गया के बाद कहां-कहां है पितरों के तर्पण का सबसे सही स्थान? जानें क्या कहते हैं शास्त्र
Kaushiki | Sept 19, 2026, 15:24 IST
Pitru Paksha 2026
पितृपक्ष में पितरों की मुक्ति के लिए गया जी में श्राद्ध करना सबसे श्रेष्ठ माना गया है। जो लोग गया नहीं जा पाते, वे भारत की पवित्र सप्तपुरियों में तर्पण कर सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार, गया जी के बाद काशी को श्राद्ध के लिए सबसे उत्तम माना गया है। काशी के पिशाच मोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध करने से प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है।
Pitru Paksha 2026: क्या आप जानते हैं कि मृत्यु के बाद भी आत्मा भटकती रहती है? जब तक उसे मोक्ष न मिले, तब तक वह शांति की तलाश में घूमती है। सनातन धर्म में पितृपक्ष का समय इन्हीं भटकी हुई आत्माओं को तृप्त करने का होता है।
हम अक्सर सुनते हैं कि पितरों के श्राद्ध के लिए बिहार का गया क्षेत्र सबसे पवित्र स्थान है। गया जी में पिंडदान करने से पूर्वजों को सीधा बैकुंठ लोक मिलता है। लेकिन क्या होगा अगर कोई व्यक्ति किसी वजह से गया जी न पहुंच पाए?
क्या उसके पितृ हमेशा के लिए प्यासे और भूखे रह जाएंगे? क्या उनकी आत्मा को कभी मुक्ति नहीं मिलेगी? अक्सर लोग इस उलझन में पड़ जाते हैं कि गया न जाने पर हरिद्वार, प्रयागराज या काशी में से कहां जाना सही रहेगा। शास्त्रों में इस सवाल का बहुत ही सटीक और अद्भुत उत्तर दिया गया है।
हमारे ऋषियों ने ऐसी व्यवस्था बनाई है कि अगर कोई गया नहीं जा पाता, तो भी उसके पितरों को मुक्ति मिल सकती है। लेकिन इसके लिए एक खास स्थान और विधान तय किया गया है।
भारत में एक ऐसी रहस्यमयी और प्राचीन जगह है, जहां गंगा के अवतरण से भी पहले से मोक्ष का द्वार खुला हुआ है। एक ऐसा कुंड, जहां अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों की आत्मा भी शांत हो जाती है। आइए इसे जानें....
हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों की शांति के लिए गया जी को मुख्य स्थान माना गया है। गया जी में पिंडदान करने से पितरों को तुरंत ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है।
यदि कोई कारणवश गया नहीं जा सकता, तो शास्त्रों में उसके लिए विकल्प बताए गए हैं। स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, भारत में सात मोक्षदायिनी पुरियां हैं।
इन सात पुरियों को सप्तपुरी कहा जाता है। इनमें अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, उज्जैन और द्वारका शामिल हैं। इन पवित्र स्थानों पर स्नान और दान से पुण्य मिलता है।
इन सभी सात पुरियों में काशी यानी वाराणसी को सबसे उत्तम माना गया है। गया जी के बाद काशी ही एक मात्र ऐसा स्थान है, जहां सबसे ज्यादा श्रद्धालु आते हैं। काशी भगवान शिव की नगरी है। ऐसा माना जाता है कि काशी में मरने वाले हर प्राणी को भगवान शिव स्वयं तारक मंत्र देते हैं।
इससे जीव जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है। जब साधक काशी में अपने पितरों का तर्पण करता है, तो शिव की कृपा से पितरों को तुरंत मुक्ति मिल जाती है। इसलिए गया के बाद काशी में श्राद्ध करना सबसे शुभ माना जाता है।
काशी में स्थित पिशाच मोचन कुंड पितरों की मुक्ति के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इस कुंड का इतिहास और इसकी महिमा बहुत ही अनोखी और प्राचीन है।काशीखंड पुराण के मुताबिक, इस कुंड को 'विमल तीर्थ' भी कहा जाता है। इस कुंड की स्थापना पृथ्वी पर गंगा माता के आने से भी पहले हुई थी।
पौराणिक कथा के मुताबिक, भगवान शिव के एक परम भक्त थे, जिनका नाम कपर्दी था। कपर्दी ने यहां भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहां कपर्दीश्वर महादेव के रूप में प्रकट हुए।
