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Latest Religious News: सनातन धर्म में माघ महीने की पूर्णिमा का स्थान बहुत ऊंचा माना गया है। इस दिन को माघी पूर्णिमा या बत्तीसी पूर्णिमा के नाम से भी जानते हैं।
साल 2026 में ये पवित्र तिथि 1 फरवरी को पड़ रही है। ये पर्व मोक्ष, सौभाग्य और आध्यात्मिक शुद्धि का द्वार खोलता है। धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक, इस दिन दान करने से 32 गुना फल मिलता है।
वहीं, प्रयागराज संगम पर भगवान विष्णु का साक्षात वास इसे और अद्वितीय बनाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य और चंद्रमा का दुर्लभ योग इस समय को ग्रहों के दोष मिटाने के लिए सर्वश्रेष्ठ बनाता है। आइए, इस दिव्य संगम के ऐतिहासिक विधान के गहरे रहस्यों को समझते हैं।
माघ पूर्णिमा 2026 शुभ मुहूर्त
माघ पूर्णिमा 2026 पर आध्यात्मिक लाभ पाने के लिए शुभ मुहूर्त का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है।
इस पावन दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5:24 से 6:17 तक रहेगा, जो पवित्र स्नान के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
पूजन के लिए अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:13 से 12:57 तक है।
विजय मुहूर्त दोपहर 2:23 से 3:07 तक रहेगा।
शाम को गोधूलि मुहूर्त 5:58 से 6:24 तक रहेगा।
सूर्योदय सुबह 7:09 पर होगा जबकि चंद्रोदय शाम 5:26 पर होगा, जो अर्घ्य देने का सटीक समय है।
माघी पूर्णिमा का ऐतिहासिक महत्व
धार्मिक ग्रंथों और ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, माघ पूर्णिमा एक अत्यंत दुर्लभ खगोलीय और आध्यात्मिक घटना है। इसका महत्व भारतीय संस्कृति में सदियों से सर्वोपरि रहा है। मत्स्य पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण जैसे पवित्र ग्रंथों के मुताबिक, इस पावन तिथि पर स्वयं भगवान विष्णु गंगाजल में साक्षात निवास करते हैं।
इसके कारण इस दिन किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश हो जाता है। ऐतिहासिक रूप से, संगम नगरी प्रयागराज में एक महीने तक चलने वाले कठिन कल्पवास की समाप्ति भी इसी दिन होती है। मान्यता है कि स्वर्ग से देवता और ऋषि-मुनि भी गुप्त रूप में त्रिवेणी संगम पर स्नान करने पधारते हैं।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से ये दिन एक अद्भुत योग बनाता है। सूर्य मकर राशि में और चंद्रमा अपनी स्वराशि कर्क में एक-दूसरे के आमने-सामने होते हैं। इससे ब्रह्मांड में जल तत्व और मानसिक ऊर्जा का प्रवाह अत्यधिक शक्तिशाली हो जाता है। माघ नक्षत्र के कारण 'माघी' कहलाता है।
इस पूर्णिमा पर किया गया बत्तीसी दान न केवल कुंडली के सूर्य और चंद्र दोषों को पूरी तरह शांत करता है। बल्कि जातक को अक्षय पुण्य देकर मोक्ष के द्वार खोल देता है। ये समय सोई हुई किस्मत को जगाने और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
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भगवान विष्णु और प्रयागराज का दिव्य संगम
ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, प्रयागराज का संगम और माघ पूर्णिमा का मिलन एक अत्यंत अलौकिक घटना मानी जाती है। पद्म पुराण में कहा गया है कि माघी पूर्णिमा के दिन स्वयं भगवान विष्णु सूक्ष्म रूप में प्रयाग की त्रिवेणी में पधारते हैं। भगवान विष्णु संगम की लहरों में अदृश्य होकर स्नान करते हैं।
इस दिन सभी तीर्थों के देवता और ऋषि-मुनि भी धरती पर आकर गंगा जल में वास करते हैं, ताकि वे भक्तों के कष्टों का निवारण कर सकें। ज्योतिषीय दृष्टि से देखें तो इस समय सूर्य मकर राशि में और चंद्रमा कर्क राशि में होते हैं। ये ब्रह्मांड में एक सकारात्मक ऊर्जा का चक्र बनाता है।
इस दिव्य योग में संगम में डुबकी लगाने से न केवल अभी के पाप धुल जाते हैं, बल्कि पितरों को भी वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के मुताबिक, स्नान के दौरान गायत्री मंत्र का जाप करने से जातक की बुद्धि और आत्मा शुद्ध होती है। उसे बत्तीस गुना पुण्य फल प्राप्त होता है, जो मोक्ष प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग है।
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बत्तीसी पूर्णिमा और दान की महिमा
माघ पूर्णिमा को बत्तीसी पूर्णिमा कहने के पीछे धार्मिक ग्रंथों में बहुत ही गहरा रहस्य छिपा है। मत्स्य पुराण और स्कंद पुराण के मुताबिक, इस विशेष तिथि पर किए गए किसी भी सात्विक कर्म, जाप या दान का फल सामान्य दिनों की तुलना में 32 गुना अधिक मिलता है। यही कारण है कि इसे यह विशिष्ट नाम दिया गया है।
ऐतिहासिक रूप से इस दिन तिल, कंबल, घी, अन्न और स्वर्ण के दान को महादान की श्रेणी में रखा गया है। ये न केवल वर्तमान दुखों को हरता है बल्कि व्यक्ति को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से, इस दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ होता है।
गुरु और सूर्य के शुभ प्रभाव के कारण दान करने से कुंडली के अशुभ ग्रहों का प्रभाव समाप्त हो जाता है। विशेष रूप से गरीबों और असहायों को भोजन कराने से पितृ दोषों की शांति होती है। जातक को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों में उल्लेख है कि बत्तीसी पूर्णिमा पर किया गया दान ब्रह्मांडीय ऊर्जा को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। इससे साधक के जीवन में सुख, शांति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
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सत्यनारायण कथा और पूजा विधान
माघ पूर्णिमा के पावन अवसर पर भगवान सत्यनारायण की कथा सुनना सबसे उत्तम माना गया है। इसकी शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त में पवित्र नदी में स्नान या गंगाजल मिले पानी से घर पर स्नान करके करनी चाहिए। सबसे पहले भगवान सूर्य को तांबे के लोटे से अर्घ्य दें।
व्रत का संकल्प लें। इसके बाद घर के ईशान कोण में एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें। पूजा में पीले फल, फूल, तुलसी दल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) और पंजीरी का विशेष प्रसाद अर्पित किया जाता है।
भगवान सत्यनारायण की कथा श्रद्धापूर्वक पढ़ने या सुनने (भगवान विष्णु की पूजा) से घर की नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। सुख-समृद्धि का आगमन होता है। कथा के समापन पर आरती करें। कपूर जलाकर पूरे घर में उसकी सुगंध फैलाएं। माघ पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देना न भूलें, क्योंकि इससे मन के दोष दूर होते हैं। जीवन में शीतलता और शांति आती है।
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