हर तीन साल में आती है अधिक मास की पूर्णिमा, भगवान विष्णु को ऐसे करें प्रसन्न
Kaushiki | May 29, 2026, 13:00 IST
Adhik Maas Purnima
साल 2026 में ज्येष्ठ अधिकमास की पूर्णिमा का बड़ा धार्मिक महत्व है। इस बार पूर्णिमा तिथि 30 और 31 मई को रहेगी। भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की पूजा के लिए यह दिन बेहद खास है। जानिए व्रत का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और दान का महत्व।
Adhik Maas Purnima 2026: हिंदू धर्म में हर तीन साल में आने वाली अधिकमास की पूर्णिमा का बहुत बड़ा धार्मिक महत्व है। साल 2026 में ज्येष्ठ अधिकमास की पूर्णिमा तिथि 30 और 31 मई को दो दिनों तक रहने वाली है। इस वजह से लोगों में व्रत की सही तारीख को लेकर थोड़ा भ्रम बना हुआ है।
शास्त्रों के मुताबिक, जो लोग पूर्णिमा का व्रत रखते हैं, वे 30 मई शनिवार को व्रत करेंगे। वहीं पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य का कार्य 31 मई रविवार को उदयातिथि में करना सबसे उत्तम रहेगा। आइए पंडित संतोष शर्मा के मुताबिक जानें ज्येष्ठ पूर्णिमा की सही तिथि....
हिंदू पंचांग के मुताबिक, इस बार पूर्णिमा तिथि दो दिनों तक रहने वाली है। पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 30 मई 2026 को सुबह 11:57 बजे से होगी। इसका समापन अगले दिन 31 मई 2026 को दोपहर 02:14 बजे होगा।
शास्त्रों में दोनों दिनों का अपना अलग महत्व है। अगर आप पूर्णिमा का व्रत रखते हैं, तो आपको 30 मई शनिवार को व्रत रखना चाहिए। इस रात को ही आकाश में पूर्णिमा का पूरा चंद्रमा मौजूद रहेगा।
शनिवार शाम को चंद्रोदय का समय 07:36 बजे निश्चित किया गया है। जो लोग पूर्णिमा पर पवित्र नदियों में स्नान और दान करते हैं, वे 31 मई को यह काम करेंगे। रविवार को उदयातिथि होने के कारण स्नान-दान के लिए यह दिन सबसे उत्तम और फलदायी माना गया है।
![full moon of Adhikamas]()
धार्मिक पुराणों के मुताबिक, अधिकमास की पूर्णिमा को सर्वसिद्धिदायिनी तिथि कहा जाता है। मान्यता है कि, इस दिन पर किए गए जप, तप और दान का पुण्य कभी खत्म नहीं होता।
इस महीने के स्वामी स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु यानी पुरुषोत्तम हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन लक्ष्मी-नारायण की पूजा करने से घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती। परिवार में सुख और समृद्धि हमेशा बनी रहती है।
इसके साथ ही कुंडली के चंद्र दोष को दूर करने के लिए यह सबसे अच्छा दिन है। पूर्णिमा को चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से पूर्ण होता है। इस दिन चंद्र पूजा से मानसिक तनाव से पूरी मुक्ति मिलती है।
सत्यनारायण-लक्ष्मी जी की
पंडित संतोष शर्मा के मुताबिक, अधिकमास की पूर्णिमा पर भगवान विष्णु के सत्यनारायण रूप की पूजा की जाती है। सुबह उठकर पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें। साफ और पीले रंग के कपड़े पहनना इस दिन शुभ होता है।
इसके बाद सूर्य देव को जल चढ़ाएं और व्रत रखने का संकल्प लें। घर के मंदिर में चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर विष्णु-लक्ष्मी की मूर्ति रखें। उन्हें पीले फूल, फल, चंदन और अक्षत अर्पित करें।
भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी के पत्ते सबसे ज्यादा प्रिय होते हैं। इसलिए उनके भोग में तुलसी दल को जरूर शामिल करें। इसके बाद भगवान सत्यनारायण की कथा पढ़ें और उनके मंत्रों का शांति से जप करें।
शाम के समय जब चंद्रमा निकल आए, तब चंद्र देव की पूजा करें। कच्चे दूध में गंगाजल और मिश्री मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। इससे आपका मन बहुत शांत रहेगा और जीवन में एकाग्रता आएगी।
इस साल ज्येष्ठ का महीना होने के कारण बहुत तेज गर्मी पड़ रही है। इस मौसम में ठंडी चीजों का दान करना सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है। आपको अपनी सामर्थ्य के मुताबिक, जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए।
इस दिन पानी से भरी मिट्टी की मटकी या घड़े का दान जरूर करें। इसके अलावा सत्तू, आम, खरबूजा और हाथ से झलने वाला पंखा दान करना शुभ होता है। आप ब्राह्मणों को वस्त्र और अन्न भी दे सकते हैं।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
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शास्त्रों के मुताबिक, जो लोग पूर्णिमा का व्रत रखते हैं, वे 30 मई शनिवार को व्रत करेंगे। वहीं पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य का कार्य 31 मई रविवार को उदयातिथि में करना सबसे उत्तम रहेगा। आइए पंडित संतोष शर्मा के मुताबिक जानें ज्येष्ठ पूर्णिमा की सही तिथि....
