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सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर आरक्षण की सीमाओं और सामाजिक वर्गीकरण को लेकर बहस छिड़ गई है। मामला पसमांदा मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC की श्रेणी में शामिल करने का है।
सुप्रीम कोर्ट ने पसमांदा मुसलमान वाली याचिका पर विचार करते समय कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी समुदाय को आरक्षण की सूची में जोड़ना अदालतों का नहीं है। यह काम सरकार और संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।
क्या हम कानून बनाना शुरू कर दें?
सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने पसमांदा मुसलमानों के लिए OBC के बराबर आरक्षण की मांग की, तो जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने पूछा कि क्या आप हमसे नया कानून बनाने की उम्मीद कर रहे हैं? पीठ ने यह भी कहा कि अदालत का काम मौजूदा कानूनों की व्याख्या करना है, न कि किसी विशेष श्रेणी को आरक्षण देने का आदेश देना है।
क्या दूसरों की कीमत पर प्रमोशन चाहिए: SC
सोमवार को हुई सुनवाई में याचिकाकर्ता मोहम्मद वसीम सैफी की ओर से वरिष्ठ वकील अंजना प्रकाश ने अपनी दलीलें पेश कीं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने हैरानी जताते हुए पूछा कि यह मांग केवल एक विशेष वर्ग के लिए ही क्यों की जा रही है?
कोर्ट ने तल्ख लहजे में सवाल किया कि क्या आप दूसरे गरीब मुसलमानों की कीमत पर खुद (पसमांदा) को प्रमोट करना चाहते हैं? कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या आपके पास कोई ठोस आंकड़े हैं कि पिछड़ा वर्ग से कितने मुसलमान आते हैं?
सिर्फ सामाजिक नहीं, आर्थिक आधार भी जरूरी
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि पसमांदा मुसलमान समुदाय सबसे ज्यादा सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा है। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि ओबीसी का दर्जा तय करने के लिए केवल सामाजिक स्थिति नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति भी जरूरी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी नई जाति को आरक्षण की लिस्ट में डालना अदालत का काम नहीं है।
कोर्ट ने मांगे पुख्ता आंकड़े
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को फिलहाल खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को होमवर्क करने की सलाह दी है। पीठ ने कहा कि यदि आप चाहते हैं कि इस मामले पर गंभीरता से विचार हो, तो पर्याप्त आंकड़े लेकर आएं। यह साबित करना होगा कि पसमांदा मुसलमान वाकई आरक्षण का लाभ पाने के हकदार हैं। अब इस मामले की अगली सुनवाई 4 हफ्ते बाद तय की गई है।
कौन हैं पसमांदा मुसलमान?
पसमांदा एक फारसी शब्द है, जिसका मतलब है जो पीछे छूट गया है। इसे मुसलमानों में वंचित तबकों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पसमांदा मुसलमान शब्द का पहला इस्तेमाल 1998 में अली अनवर अंसारी ने किया था।
उन्होंने पसमांदा मुस्लिम महाज की स्थापना की थी। उस वक्त पसमांदा को दलितों में शामिल किया गया था। वहीं, सभी पसमांदा दलित नहीं होते हैं। वे ओबीसी और अनुसूचित जातियों में भी हो सकते हैं।
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