25 साल से पहाड़ी पर अकेला रहता है एक परिवार, कुदरत ही है इनका सहारा

तेलंगाना के भद्राद्री कोतागुडेम में एक आदिवासी परिवार 25 साल से जंगल में अकेला रह रहा है। बिजली और फोन के बिना इनके जीवन की क्या कहानी है। आइए जानें...

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Kaushiki
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आज की भागदौड़ भरी दुनिया जहां 5G इंटरनेट और स्मार्ट सिटी के पीछे भाग रही है, वहीं तेलंगाना के एक घने जंगल में वक्त थम सा गया है। तेलंगाना के भद्राद्री कोतागुडेम के घने जंगलों में एक टाइम कैप्सूल जैसा परिवार बसता है। यहां इस ऊंची पहाड़ी पर रेड्डैया नाम का एक आदिवासी अपने परिवार के साथ रहता है।

ये परिवार यहां पिछले 25 वर्षों से अकेले रह रहा है। यहां न बिजली के तार पहुंचे हैं और न ही मोबाइल के सिग्नल। फिर भी इस परिवार की रूह इसी जंगल में बसती है। सोचिए बिना बिजली, बिना फोन और बिना किसी सरकारी सुविधा के इनका जीवन सितारों की रोशनी के भरोसे चल रहा है।

शहर की चकाचौंध को ठुकराकर इस परिवार ने प्रकृति की गोद को ही अपना संसार बना लिया है। इस परिवार के अटूट हठ और मिट्टी के प्रति उनके प्रेम में प्रशासन की भी हर कोशिश नाकाम रही है। आइए तेलंगाना के इस अनोखे परिवार के बारे में जानें...

गुरुगुंटला रेड्डैया अपनी पत्नी लक्ष्मी और बेटे गंगिरेड्डी के साथ

एक उजड़ा हुआ गांव और एक अडिग परिवार

आज भी इस पहाड़ी पर गोगुलापुडी नाम का एक छोटा सा गांव नजर आता है। यहां कभी 40 परिवार साथ रहते थे। साल 1990 में प्रशासन ने इन परिवारों को सुविधाओं का वास्ता देकर नीचे बसने के लिए मनाना शुरू किया।

साल 2000 तक 39 परिवार नीचे पुनर्वास कॉलोनी में चले गए। लेकिन गुरुगुंटला रेड्डैया ने अपनी मिट्टी छोड़ने से साफ इनकार कर दिया। प्रशासन इन परिवारों को सुविधाओं का वास्ता देकर नीचे बसने के लिए मना कर देते हैं।

अधिकतर परिवार नीचे पुनर्वास कॉलोनी में चले गए हैं। लेकिन गुरुगुंटला रेड्डैया अपनी मिट्टी छोड़ने से साफ इनकार कर देते हैं। उनके साथ उनकी पत्नी लक्ष्मी और बेटा गंगिरेड्डी भी वहीं रहते हैं।

लक्ष्मी बताती हैं कि उन्हें कुछ समय से देखने में दिक्कत होती है

सितारों की रोशनी और अलाव की गर्माहट ही इनका सहारा

जब पत्रकारों ने लक्ष्मी से पूछा कि वे बिना बिजली के कैसे रहती हैं, तो उनका जवाब बहुत भावुक था। उन्होंने कहा, "दिन में सूरज का तेज है और रात में चांद-तारों की शीतल चांदनी।"

सर्दियों की लंबी रातों में यह परिवार अलाव जलाकर जंगली जानवरों और अंधेरे से मुकाबला करता है। लक्ष्मी को आज की तारीख या समय का अंदाजा नहीं है। वे बस कुदरत के संकेतों को ही समझती हैं।

लक्ष्मी बताती हैं कि उनके पति और बेटे कभी जंगल से नीचे कॉलोनी में नहीं जाते हैं लेकिन वो जाती हैं

बेटी से मिलने पहाड़ी से नीचे उतरती हैं लक्ष्मी

जहां रेड्डैया और उनका बेटा जंगल की गहराइयों से बाहर कदम नहीं रखते। वहीं लक्ष्मी इस परिवार और बाहरी दुनिया के बीच एक मजबूत कड़ी बनी हुई हैं।

लक्ष्मी अपनी बेटी से मिलने अक्सर पहाड़ी से नीचे उतरती हैं। इसी दौरान उन्होंने अपना आधार और राशन कार्ड भी बनवाया है। वे कहती हैं कि रिश्तेदारों से मिलने और राशन लाने के लिए वे नीचे जाती हैं।