ज्येष्ठ पूर्णिमा की सही तिथि
शास्त्रों में दोनों दिनों का अपना अलग महत्व है। अगर आप पूर्णिमा का व्रत रखते हैं, तो आपको 30 मई शनिवार को व्रत रखना चाहिए। इस रात को ही आकाश में पूर्णिमा का पूरा चंद्रमा मौजूद रहेगा।
शनिवार शाम को चंद्रोदय का समय 07:36 बजे निश्चित किया गया है। जो लोग पूर्णिमा पर पवित्र नदियों में स्नान और दान करते हैं, वे 31 मई को यह काम करेंगे। रविवार को उदयातिथि होने के कारण स्नान-दान के लिए यह दिन सबसे उत्तम और फलदायी माना गया है।
full moon of Adhikamas
अधिकमास की पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
इस महीने के स्वामी स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु यानी पुरुषोत्तम हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन लक्ष्मी-नारायण की पूजा करने से घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती। परिवार में सुख और समृद्धि हमेशा बनी रहती है।
इसके साथ ही कुंडली के चंद्र दोष को दूर करने के लिए यह सबसे अच्छा दिन है। पूर्णिमा को चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से पूर्ण होता है। इस दिन चंद्र पूजा से मानसिक तनाव से पूरी मुक्ति मिलती है।
सत्यनारायण-लक्ष्मी जी की पूजा विधि
इसके बाद सूर्य देव को जल चढ़ाएं और व्रत रखने का संकल्प लें। घर के मंदिर में चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर विष्णु-लक्ष्मी की मूर्ति रखें। उन्हें पीले फूल, फल, चंदन और अक्षत अर्पित करें।
भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी के पत्ते सबसे ज्यादा प्रिय होते हैं। इसलिए उनके भोग में तुलसी दल को जरूर शामिल करें। इसके बाद भगवान सत्यनारायण की कथा पढ़ें और उनके मंत्रों का शांति से जप करें।
शाम के समय जब चंद्रमा निकल आए, तब चंद्र देव की पूजा करें। कच्चे दूध में गंगाजल और मिश्री मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। इससे आपका मन बहुत शांत रहेगा और जीवन में एकाग्रता आएगी।
अधिकमास पूर्णिमा पर किन चीजों का करें दान
इस दिन पानी से भरी मिट्टी की मटकी या घड़े का दान जरूर करें। इसके अलावा सत्तू, आम, खरबूजा और हाथ से झलने वाला पंखा दान करना शुभ होता है। आप ब्राह्मणों को वस्त्र और अन्न भी दे सकते हैं।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
FAQ
- अधिकमास पूर्णिमा पर स्नान और दान किस तारीख को करना चाहिए?
अधिकमास पूर्णिमा पर उदयातिथि के अनुसार स्नान और दान 31 मई 2026, रविवार को करना सबसे उत्तम माना जाएगा। हिंदू धर्म के नियमों के मुताबिक, जो तिथि सूर्योदय के समय मौजूद होती है, उसे उदयातिथि कहते हैं और दान-पुण्य हमेशा उदयातिथि में ही किया जाता है। 31 मई को सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि मौजूद रहेगी, इसलिए पवित्र नदियों में स्नान और गरीबों को दान इसी दिन करना महापुण्यदायी होगा। - अधिकमास पूर्णिमा में भगवान विष्णु को भोग लगाते समय क्या ध्यान रखें?
अधिकमास पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु के 'सत्यनारायण' रूप की पूजा की जाती है। उनकी पूजा और भोग लगाते समय सबसे जरूरी बात यह है कि भोग में तुलसी के पत्ते को अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए। शास्त्रों के मुताबिक, भगवान विष्णु तुलसी के बिना किसी भी प्रकार का भोग स्वीकार नहीं करते हैं। इसके साथ ही उन्हें पीले रंग के फूल, पीले फल और पंचामृत अर्पित करने से वे अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
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