शिवजी के दिव्य तेज से इस विमल कुंड का निर्माण हुआ था। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय एक भयंकर प्रेत (पिशाच) अपने पापों के कारण भटक रहा था। वह बहुत कष्ट में था और मुक्ति चाहता था। वह प्रेत भटकते हुए इस कुंड के पास पहुंचा।
वहां उसने भगवान कपर्दीश्वर की शरण ली और पवित्र जल का स्पर्श किया। कुंड के जल का स्पर्श होते ही उस प्रेत के सारे पाप नष्ट हो गए। उसे तुरंत प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई और वह दिव्य रूप धारण कर स्वर्ग चला गया। तभी से इस विमल तीर्थ को पिशाच मोचन कुंड कहा जाने लगा। मान्यता है कि यहाँ तर्पण करने से भटकी हुई आत्माओं को शांति मिलती है।
जो लोग दुर्घटना, बीमारी या अकाल मृत्यु का शिकार होते हैं, उनकी आत्मा अक्सर भटकती रहती है। ऐसी आत्माओं को सामान्य विधि से मुक्ति नहीं मिलती। पूरे विश्व में पिशाच मोचन कुंड ही एकमात्र ऐसा स्थान है, जहां अकाल मृत्यु पाने वाले पितरों का विशेष श्राद्ध किया जाता है। यहां अकाल मृत्यु से मरे परिजनों के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध करने का विधान है। इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों का आह्वान किया जाता है।
त्रिपिंडी श्राद्ध करने से प्रेत बाधा दूर होती है। आत्मा अपने सभी कष्टों को भूलकर मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ जाती है। कई लोग तो गया जी जाने से पहले भी काशी आते हैं। वे पहले पिशाच मोचन कुंड पर तर्पण करते हैं, फिर गया जी की यात्रा शुरू करते हैं।
पितृपक्ष के 15 दिनों में यहां भारी भीड़ जुटती है। यूपी, बिहार, झारखंड, दिल्ली और अन्य राज्यों से लाखों लोग यहां अपने पितरों की शांति के लिए आते हैं। यहां स्नान करके जल अर्पित करने मात्र से पितर प्रसन्न होते हैं।
प्रसन्न पितर अपने वंशजों को सुख, समृद्धि और आरोग्य का आशीर्वाद देते हैं। इसलिए यदि आप गया नहीं जा पा रहे हैं, तो काशी आकर पिशाच मोचन पर तर्पण करें। इससे आपके पूर्वजों को निश्चित रूप से शांति और मोक्ष प्राप्त होगा।
अलग-अलग क्षेत्रों और धर्म-ग्रंथों के मुताबिक तर्पण को लेकर कुछ विशेष स्थानीय मान्यताएं और नियम प्रचलित हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, पितरों को जल और तृप्ति अर्पित करने के लिए तर्पण किया जाता है।
दिशा और वस्त्र का ध्यान:
तर्पण हमेशा दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके किया जाता है। तर्पण करते समय व्यक्ति को सफेद या स्वच्छ धोती पहननी चाहिए और शरीर के ऊपरी हिस्से पर गमछा या अंगवस्त्र रखना चाहिए।
कुशा और तिल का प्रयोग:
तर्पण के समय अनामिका (ring finger) अंगुली में कुशा (एक पवित्र घास) से बनी अंगूठी या कुशा धारण की जाती है। हाथ में जल लेकर उसमें काले तिल और थोड़ा कच्चा दूध मिलाया जाता है।
अंजलि (अंजुलि) से जल अर्पित करना:
दोनों हाथों को मिलाकर (अंजलि बनाकर) उसमें जल, तिल और कुशा ली जाती है। इसके बाद अंगूठे और तर्जनी (index finger) के बीच वाले हिस्से से जल को पितरों के नाम से अंगूठे की तरफ से नीचे गिराया जाता है।
मंत्र और गोत्र का उच्चारण:
जल गिराते समय अपने पितरों (पिता, दादा, परदादा आदि) का नाम, गोत्र और "तृप्यन्ताम्" (अर्थात 'तृप्त हों') मंत्र का उच्चारण किया जाता है।
आचमन और प्रणाम:
तर्पण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद हाथ धोकर आचमन किया जाता है और दक्षिण दिशा की ओर हाथ जोड़कर पितरों से परिवार की सुख-समृद्धि तथा अनजाने में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा की प्रार्थना की जाती है।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
हम अक्सर सुनते हैं कि पितरों के श्राद्ध के लिए बिहार का गया क्षेत्र सबसे पवित्र स्थान है। गया जी में पिंडदान करने से पूर्वजों को सीधा बैकुंठ लोक मिलता है। लेकिन क्या होगा अगर कोई व्यक्ति किसी वजह से गया जी न पहुंच पाए?
