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NEWS IN SHORT
आजकल युवाओं के लिए सफलता का पैमाना गतिशीलता है, न कि अपना घर।
रेंटल लाइफस्टाइल अब एक सोच बन गई है, सिर्फ मजबूरी नहीं।
भारत का रेंटल फर्नीचर बाजार 30 हजार करोड़ रुपए का है।
2030 तक रेंटल इकोनॉमी 63 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच सकती है।
युवाओं में रिश्तों में भी 'पहले आजमाओ' की मानसिकता बढ़ रही है।
NEWS IN DETAIL
आजकल 20 से 35 साल के युवाओं का जीवन अब पहले जैसा नहीं है। अब सफलता का पैमाना 'अपना घर' या 'अपनी कार' नहीं, बल्कि गतिशीलता (Mobility) और विकल्पों की उपलब्धता है। महानगरों में रेंटल लाइफस्टाइल (Rental Lifestyle) अब सिर्फ आर्थिक मजबूरी नहीं, बल्कि एक सोच बन गई है। यह लाइफस्टाइल अब एक आदत बन रही है। लोग अब स्टेबिलिटी की बजाय फ्लेक्सिबल रहने को प्रायोरिटी दे रहे हैं। घर खरीदने का बोझ कम करना और यात्रा के मौके ढूंढना युवाओं की नई सोच का हिस्सा बन गया है। रेंटल लाइफस्टाइल एक कमर्शियल और सोशल बदलाव का प्रतीक है।
मालिकाना हक पर भारी पड़ती 'टेम्पररी फैसिलिटी'
नाइट फ्रैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में अब युवा लॉन्ग टर्म निवेश के बजाय सब्सक्रिप्शन मॉडल को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण है 'वर्क-फ्रॉम-एनीवेयर' और बार-बार बदलती नौकरियां। जब करियर में स्थिरता की कोई गारंटी नहीं है, तो युवा भारी-भरकम फर्नीचर या संपत्तियों (houserentallowance) के बोझ में खुद को नहीं बांधना चाहते।
उनके लिए यह तरीका ज्यादा आसान और सुविधाजनक है, क्योंकि इसमें लंबे समय की कमिटमेंट नहीं होती।
ग्राफिक से समझें...
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फर्नीचर और गैजेट: अब सोफे से लेकर लैपटॉप तक किराए पर उपलब्ध हैं।
को-लिविंग स्पेस: सामुदायिक जीवन और कम जिम्मेदारी।
कार-स्कूटर सब्सक्रिप्शन: रखरखाव और इंश्योरेंस के झंझट से मुक्ति।
बाजार के बढ़ते आंकड़े
रेंटल इकोनॉमी अब सिर्फ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक बड़ी आर्थिक ताकत बन रही है। ग्रैंड व्यू रिसर्च (2022) के मुताबिक, भारत का रेंटल फर्नीचर बाजार लगभग 30 हजार करोड़ रुपये का है। यह आंकड़ा दिखाता है कि रेंटल फर्नीचर का व्यापार (trend) तेजी से बढ़ रहा है। खासकर शहरी क्षेत्रों में लोग अब किराये पर फर्नीचर लेने में रुचि दिखा रहे हैं। यह एक बड़ा बदलाव है, जो पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
2030 तक की राह
अनुमान है कि 2030 तक यह बाजार बढ़कर63 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगा। वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 6 लाख करोड़रुपए को पार कर चुका है। यह बताता है कि दुनिया भर में न्यूनतावादी सोच (Minimalist approach) और संसाधनों के साझा उपयोग का महत्व बढ़ रहा है। कम सामान का मतलब है कम जिम्मेदारी और कम मानसिक बोझ, जो युवाओं को अधिक स्वतंत्र महसूस कराता है।
रिश्तों में भी 'पहले आजमाओ' की मानसिकता
रेंटल मानसिकता अब सिर्फ चीजों तक नहीं रही, बल्कि रिश्तों में भी आ रही है। मनोवैज्ञानिक जीन ट्वेंगे और प्यू रिसर्च सेंटर की एक स्टडी के अनुसार, 18-29 साल के युवा अब किसी भी स्थायी रिश्ते में बंधने से पहले म्यूच्यूअल कम्पेटिबिलिटी को परखना चाहते हैं। वे पहले एक दूसरे के साथ की स्थिति और समझदारी को देखना चाहते हैं। यह बदलाव एक नई सोच को बताता है, जहां स्टेबिलिटी से पहले सहजता और तालमेल पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है।
फ्रीडम वर्सेज स्टेबिलिटी
आजकल युवा अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नियंत्रण को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। वे रिश्तों में भी वही 'सब्सक्रिप्शन' मॉडल चाहते हैं। इसमें वे अपनी शर्तों पर रिश्ते शुरू कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर बिना किसी परेशानी के बाहर भी निकल सकते हैं। इसलिए 'डेटिंग ऐप्स' और 'रेंट-ए-फ्रेंड' जैसे कॉन्सेप्ट्स बहुत पॉपुलर हो रहे हैं। यह एक नया तरीका है, जहां लोग अपनी स्वतंत्रता के साथ रिश्तों को अपनी शर्तों पर अपनाते हैं।
क्या यह बदलाव स्थायी है?
