News Strike: पहले पोस्ट से मचाया हल्ला अब पदयात्रा पर निकले दिग्विजय सिंह

दिग्विजय सिंह की पदयात्रा और हालिया पोस्ट के बाद कांग्रेस में उनके सियासी संकट ने तूल पकड़ा है। राज्यसभा सीट और बेटे जयवर्धन के भविष्य पर सवाल।

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Harish Divekar
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News Strike (21)

Photograph: (thesootr)

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NEWS STRIKE (न्यूज स्ट्राइक) : दिग्विजय सिंह उन नेताओं में से एक हैं जिनकी सियासी चाल कभी फेल नहीं हुई। पर इन दिनों हालात कुछ बदले हुए हैं। एक तरफ राजनीतिक फिजाएं उनके फेवर में नजर नहीं आती। तो दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह खुद कुछ ऐसा कर जाते हैं कि सुर्खियों का हिस्सा बनते हैं और आला कमान की नजरों की भी किरकिरी बन जाते हैं।

क्या दिग्विजय सिंह ये सब अपनी राज्यसभा सीट बचाने के लिए कर रहे हैं या अपने बेटे जयवर्धन के सियासी करियर को संवारने की फिक्र उन्हें सता रही है। एक पोस्ट के बाद से लगातार सुर्खियों में चल रहे दिग्विजय सिंह अब अपनी पदयात्रा को लेकर हेडलाइन्स बनाने की कोशिश में है।

पर क्या खबरों में इस बात को जगह नहीं मिलेगी कि उनके साथ जीतू पटवारी नजर नहीं आ रहे। दिग्विजय सिंह का मिजाज क्यों बदला हुआ है इसके तीन खास कारण है। जो हम पूरी तफ्सील से आपको बताएंगे।  

दिग्विजय पार्टी के रणनीतिकार बने तो कभी संकट मोचक

देश की राजनीति में एक नेता ऐसा है जिसे हमेशा ही सियासी मौसम विज्ञानी कहा गया। ये नेता थे राम विलास पासवान। जो तकरीबन हर केंद्र सरकार के साथ रहे। दिग्विजय सिंह को भी सियासत का ऐसा ही सूरमा कहा जा सकता है। जो भले ही बदलती सरकारों में पद पर रहने के लिए अवसरवादी तो नहीं कहे जा सकते, लेकिन अपनी पार्टी के मिजाज को देखकर बयान देना या राजनीति करना उनकी खास अदा रही है।

दिग्विजय कभी पार्टी के रणनीतिकार बने तो कभी संकट मोचक बने। पर इन दिनों उनका रूख बदला हुआ है। वो अब कभी अपनी पार्टी के नए-नए नेताओं के बयानों का सामना कर रहे हैं तो कभी अपनी पोस्ट से किरकिरी झेल रहे हैं। उनके हालिया पोस्ट से तो कोई अनजान नहीं।

राहुलजी कांग्रेस को भी रिफॉर्म्स की जरूरत है: दिग्विजय

दिग्विजय सिंह ने हाल ही में पोस्ट किया था कि कोरा पर मुझे ये चित्र मिला। जो बहुत प्रभावशाली है। किस प्रकार आरएसएस का स्वयं सेवक और जनसंघ का कार्यकर्ता नेताओं के चरणों में फर्श पर बैठने के बाद मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री बना।

ये संगठन की शक्ति है। जय सियाराम। बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी की फोटो वाली इस पोस्ट को दिग्विजय सिंह ने भारतीय कांग्रेस और राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी टैग किया।

दिग्विजय सिंह ने एक ट्वीट और किया था जिसमें उन्होंने राहुल गांधी को लिखा कि आप सोशियो इकोनोमिक इश्यूज पर बैंग ऑन हैं। इसके लिए फुल मार्क्स। इसके बाद उन्होंने लिखा कि आप भारतीय कांग्रेस को भी देखिए। जहां रिफॉर्म्स की जरूरत है। इसके आगे भी उन्होंने राहुल गांधी को कुछ सलाह दी थीं।

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दिग्विजय की छटपटाहट राज्यसभा का कार्यकाल तो नहीं? 