क्या उसके पितृ हमेशा के लिए प्यासे और भूखे रह जाएंगे? क्या उनकी आत्मा को कभी मुक्ति नहीं मिलेगी? अक्सर लोग इस उलझन में पड़ जाते हैं कि गया न जाने पर हरिद्वार, प्रयागराज या काशी में से कहां जाना सही रहेगा। शास्त्रों में इस सवाल का बहुत ही सटीक और अद्भुत उत्तर दिया गया है।
हमारे ऋषियों ने ऐसी व्यवस्था बनाई है कि अगर कोई गया नहीं जा पाता, तो भी उसके पितरों को मुक्ति मिल सकती है। लेकिन इसके लिए एक खास स्थान और विधान तय किया गया है।
भारत में एक ऐसी रहस्यमयी और प्राचीन जगह है, जहां गंगा के अवतरण से भी पहले से मोक्ष का द्वार खुला हुआ है। एक ऐसा कुंड, जहां अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों की आत्मा भी शांत हो जाती है। आइए इसे जानें....
गया के बाद काशी क्यों है सर्वोपरि
यदि कोई कारणवश गया नहीं जा सकता, तो शास्त्रों में उसके लिए विकल्प बताए गए हैं। स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, भारत में सात मोक्षदायिनी पुरियां हैं।
इन सात पुरियों को सप्तपुरी कहा जाता है। इनमें अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, उज्जैन और द्वारका शामिल हैं। इन पवित्र स्थानों पर स्नान और दान से पुण्य मिलता है।
इन सभी सात पुरियों में काशी यानी वाराणसी को सबसे उत्तम माना गया है। गया जी के बाद काशी ही एक मात्र ऐसा स्थान है, जहां सबसे ज्यादा श्रद्धालु आते हैं। काशी भगवान शिव की नगरी है। ऐसा माना जाता है कि काशी में मरने वाले हर प्राणी को भगवान शिव स्वयं तारक मंत्र देते हैं।
इससे जीव जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है। जब साधक काशी में अपने पितरों का तर्पण करता है, तो शिव की कृपा से पितरों को तुरंत मुक्ति मिल जाती है। इसलिए गया के बाद काशी में श्राद्ध करना सबसे शुभ माना जाता है।
पिशाच मोचन कुंड का अद्भुत इतिहास
पौराणिक कथा के मुताबिक, भगवान शिव के एक परम भक्त थे, जिनका नाम कपर्दी था। कपर्दी ने यहां भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहां कपर्दीश्वर महादेव के रूप में प्रकट हुए।
शिवजी के दिव्य तेज से इस विमल कुंड का निर्माण हुआ था। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय एक भयंकर प्रेत (पिशाच) अपने पापों के कारण भटक रहा था। वह बहुत कष्ट में था और मुक्ति चाहता था। वह प्रेत भटकते हुए इस कुंड के पास पहुंचा।
वहां उसने भगवान कपर्दीश्वर की शरण ली और पवित्र जल का स्पर्श किया। कुंड के जल का स्पर्श होते ही उस प्रेत के सारे पाप नष्ट हो गए। उसे तुरंत प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई और वह दिव्य रूप धारण कर स्वर्ग चला गया। तभी से इस विमल तीर्थ को पिशाच मोचन कुंड कहा जाने लगा। मान्यता है कि यहाँ तर्पण करने से भटकी हुई आत्माओं को शांति मिलती है।
अकाल मृत्यु और त्रिपिंडी श्राद्ध का नियम
त्रिपिंडी श्राद्ध करने से प्रेत बाधा दूर होती है। आत्मा अपने सभी कष्टों को भूलकर मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ जाती है। कई लोग तो गया जी जाने से पहले भी काशी आते हैं। वे पहले पिशाच मोचन कुंड पर तर्पण करते हैं, फिर गया जी की यात्रा शुरू करते हैं।