रेंटल इकोनॉमी ने आज के युवाओं को एक नई ताकत दी है। अब वे किसी चीज़ को खरीदे बिना उसे अनुभव कर सकते हैं। यह 'एक्सेस ओवर ओनरशिप' का युग (Indian Youth) है। इस सोच में, मालिकाना हक की जगह चीज़ों तक पहुंच को महत्व दिया जा रहा है। लेकिन, यह सवाल अब भी बना हुआ है कि यह समाजिक और आर्थिक स्थिरता को कैसे प्रभावित करेगा।
IMP FACTS
आजकल के युवाओं के लिए सफलता का पैमाना 'अपना घर' नहीं, बल्कि गतिशीलता और विकल्पों की उपलब्धता है।
महानगरों में रेंटल लाइफस्टाइल अब एक सोच बन गई है, न कि केवल आर्थिक मजबूरी।
भारत का रेंटल फर्नीचर बाजार 2022 में लगभग 30 हजार करोड़ रुपए का है।
रेंटल इकोनॉमी 2030 तक बढ़कर 63 हजार करोड़ रुपए तक पहुंचने की संभावना है।
युवाओं में 'पहले आजमाओ' की मानसिकता रिश्तों में भी देखने को मिल रही है।
KNOWLEDGE
रेंटल लाइफस्टाइल और 'एक्सेस ओवर ओनरशिप' का ट्रेंड सच में नया है। यह युवाओं को स्वतंत्रता और लचीलापन देता है। लेकिन इसका एक बड़ा सवाल यह है कि क्या यह भविष्य में स्थिरता (life style) और आर्थिक सुरक्षा को प्रभावित करेगा। यह सोच सही हो सकती है क्योंकि इससे कम जिम्मेदारी और मानसिक बोझ मिलता है। लेकिन लंबे समय में स्टेबिलिटी की कमी हो सकती है। जो लोग स्थिरता चाहते हैं, उन्हें यह संस्कृति ठीक नहीं लगेगी। इससे समाज में अस्थिरता भी आ सकती है। खासकर जब करियर और रिश्तों में स्टेबिलिटी की कमी हो।
ALERTS
रेंटल लाइफस्टाइल अपनाते समय अपनी फाइनेंसियल स्टेबिलिटी को प्राथमिकता देना जरूरी है।
लंबे समय के लिए कमिटमेंट से बचने के कारण आर्थिक सुरक्षा को नजरअंदाज न करें।
सामूहिक जीवन और कम जिम्मेदारी की सोच से रिश्तों में स्थिरता की कमी हो सकती है।
'सब्सक्रिप्शन मॉडल' अपनाने से पहले अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जिम्मेदारियों का ध्यान रखें।
'एक्सेस ओवर ओनरशिप' को स्वीकार करते समय मानसिक और भावनात्मक बोझ को हल्का करने पर ध्यान दें।
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