गणेश विसर्जन के पीछे क्या है विदाई का असली कारण, कैसे और किसने शुरू की थी ये परंपरा

गणेश विसर्जन क्यों किया जाता है? क्या है इसके पीछे की पौराणिक कथा, जिसमें गणेश जी और महर्षि वेदव्यास की महाभारत लेखन की कहानी शामिल है। आइअ जानें...

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Kaushiki
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Ganpati Visarjan
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Ganesh Visarjan:भारत में गणपति विसर्जन का त्योहार बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन भक्त अपने घरों में गणपति बप्पा की मूर्ति स्थापित करते हैं और 10 दिनों तक उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। इन 10 दिनों के बाद जिसे अनंत चतुर्दशी भी कहा जाता है,लोग बप्पा की मूर्ति को किसी नदी तालाब या जलाशय में विसर्जित किया जाता है। 

इस त्योहार में हजारों की संख्या में लोग भाग लेते हैं और ढोल-नगाड़ों की थाप पर "गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ" के जयकारे लगाते हुए बप्पा को विदाई देते हैं। इस साल अनंत चतुर्दशी 6 अगस्त 2025 को है और इसी दिन लोग धूमधाम से बप्पा का विसर्जन करते हैं।

ऐसे में क्या आपने कभी सोचा है कि जिस गणेश जी की हम इतने प्रेम से पूजा करते हैं, उन्हीं को हम 10 दिनों के बाद विसर्जित क्यों कर देते हैं?

इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व है। यह परंपरा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन चक्र और त्याग की शिक्षा भी देती है। आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा और इसका महत्व।

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Ganesh Chaturthi 2025: श्री गणेश विसर्जन के पीछे की कहानी क्या है?

गणेश विसर्जन के पीछे की पौराणिक कथा

महर्षि वेदव्यास और महाभारत ग्रंथ

पुराणों में गणेश विसर्जन के पीछे एक बहुत ही महत्वपूर्ण कथा का उल्लेख मिलता है, जिसका संबंध महर्षि वेदव्यास और महाभारत ग्रंथ के लेखन से है। कहा जाता है कि महर्षि वेदव्यास ने महाभारत जैसे विशाल ग्रंथ की रचना करने के लिए भगवान गणेश से इसे लिखने की प्रार्थना की थी।

वेदव्यास जी की प्रार्थना पर गणेश जी इस कार्य के लिए तैयार तो हो गए लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी। गणेश जी ने कहा, "मैं बिना रुके लगातार लिखता रहूंगा, यदि आप एक पल के लिए भी रुकते हैं तो मैं लिखना बंद कर दूंगा।"

वेदव्यास जी ने गणेश जी की शर्त को स्वीकार कर लिया, लेकिन उन्होंने भी अपनी एक शर्त रखी। उन्होंने कहा, "हे गणेश! आपको किसी भी श्लोक को लिखने से पहले उसका अर्थ समझना होगा।"

इस तरह, महर्षि वेदव्यास और भगवान गणेश ने महाभारत का लेखन कार्य शुरू किया। यह कार्य लगातार 10 दिनों तक चलता रहा। जब भी वेदव्यास जी को थोड़ा आराम चाहिए होता था, वे एक बहुत ही जटिल श्लोक बोल देते थे, ताकि गणेश जी को उसका अर्थ समझने में समय लगे। इस तरह, वेदव्यास जी को कुछ समय मिल जाता था।

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10 दिनों तक बिना रुके लिखना

निरंतर 10 दिनों तक बिना रुके लिखने के कारण भगवान गणेश का शरीर बहुत गर्म हो गया था और उनके शरीर में अत्यधिक गर्मी जमा हो गई थी।

जब दसवें दिन महाभारत का लेखन कार्य पूरा हुआ, तो वेदव्यास जी ने गणेश जी के शरीर की गर्मी को शांत करने के लिए उन्हें नदी में ले जाकर स्नान कराया।

इसी घटना के प्रतीक के रूप में आज भी गणेशोत्सव 10 दिनों तक मनाया जाता है और दसवें दिन, यानी अनंत चतुर्दशी पर गणपति का विसर्जन किया जाता है। यह कथा हमें यह भी सिखाती है कि ज्ञान और ज्ञान-प्राप्ति के लिए कितना परिश्रम और समर्पण आवश्यक है।

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गणेशोत्सव 10 दिनों तक क्यों मनाया जाता है

गणेश उत्सव को 10 दिनों तक मनाए जाने के पीछे एक और पौराणिक मान्यता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को कैलाश पर्वत से पृथ्वी पर अपने भक्तों के बीच रहने आते हैं।

इन 10 दिनों तक वे अपने भक्तों के घर में निवास करते हैं, उनकी पूजा-अर्चना स्वीकार करते हैं और उन्हें आशीर्वाद देते हैं। 10 दिनों के बाद, अनंत चतुर्दशी के दिन वे वापस कैलाश पर्वत चले जाते हैं, इसलिए उनका विसर्जन किया जाता है।

यह अवधि भक्तों और भगवान के बीच के विशेष संबंध को दर्शाती है, जहां भक्त अपने प्रिय देव की अतिथि के रूप में सेवा करते हैं। प्रतिमा को विसर्जित करने के पीछे एक और गहरा आध्यात्मिक अर्थ है।

यह दर्शाता है कि भौतिक शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर है। मिट्टी से बनी मूर्ति मिट्टी में ही विलीन हो जाती है, जो हमें यह याद दिलाता है कि हमारा शरीर भी पंचतत्वों से बना है और अंततः उन्हीं में विलीन हो जाएगा। यह हमें अहंकार और मोह को त्यागने की प्रेरणा देता है।

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गणपति विसर्जन का महत्व

विदाई का प्रतीक: 

गणपति विसर्जन (Ganpati Visarjan) केवल एक मूर्ति का विसर्जन नहीं है, बल्कि यह एक प्रिय मेहमान को विदाई देने जैसा है। भक्त इस विदाई के दौरान खुशी और भक्ति के साथ जयकारे लगाते हैं, यह मानते हुए कि बप्पा अगले साल फिर से आएंगे।

आध्यात्मिक संदेश: 

यह हमें जीवन के क्षणभंगुर होने का संदेश देता है। जिस प्रकार मूर्ति जल में विलीन हो जाती है, उसी प्रकार हमारा शरीर भी एक दिन प्रकृति में मिल जाएगा। यह हमें आध्यात्मिक ज्ञान और वैराग्य की ओर प्रेरित करता है।

पर्यावरण संरक्षण: 

आज के समय में, पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ने के साथ, इको-फ्रेंडली गणपति विसर्जन (Ganesh Visarjan on Anant Chaturdashi) को बढ़ावा दिया जा रहा है। मिट्टी की मूर्तियों का उपयोग करने से नदियों और तालाबों का प्रदूषण कम होता है। यह पर्यावरण-हितैषी परंपरा भी बन चुकी है।

डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।

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