इन दोनों ही ट्वीट ने सियासी गलियारों में जमकर हंगामा मचाया। कुछ सुगबुगाहटें तो ये भी होने लगीं कि दिग्विजय सिंह क्या कांग्रेस छोड़ बीजेपी में जाने वाले हैं। वैसे तो ये तकरीबन नामुमकिन है, लेकिन दिग्विजय सिंह की ये बेचैनी और इस तरह के ट्वीट कई सवाल खड़े करते हैं।

पार्टी को लेकर हो सकता है वो कई मुद्दों पर एकराय न हों, लेकिन कभी भी लीडरशिप के खिलाफ वो इतने मुखर नजर नहीं आए। उनकी इस पॉलिटिकल छटपटाहट के पीछे उनका राज्यसभा का कार्यकाल माना जा रहा है। जो इस साल जून में खत्म हो सकता है।

सियासी हलकों में ये चर्चा है कि अब कांग्रेस दिग्विजय सिंह को राज्यसभा भेजने के मूड में नहीं है। दिग्विजय सिंह को भी ये अहसास हो चुका है। इसलिए वो बार-बार आलाकमान की नजरों में आने के लिए इस तरह के पोस्ट कर रहे हैं। ये बात अलग है कि उनका आडवाणी और मोदी की फोटो वाला पोस्ट उन पर ही बैकफायर हो गया। 

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जब कांग्रेस कार्यकर्ता ही दिग्विजय सिंह के खिलाफ हो गए

कांग्रेस के प्रति रुख सिर्फ दिग्विजय सिंह का ही नहीं बदला है। नए प्रदेशाध्यक्ष बनने के बाद से कांग्रेस नेताओं का रुख भी दिग्विजय सिंह के लिए बदला हुआ है। अ

ब तक कांग्रेस में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से काफी कुछ दिग्विजय सिंह की मर्जी से ही होता रहा। फिर भले ही गद्दी पर कमलनाथ बैठे हों, लेकिन अदृश्य ताज दिग्विजय सिंह के सिर पर ही सजा रहा।

कार्यकर्ता के नाम पर प्रजाजनों की भीड़ भी दिग्विजय सिंह के बंगले पर ही जुटती रही, लेकिन 2023 चुनाव में हार और फिर प्रदेश की लीडरशिप में बदलाव के बाद दिग्विजय सिंह को भी पार्टी के रूल्स मानने पर बाध्य किया गया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है इंदौर की घटना। जब बीजेपी विधायक मालिनी गौड़ के बेटे एकलव्य गौड़ ने बाजार में मुस्लिम कर्मचारियों को काम न करने का फरमान सुनाया। 

तब दिग्विजय सिंह विरोध दर्ज करने के लिए पहुंचे, लेकिन वहां कांग्रेस कार्यकर्ता उनके ही खिलाफ हो गए। खबरें आईं कि दिग्विजय सिंह ने इस पर नाराजगी जताई तो इंदौर जिलाध्यक्ष चिंटू चौकसे ने ये बयान दिया कि बड़े नेता पहले सूचित करें उसके बाद ही प्रवास पर आए। ये माना गया कि ये बयान जूती पटवारी के इशारे पर दिया गया है। जाहिर है इससे दिग्विजय सिंह के सीनियोरिटी के इगो को ठेस पहुंचनी ही थी। 

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भोपाल जिला अध्यक्ष पद को लेकर भी विवाद गहराया

इसी बीच जयवर्धन सिंह को जिलाध्यक्ष बनाए जाने के मामले ने भी तूल पकड़ा। इसे जयवर्धन सिंह का डिमोशन माना गया। नाराजगी इस कदर हुई कि दिग्विजय सिंह के समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन भी किया। भोपाल जिला अध्यक्ष पद को लेकर भी विवाद गहराया।

