मुक्त ग्राम बनाने का आह्वान (Call to Action) किया।
गांव के लिए 5 फरवरी बना ऐतिहासिक दिन
सौंदाला गांव के सरपंच शरद बाबूराव अरगड़े ने इस चुनौती को अपने हाथ में लिया। 5 फरवरी 2026 को गांव में एक खास ग्रामसभा बुलाई गई। इस सभा के दौरान, रक्तदान शिविर के साथ-साथ, गांव वालों ने एकजुट होकर अपनी जाति छोड़ने का संकल्प लिया। इसमें कई ठोस नियम बनाए गए, जो इस प्रकार हैं...
सरनेम की जगह भारतीय: स्कूल रजिस्ट्रेशन में बच्चों के जातिसूचक सरनेम की जगह पिता का नाम या भारतीय लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
एक पंगत, एक समाज: किसी भी त्योहार या उत्सव में अब अलग-अलग टोलियां नहीं, बल्कि एक ही पंगत होगी।
समान अधिकार: मंदिर हो या सार्वजनिक कुआं, हर ग्रामीण का हक बराबर होगा।
गालियों पर जुर्माना और विधवा विवाह की मिसाल
सौंदाला में अनुशासन (Discipline) कोई नई बात नहीं है। 2008 से सरपंच रहे शरद अरगड़े ने गांव में गाली- गलौज पर जुर्माना लगाने का नियम बनाया था। अब तक 13 लोगों को इस नियम के तहत दंडित किया जा चुका है। इसके अलावा, गांव में विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा दिया जाता है। साथ ही, लड़कियों की शादी पर ग्रामसभा 5 हजार रुपए की मदद भी देती है।
जिलाधिकारी ने इसे सच्चा लोकतंत्र बताया...
अहिल्यानगर के जिलाधिकारी डॉ. पंकज आशिया ने इस पहल को सच्चा लोकतंत्र बताया है। हालांकि, सरकारी दस्तावेजों में जाति प्रमाण पत्र और आरक्षण जैसी संवैधानिक व्यवस्थाओं के बीच इसे लागू करना थोड़ी चुनौतीपूर्ण है। लेकिन जैसा प्रमोद झिंजाड़े कहते हैं कि प्रशासनिक पहचान से कहीं ज्यादा जरूरी है कि हम मानसिक रूप से जाति मुक्त हों।
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