लेकिन उनके पति और बेटे का मन इसी मिट्टी में रमा है। उनके पति का कहना है कि उनका जन्म इसी जंगल में हुआ है। वे अंतिम सांस भी यहीं लेना चाहते हैं।

परिवार के पास कुल पांच झोपड़ियां हैं

जंगल ही हमारा डॉक्टर है

इस परिवार ने जंगल में कुल पांच झोपड़ियां बनाई हैं। ये झोपड़ियां उनकी छोटी सी सल्तनत की तरह हैं। एक झोपड़ी में पिता, एक में मां और एक में बेटा अलग-अलग रहते हैं।

बाकी दो झोपड़ियां मुर्गियों, उनके वफादार कुत्ते और जलावन की लकड़ियों के लिए बनाई गई हैं। बीमारी होने पर ये शहर नहीं भागते, बल्कि पेड़ों के फलों और पत्तों से अपनी दवा खुद तैयार करते हैं। गंगिरेड्डी गर्व से कहते हैं, "हमें बुखार का डर नहीं, जंगल ही हमारा डॉक्टर है।"

रेड्डैया को जानने वाले लोगों का कहना है कि अगर उन्हें (रेड्डैया) जंगल से बाहर लाया भी गया तो शांति से नहीं रह पाएंगे

जंगल में ही मिलनी चाहिए सुविधाएं 

इलाके के शिक्षित युवाओं और अधिकारियों का मानना है कि रेड्डैया को जबरदस्ती नीचे लाना उनके मानसिक शांति के लिए ठीक नहीं होगा। गोगुलपुडी के लोग सुझाव देते हैं कि सरकार को उनकी झोपड़ी पर टीन की शेड, सोलर लाइट और सुरक्षा के लिए बाड़ लगा देनी चाहिए।

वन विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि उनकी मर्जी के बिना उन्हें हटाया नहीं जा सकता। अब कोशिश यह है कि जंगल के इस अंतिम किले को उजाड़ने के बजाय, उन्हें वहीं बुनियादी सुविधाएं देकर उनके हक का सम्मान किया जाए।

ये इलाका तेलंगाना के अश्वरावुपेटा मंडल और आंध्र प्रदेश के बुट्टायगुडेम मंडल की सीमा पर स्थित है

अनजान चेहरों को देख जंगल में छिपता है परिवार

पिछले 25 सालों से अकेले रह रहे इस आदिवासी परिवार (आदिवासी अधिकार) की खबर जब से फैली है, प्रशासन और मीडिया की हलचल बढ़ गई है। लेकिन ये शोर रेड्डैया के लिए डर का कारण बन गया है। रेड्डैया के मन में एक गहरा डर बैठ गया है कि कोई अधिकारी आकर उन्हें जबरन ले जाएगा।

इसी डर से वे दिनभर जंगल में छिपे रहते हैं। वे किसी अनजान चेहरे को देखते ही जंगल की गहराइयों में छिप जाते हैं और बाहर नहीं आते।

सूरज ढलने के बाद ही अपनी झोपड़ी लौटते हैं। लक्ष्मी बताती हैं कि अनजान लोगों को देखकर उनके पति इतने घबरा जाते हैं कि कभी-कभी डर के मारे पत्थर भी फेंकने लगते हैं।

भद्राद्री कोठागुडेम (TELANGANA) के वन अधिकारी किष्टा गौड़ कहते हैं कि किसी को उसकी मर्जी के बिना जंगल से बाहर नहीं लाया जा सकता। समाज के लोग सुझाव दे रहे हैं कि इस परिवार को जबरन हटाने के बजाय वहां सोलर लाइट जैसी कुछ बुनियादी सुविधाएं दी जानी चाहिए।

जड़ों से जुड़े रहने की अनूठी मिसाल

प्रकृति और परंपराओं का यह संगम हमें सिखाता है कि सुकून सिर्फ सुविधाओं में नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने में है। प्रशासन को चाहिए कि वह इस परिवार के हठ को चुनौती देने के बजाय, उनकी पसंद का सम्मान करते हुए वहीं बुनियादी सहायता पहुंचाए। ये कहानी आधुनिकता की दौड़ के बीच अपनी पहचान और मिट्टी के प्रति अटूट वफादारी की एक बेमिसाल दास्तान है।

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