दिग्गी समर्थक मोनू सक्सेना को जिलाध्यक्ष न बनाए जाने से हालात बिगड़े। क्योंकि मोनू सक्सेना ने प्रवीण सक्सेना की नियुक्ति के बदले डिफेंडर गाड़ी दिए जाने जैसे गंभीर आरोप प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी और जीतू पटवारी पर लगाए। 

राजनीतिक गलियारों में ये भी चर्चा है कि मोनू सक्सेना द्वारा लगाए गए आरोपों को दिग्विजय सिंह का समर्थन था। इसके बाद से लगातार दिग्विजय सिंह पहले सी पकड़ बनाने में जुटे हैं, लेकिन हर बार फेल हो रहे हैं। जिसके चलते अब उनकी नाराजगी छलक रही है। वो पचमढ़ी की बैठक में भी राहुल गांधी से संगठन को लेकर चर्चा कर चुके हैं और कांग्रेस वर्किंग कमेटी में भी नाराजगी दर्ज करवा चुके हैं। 

दिग्विजय बता रहे हैं कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं

अब बात करते हैं उन तीन कारणों की जो दिग्विजय सिंह की परेशानी बढ़ा सकते हैं। पहला कारण तो यही है कि दिग्विजय सिंह दोबारा राज्यसभा में जाने के ख्वाहिशमंद है। पर आलाकमान शायद उनके नाम पर मुहर न लगाए। इसलिए दिग्विजय सिंह बार-बार अपनी मौजूदगी का मैसेज दे रहे हैं और जता रहे हैं कि कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं है।

दूसरा कारण है बेटे जयवर्धन का भविष्य। ये बनी बात है कि जयवर्धन की सियासत का आधार दिग्विजय सिंह का ही पॉलीटिकल बैकग्राउंड है। लीडरशिप बदलने के बाद ही जयवर्धन सिंह का कद घटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। मैसेज बिलकुल साफ है कि आने वाले वक्त में दिग्विजय सिंह की सियासी गलतियों का खामियाजा जयवर्धन सिंह को भुगतना पड़ सकता है। 

तीसरी वजह है कमलनाथ परिवार। राजनीतिक इतिहास में बहुत समय बाद ऐसा हुआ है कि कमलनाथ या उनके परिवार को कोई सदस्य लोकसभा और विधानसभा दोनों ही जगह पर नहीं है। अंदरूनी हलकों में खबर है कि कमलनाथ अब नकुलनाथ का सियासी रिहेबिलिटेशन चाहते हैं और उन्हें राज्यसभा भिजवाने की कोशिश में हैं। अगर ऐसा होता है तो कमलनाथ का कद फिर बढ़ जाएगा और ये दिग्विजय सिंह के लिए एक बड़ा सैटबेक भी होगा। 

जीतू के बिना दिग्विजय की पदयात्रा सार्थक होगी?

शायद इसलिए दिग्विजय सिंह अब नई रणनीति पर निकले हैं और शिवराज सिंह चौहान के क्षेत्र में पदयात्रा निकाल रहे हैं। मनरेगा का नाम बदलने के खिलाफ उन्होंने ये पदयात्रा शुरू की है। शिवराज के गण में बिगुल फूंककर वो जाहिर तौर पर सुर्खियां भी हासिल करेंगे।

हो सकता है कि वहां कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच अपनी पकड़ भी मजबूत करें, लेकिन इस यात्रा में अगर प्रदेश के पदाधिकारी और खासतौर से जीतू पटवारी उनके साथ नहीं हुए तो क्या उनकी ये यात्रा सार्थक होगी।

जिस संगठन को वो तानाशाह बताकर बार-बार अपना दर्द जाहिर कर रहे हैं। क्या इस यात्रा में अकेले चलकर वो दर्द कम हो सकेगा। राजनीति के इस धुरंधर को इन सवालों का जवाब तलाश कर ही अपना अगला कदम सुनिश्चित करना क्या मुनासिब नहीं होगा।

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