पितृपक्ष के 15 दिनों में यहां भारी भीड़ जुटती है। यूपी, बिहार, झारखंड, दिल्ली और अन्य राज्यों से लाखों लोग यहां अपने पितरों की शांति के लिए आते हैं। यहां स्नान करके जल अर्पित करने मात्र से पितर प्रसन्न होते हैं।
प्रसन्न पितर अपने वंशजों को सुख, समृद्धि और आरोग्य का आशीर्वाद देते हैं। इसलिए यदि आप गया नहीं जा पा रहे हैं, तो काशी आकर पिशाच मोचन पर तर्पण करें। इससे आपके पूर्वजों को निश्चित रूप से शांति और मोक्ष प्राप्त होगा।
कैसे करें तर्पण
दिशा और वस्त्र का ध्यान:
तर्पण हमेशा दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके किया जाता है। तर्पण करते समय व्यक्ति को सफेद या स्वच्छ धोती पहननी चाहिए और शरीर के ऊपरी हिस्से पर गमछा या अंगवस्त्र रखना चाहिए।
कुशा और तिल का प्रयोग:
तर्पण के समय अनामिका (ring finger) अंगुली में कुशा (एक पवित्र घास) से बनी अंगूठी या कुशा धारण की जाती है। हाथ में जल लेकर उसमें काले तिल और थोड़ा कच्चा दूध मिलाया जाता है।
अंजलि (अंजुलि) से जल अर्पित करना:
दोनों हाथों को मिलाकर (अंजलि बनाकर) उसमें जल, तिल और कुशा ली जाती है। इसके बाद अंगूठे और तर्जनी (index finger) के बीच वाले हिस्से से जल को पितरों के नाम से अंगूठे की तरफ से नीचे गिराया जाता है।
मंत्र और गोत्र का उच्चारण:
जल गिराते समय अपने पितरों (पिता, दादा, परदादा आदि) का नाम, गोत्र और "तृप्यन्ताम्" (अर्थात 'तृप्त हों') मंत्र का उच्चारण किया जाता है।
आचमन और प्रणाम:
तर्पण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद हाथ धोकर आचमन किया जाता है और दक्षिण दिशा की ओर हाथ जोड़कर पितरों से परिवार की सुख-समृद्धि तथा अनजाने में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा की प्रार्थना की जाती है।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
सोडाला जेडीए अतिक्रमण विरोध तीसरे दिन भी जारी: जेडीए की अर्थी निकाली, 160 फीट चौड़ीकरण पर सवाल
By Jyoti Mahender Bhardwaj
भोपाल न्यू मार्केट में छोले-भटूरे की दुकान में भीषण आग, 25 फीट ऊंची उठीं लपटें, आसपास की दुकानें भी चपेट में
By Sanjay Dhiman
रायपुर में महिला इंटरनेशनल क्रिकेट मैचों को NGT की हरी झंडी, स्टेडियम प्रबंधन को जमा करने होंगे 20 लाख रुपए
By Umeshwari Baghel
5 साल में 2 कंपनी और 12 बार बदली डेडलाइन, फिर भी अधूरा जयपुर का सिविल लाइंस रेलवे ब्रिज
By Raghvendra Singh Rathore
DRT जबलपुर में हजारों केस लंबित, नियमित अधिकारी की नियुक्ति पर हाईकोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
By Neel Tiwari
फर्जी डिग्रीयों से नौकरी कर रहे 51 शिक्षक, दो साल चली जांच के बाद खुलासा, अब FIR के साथ 100 करोड़ वसूली की तैयारी
By Sanjay Dhiman
राजस्थान में खाद का स्टॉक भरपूर, फिर कालाबाजारी पर 24 FIR क्यों? नरेश मीणा का अनशन जारी
By Raghvendra Singh Rathore